हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए Calcium Ammonium Nitrate (CAN) खाद की उपलब्धता का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। राज्य में सेब उत्पादकों को खेती और बागवानी के लिए जरूरी पोषक तत्वों की उपलब्धता में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसी को देखते हुए हिमाचल प्रदेश के शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री जे.पी. नड्डा के सामने CAN खाद की उपलब्धता बहाल कराने का मुद्दा उठाया है।
सेब उत्पादकों का कहना है कि CAN खाद की उपलब्धता बंद होने या सीमित होने के बाद उन्हें पोषण प्रबंधन के लिए दूसरे उर्वरकों का सहारा लेना पड़ रहा है। इनमें यूरिया, कैल्शियम नाइट्रेट और NPK जैसे विकल्प प्रमुख हैं। किसानों के मुताबिक इन विकल्पों की कीमत और इस्तेमाल की स्थिति अलग-अलग होने के कारण उत्पादन लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख सेब उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान और बागवान सेब की खेती पर निर्भर हैं। ऐसे में किसी भी महत्वपूर्ण कृषि इनपुट की उपलब्धता में समस्या सीधे तौर पर बागवानों की लागत, उत्पादन और आय को प्रभावित कर सकती है।
CAN खाद क्यों महत्वपूर्ण है
Calcium Ammonium Nitrate यानी CAN एक नाइट्रोजन आधारित उर्वरक है, जिसमें नाइट्रोजन के साथ कैल्शियम भी उपलब्ध होता है। बागवानी फसलों में नाइट्रोजन पौधों की बढ़वार और पत्तियों के विकास के लिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व है, जबकि कैल्शियम पौधों की कोशिकीय संरचना और फल की गुणवत्ता से जुड़ी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सेब जैसे फलदार पौधों में संतुलित पोषण का महत्व और बढ़ जाता है। पौधे को अलग-अलग विकास अवस्थाओं में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य सूक्ष्म एवं द्वितीयक पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इसलिए बागवानों के लिए केवल खाद की मात्रा ही नहीं, बल्कि सही उर्वरक का उपलब्ध होना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
यही कारण है कि हिमाचल के सेब उत्पादक CAN खाद की उपलब्धता को लेकर चिंतित हैं। किसानों का तर्क है कि यदि किसी एक उर्वरक की उपलब्धता नहीं रहती है तो उसके स्थान पर दूसरे उत्पादों का इस्तेमाल करना पड़ता है। इससे खाद प्रबंधन की योजना बदलती है और कई मामलों में लागत भी बढ़ सकती है।
यूरिया और दूसरे विकल्पों पर बढ़ी निर्भरता
CAN की उपलब्धता में कमी के बाद किसान यूरिया, कैल्शियम नाइट्रेट और NPK जैसे उर्वरकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि इन उर्वरकों के अपने अलग-अलग पोषक तत्व और उपयोग हैं, लेकिन किसानों के सामने सवाल यह है कि उन्हें किस अनुपात और किस समय पर इस्तेमाल किया जाए।
यूरिया मुख्य रूप से नाइट्रोजन उपलब्ध कराने वाला उर्वरक है। वहीं कैल्शियम नाइट्रेट नाइट्रोजन के साथ कैल्शियम उपलब्ध कराता है। NPK उर्वरकों में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संयोजन होता है। इसलिए इन सभी उत्पादों को CAN का सीधा विकल्प मानना हमेशा उचित नहीं होता। फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार उर्वरक का चयन करना जरूरी होता है।
बागवानों की चिंता केवल उपलब्धता तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि वैकल्पिक उर्वरकों की कीमत भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी किसान को पहले इस्तेमाल किए जा रहे उत्पाद की जगह दो या अधिक अलग-अलग उर्वरक खरीदने पड़ते हैं तो उसकी कुल लागत बढ़ सकती है।
सेब उत्पादन की लागत पहले से चुनौती
हिमाचल में सेब की खेती करने वाले किसानों के सामने पहले से ही कई तरह की चुनौतियां हैं। मजदूरी, परिवहन, पैकेजिंग, कीटनाशक, सिंचाई, बाग प्रबंधन और मौसम से जुड़े जोखिम खेती की लागत को प्रभावित करते हैं। ऐसे में उर्वरक की कीमत और उपलब्धता भी बागवानों के लिए अहम मुद्दा बन जाती है।
