भारत में खेती के लिए उर्वरक सबसे महत्वपूर्ण कृषि इनपुट में शामिल हैं। खरीफ के बाद अब रबी सीजन की तैयारी शुरू होने के साथ किसानों के बीच यूरिया, DAP, MOP और NPKS की उपलब्धता और कीमत को लेकर चर्चा तेज हो गई है। ऐसे समय में केंद्र सरकार का फोकस केवल खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि सब्सिडी, आयात, घरेलू उत्पादन, वितरण व्यवस्था और कालाबाजारी पर निगरानी को भी मजबूत करने पर है।
सरकार के अनुसार, मौजूदा खरीफ 2026 सीजन में प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता जरूरत से अधिक रही है। 19 जुलाई 2026 तक के अखिल भारतीय आंकड़ों के अनुसार यूरिया की आवश्यकता 109.40 लाख टन थी, जबकि उपलब्धता 163.78 लाख टन रही। इसी अवधि में DAP की आवश्यकता 31.57 लाख टन के मुकाबले उपलब्धता 39.54 लाख टन थी। MOP और NPKS की उपलब्धता भी उनकी संबंधित आवश्यकता से अधिक रही।
- DAP की कीमत को नियंत्रित रखने के लिए विशेष सहायता
DAP किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण फॉस्फेटिक उर्वरकों में से एक है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP और उसके कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारत की आयात लागत पर पड़ता है।
इसी वजह से सरकार ने खरीफ 2026 के लिए DAP की कीमत को किसानों के लिए किफायती बनाए रखने के उद्देश्य से विशेष वित्तीय सहायता का प्रावधान किया। सरकार ने जुलाई में कहा था कि DAP को ₹1,350 प्रति 50 किलोग्राम बैग के स्तर पर बनाए रखने के लिए विशेष सहायता दी गई है।
इसका उद्देश्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में लागत बढ़ने के बावजूद उसका पूरा बोझ किसानों पर न पड़े।
- P&K उर्वरकों के लिए ₹41,533.81 करोड़ का NBS प्रावधान
सरकार ने खरीफ 2026 के लिए फॉस्फेटिक और पोटाशिक यानी P&K उर्वरकों के लिए Nutrient Based Subsidy (NBS) दरों को मंजूरी दी है।
इसके लिए लगभग ₹41,533.81 करोड़ की बजटीय आवश्यकता का अनुमान लगाया गया था। यह खरीफ 2025 की लगभग ₹37,216.15 करोड़ की आवश्यकता से करीब ₹4,317 करोड़ अधिक है। इस योजना के तहत DAP और NPKS सहित P&K उर्वरकों पर सब्सिडी दी जाती है।
सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य किसानों को उचित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराना और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर कम करना है।
- यूरिया पर सब्सिडी व्यवस्था जारी
यूरिया के मामले में सरकार की व्यवस्था अलग है। किसानों को यूरिया नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है और इसकी लागत तथा निर्धारित किसान मूल्य के बीच के अंतर को सरकार सब्सिडी के माध्यम से पूरा करती है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और यूरिया की कीमतों में तेजी आने पर भी किसानों पर अचानक बड़ा बोझ न पड़े।
सरकारी नीति में यूरिया की उपलब्धता के साथ-साथ इसके संतुलित इस्तेमाल पर भी जोर दिया जा रहा है।
- राज्यों की जरूरत के हिसाब से खाद की आपूर्ति
सरकार अब खाद की आपूर्ति केवल कुल राष्ट्रीय आवश्यकता के आधार पर नहीं देखती। कृषि विभाग राज्यों के साथ मिलकर राज्यवार और महीनेवार उर्वरक आवश्यकता का आकलन करता है।
इसके बाद Department of Fertilizers की ओर से मासिक आपूर्ति योजनाएं तैयार की जाती हैं। सरकार ने बताया है कि उर्वरकों की आवाजाही और उपलब्धता पर Integrated Fertilizer Management System यानी iFMS के माध्यम से निगरानी की जाती है। राज्यों के कृषि अधिकारियों के साथ नियमित समीक्षा भी की जाती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य किसी एक राज्य या क्षेत्र में अचानक कमी की स्थिति बनने से पहले आपूर्ति को समायोजित करना है।
- DBT से सब्सिडी और बिक्री पर नजर
उर्वरक क्षेत्र में सरकार ने Direct Benefit Transfer यानी DBT प्रणाली लागू कर रखी है। इसके तहत किसानों को खुदरा स्तर पर उर्वरक की बिक्री के आधार पर कंपनियों को सब्सिडी जारी की जाती है।
सरकार के अनुसार, खुदरा दुकानों पर Aadhaar-authenticated Point of Sale मशीनों के माध्यम से बिक्री दर्ज होती है और वास्तविक बिक्री के आधार पर कंपनियों को सब्सिडी मिलती है। इससे बिक्री और सब्सिडी के बीच बेहतर निगरानी संभव होती है।
यह व्यवस्था उर्वरक वितरण में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ-साथ फर्जी बिक्री और सब्सिडी के दुरुपयोग को रोकने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
- कालाबाजारी और जमाखोरी पर कार्रवाई
खाद की उपलब्धता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका सही किसानों तक पहुंचना भी है। सरकार ने उर्वरकों की कालाबाजारी, जमाखोरी, डायवर्जन और जबरन टैगिंग के खिलाफ कार्रवाई तेज करने की बात कही है।
जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने बताया कि 2025 के दौरान कालाबाजारी, जमाखोरी और उर्वरकों के डायवर्जन के खिलाफ 4.84 लाख से अधिक छापे मारे गए।
इससे स्पष्ट है कि सरकार का जोर केवल उत्पादन और आयात बढ़ाने पर नहीं, बल्कि वितरण श्रृंखला में गड़बड़ी रोकने पर भी है।
- अंतरराष्ट्रीय समझौतों से आयात सुरक्षित करने की कोशिश
भारत की उर्वरक जरूरत का एक हिस्सा आयात से पूरा होता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और सप्लाई की अनिश्चितता को देखते हुए सरकार ने लंबी अवधि के समझौतों पर भी जोर दिया है।
सरकार के अनुसार, विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से उर्वरकों की आपूर्ति सुरक्षित की गई है। मार्च 2026 में सरकार ने बताया था कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से 86 लाख टन से अधिक उर्वरक सुरक्षित किए हैं।
ऐसे समझौते अचानक वैश्विक संकट आने की स्थिति में भारत की आयात सुरक्षा को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।
- घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर
सरकार की उर्वरक रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा घरेलू उत्पादन बढ़ाना है। इसका उद्देश्य आयात पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और देश में ही उर्वरक उत्पादन क्षमता मजबूत करना है।
P&K उर्वरकों के घरेलू उत्पादन में बढ़ोतरी को लेकर भी सरकार ने आंकड़े जारी किए हैं। इससे लंबे समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के झटकों का असर कम करने में मदद मिल सकती है।
यूरिया के क्षेत्र में भी सरकार ने पुराने संयंत्रों के पुनरुद्धार और नई उत्पादन क्षमता विकसित करने पर जोर दिया है।
- खाद की उपलब्धता पर लगातार निगरानी
सरकार का दावा है कि हर फसल सीजन से पहले खाद की आवश्यकता का अनुमान लगाया जाता है और फिर उसके अनुसार आपूर्ति की योजना बनाई जाती है।
खरीफ 2026 के उपलब्ध आंकड़े भी बताते हैं कि 19 जुलाई तक यूरिया, DAP, MOP और NPKS की उपलब्धता उनकी संबंधित आवश्यकता से अधिक थी।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि देश के हर जिले और हर समय किसान को आसानी से खाद मिल जाएगी। राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर परिवहन, वितरण, मांग में अचानक वृद्धि या बिक्री व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए केंद्र और राज्य दोनों स्तरों की निगरानी महत्वपूर्ण रहती है।
- सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल खाद उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि सही खाद, सही समय पर और सही किसान तक पहुंचाना है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP, अमोनिया, सल्फर और फॉस्फोरिक एसिड जैसे कच्चे माल की कीमतों में बदलाव लगातार लागत को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा समुद्री मालभाड़ा, मुद्रा विनिमय दर और वैश्विक आपूर्ति की स्थिति भी भारत के आयात बिल को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ता है—सब्सिडी देना, आयात सुरक्षित करना, घरेलू उत्पादन बढ़ाना, राज्यों को समय पर आवंटन करना और बाजार में कालाबाजारी रोकना।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
किसानों के नजरिए से सरकार की मौजूदा रणनीति के तीन प्रमुख फायदे हैं।
पहला, सब्सिडी के कारण अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का पूरा बोझ किसानों पर नहीं पड़ता।
दूसरा, राज्यवार और महीनेवार आपूर्ति योजना से खाद की उपलब्धता को पहले से व्यवस्थित करने की कोशिश की जा रही है।
तीसरा, DBT, PoS और iFMS जैसी डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से बिक्री और आपूर्ति की निगरानी को मजबूत किया गया है।
लेकिन किसानों के लिए वास्तविक राहत तभी मानी जाएगी जब उन्हें अपने क्षेत्र में खाद समय पर, निर्धारित व्यवस्था के अनुसार और बिना अनावश्यक परेशानी के मिले।
निष्कर्ष
उर्वरक क्षेत्र में सरकार की मौजूदा रणनीति कई स्तरों पर काम कर रही है। एक तरफ DAP और अन्य P&K उर्वरकों के लिए NBS के जरिए सब्सिडी दी जा रही है, वहीं DAP की कीमत को किफायती बनाए रखने के लिए विशेष वित्तीय सहायता का इस्तेमाल किया जा रहा है। दूसरी तरफ उर्वरकों की उपलब्धता पर राज्यवार निगरानी, DBT और iFMS जैसी डिजिटल व्यवस्थाएं लागू हैं।
इसके साथ ही कालाबाजारी, जमाखोरी और डायवर्जन के खिलाफ कार्रवाई तथा अंतरराष्ट्रीय समझौतों के जरिए आपूर्ति सुरक्षित करने की कोशिश भी जारी है।
आने वाले रबी सीजन में सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा यही होगी कि वैश्विक बाजार की कीमतों और आपूर्ति की अनिश्चितताओं के बीच किसानों को यूरिया, DAP और NPK जैसे प्रमुख उर्वरक पर्याप्त मात्रा में, समय पर और उचित कीमत पर उपलब्ध कराए जा सकें।