सेब एक लंबी अवधि वाली बागवानी फसल है। इसमें पौधों का पोषण केवल एक मौसम की जरूरत नहीं होता, बल्कि पूरे बाग प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। पेड़ों की उम्र, मिट्टी की स्थिति, उत्पादन क्षमता और मौसम के अनुसार पोषण प्रबंधन की जरूरत बदलती रहती है।
यदि किसानों को समय पर जरूरी उर्वरक नहीं मिलता है तो उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ सकती है। इससे न केवल लागत बढ़ सकती है बल्कि खाद देने का समय भी प्रभावित हो सकता है। बागवानों के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फलदार पौधों में पोषक तत्वों की उपलब्धता का संबंध पौधे की वृद्धि और फल की गुणवत्ता से भी जुड़ा होता है।
केंद्र से हस्तक्षेप की मांग
CAN खाद की उपलब्धता का मुद्दा केंद्र सरकार के सामने उठाए जाने के बाद अब बागवानों की नजर आगे की कार्रवाई पर है। राज्य की ओर से मांग की गई है कि सेब उत्पादकों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए CAN की उपलब्धता बहाल की जाए।
इस मांग के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह है कि हिमाचल में सेब केवल एक फसल नहीं बल्कि लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा क्षेत्र है। बागवानी से किसानों के अलावा मजदूर, आढ़ती, पैकेजिंग उद्योग, परिवहन और अन्य कारोबार भी जुड़े हुए हैं। इसलिए इनपुट की उपलब्धता में किसी भी तरह की समस्या का असर पूरी वैल्यू चेन पर पड़ सकता है।
केंद्र और राज्य के बीच समन्वय से समाधान की उम्मीद
उर्वरक की उपलब्धता केंद्र और राज्य दोनों के लिए महत्वपूर्ण विषय है। केंद्र सरकार देशभर में उर्वरकों की उपलब्धता, आयात, उत्पादन और वितरण को लेकर नीतिगत स्तर पर काम करती है, जबकि राज्यों की भूमिका किसानों तक खाद पहुंचाने और स्थानीय जरूरतों की निगरानी में महत्वपूर्ण होती है।
हिमाचल के मामले में भी बेहतर समन्वय के जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सेब उत्पादकों को उनकी जरूरत के समय आवश्यक उर्वरक उपलब्ध हो। इसके साथ ही किसानों को उर्वरकों के संतुलित और वैज्ञानिक इस्तेमाल की जानकारी देना भी जरूरी होगा।
बागवानों के लिए आगे क्या होगा
CAN खाद की उपलब्धता को लेकर उठी मांग के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इसकी आपूर्ति कब और किस स्तर पर बहाल होती है। यदि सरकार इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाती है तो हिमाचल के सेब उत्पादकों को राहत मिल सकती है।
हालांकि लंबे समय के समाधान के लिए केवल एक उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं होगा। बागवानों को मिट्टी की जांच, संतुलित पोषण, उचित मात्रा में उर्वरक इस्तेमाल और समय पर कृषि सलाह की सुविधा भी मिलनी चाहिए। इससे किसानों को महंगे और अनावश्यक इनपुट पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
हिमाचल के सेब उत्पादकों के लिए CAN खाद का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे तौर पर बागवानी की लागत और पोषण प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार की ओर से केंद्र के सामने मामला उठाए जाने के बाद अब उम्मीद है कि उर्वरक की उपलब्धता को लेकर कोई व्यावहारिक समाधान निकलेगा।
यदि CAN की आपूर्ति बहाल होती है और किसानों को उचित कीमत पर समय से खाद उपलब्ध होती है तो इससे सेब उत्पादकों की चिंता कुछ हद तक कम हो सकती है। वहीं सरकार के लिए यह भी जरूरी होगा कि भविष्य में उर्वरकों की उपलब्धता में अचानक आने वाली बाधाओं से बचने के लिए मांग, आपूर्ति और वितरण की बेहतर योजना तैयार की जाए।
कुल मिलाकर हिमाचल में CAN खाद का मामला सिर्फ एक उर्वरक की कमी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सेब बागवानों की बढ़ती उत्पादन लागत, समय पर कृषि इनपुट की उपलब्धता और बागवानी क्षेत्र की आर्थिक स्थिरता से जुड़ा विषय है। अब निगाह इस बात पर है कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या कदम उठाती है और हिमाचल के सेब उत्पादकों को CAN खाद की उपलब्धता कब तक सुनिश्चित हो पाती है।
