भारत में किसानों के लिए खाद की कीमत हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दा रही है। किसान जब यूरिया, डीएपी या एनपीके खरीदने बाजार जाता है तो उसके मन में अक्सर सवाल होता है कि इन खादों की कीमत आखिर तय कौन करता है? क्या सरकार सभी उर्वरकों का दाम तय करती है या कंपनियां अपनी लागत के हिसाब से कीमत निर्धारित करती हैं?
इसका जवाब यह है कि भारत में सभी उर्वरकों की कीमत तय करने की व्यवस्था एक जैसी नहीं है। यूरिया और डीएपी-एनपीके जैसे उर्वरकों के लिए अलग-अलग व्यवस्था लागू है। यूरिया की कीमत पर सरकार का सीधा नियंत्रण है, जबकि डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों में कंपनियों को कीमत तय करने की अधिक स्वतंत्रता है, लेकिन सरकार सब्सिडी और निगरानी के जरिए बाजार को नियंत्रित करती है।
यूरिया की कीमत सरकार तय करती है
यूरिया ऐसा प्रमुख उर्वरक है जिसकी खुदरा कीमत पर केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण है। किसानों को यूरिया अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार इसकी लागत और बिक्री मूल्य के बीच के बड़े अंतर को सब्सिडी के जरिए पूरा करती है।
यही वजह है कि बाजार में यूरिया की बोरी की कीमत उसकी वास्तविक उत्पादन या आयात लागत से काफी कम दिखाई देती है। किसान निर्धारित अधिकतम खुदरा मूल्य पर यूरिया खरीदता है, जबकि सरकार उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी देकर लागत का बड़ा हिस्सा वहन करती है।
भारत में यूरिया की कीमत लंबे समय से किसानों के लिए नियंत्रित और अपेक्षाकृत सस्ती रखी गई है। इसका उद्देश्य खेती की लागत को कम रखना और किसानों को नाइट्रोजन उर्वरक आसानी से उपलब्ध कराना है।
यूरिया पर इतनी सब्सिडी क्यों?
यूरिया की वास्तविक लागत कई चीजों पर निर्भर करती है। इसमें प्राकृतिक गैस या अन्य कच्चे माल की लागत, उत्पादन खर्च, परिवहन, आयात लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतें शामिल होती हैं।
अगर सरकार यूरिया की कीमत पूरी लागत के आधार पर तय कर दे तो किसानों को इसकी कीमत काफी अधिक चुकानी पड़ सकती है। इसलिए सरकार नियंत्रित कीमत पर यूरिया उपलब्ध कराती है और बाकी लागत का बड़ा हिस्सा सब्सिडी के रूप में वहन करती है।
उर्वरक की बिक्री को डिजिटल व्यवस्था से भी जोड़ा गया है। खुदरा बिक्री केंद्रों पर पॉइंट ऑफ सेल मशीन के माध्यम से बिक्री दर्ज होती है और इसी व्यवस्था के आधार पर उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी जारी की जाती है।
DAP की कीमत कौन तय करता है?
डीएपी यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट की स्थिति यूरिया से अलग है। डीएपी की कीमत सरकार उसी तरह सीधे तय नहीं करती जिस तरह यूरिया की कीमत नियंत्रित की जाती है।
डीएपी के मामले में सरकार पोषक तत्व आधारित सब्सिडी यानी NBS व्यवस्था के तहत सहायता देती है। इसके तहत नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों के आधार पर सब्सिडी निर्धारित की जाती है।
डीएपी में फास्फोरस की मात्रा अधिक होती है और इसके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल तथा अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर इसकी लागत पर पड़ता है। रॉक फॉस्फेट, फॉस्फोरिक एसिड और अमोनिया जैसे कच्चे माल की कीमत बढ़ने पर डीएपी की लागत भी बढ़ सकती है।
कंपनियां इन लागतों और बाजार की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डीएपी का अधिकतम खुदरा मूल्य तय करती हैं। हालांकि सरकार लगातार कीमत और उपलब्धता पर नजर रखती है ताकि किसानों पर अचानक बड़ा बोझ न पड़े।
NPK खाद की कीमत कैसे तय होती है?
एनपीके उर्वरक में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश अलग-अलग अनुपात में होते हैं। उदाहरण के लिए अलग-अलग फसलों और मिट्टी की जरूरत के हिसाब से अलग ग्रेड के एनपीके बाजार में उपलब्ध होते हैं।
एनपीके की कीमत भी यूरिया की तरह पूरी तरह सरकार द्वारा तय नहीं होती। कंपनियां उत्पादन लागत, कच्चे माल की कीमत, आयात लागत, परिवहन और बाजार की स्थिति को ध्यान में रखकर कीमत तय करती हैं।
सरकार NBS के माध्यम से पोषक तत्वों पर सब्सिडी देती है। इससे कंपनियों की लागत का कुछ हिस्सा कम होता है और किसानों के लिए उर्वरक को अपेक्षाकृत सस्ता रखने में मदद मिलती है।
यूरिया और DAP में सबसे बड़ा अंतर
किसानों के लिए इसे आसान भाषा में समझें तो यूरिया और डीएपी की कीमत व्यवस्था में सबसे बड़ा अंतर सरकारी नियंत्रण का है।
यूरिया की कीमत सरकार नियंत्रित करती है। किसान को नियंत्रित कीमत पर यूरिया मिलता है और सरकार बड़ी मात्रा में सब्सिडी देती है।
वहीं डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों में कंपनियां कीमत निर्धारित करती हैं, लेकिन सरकार NBS सब्सिडी, उपलब्धता की निगरानी और अन्य नीतिगत उपायों के जरिए बाजार को प्रभावित करती है।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीएपी या उसके कच्चे माल की कीमत तेजी से बढ़ने पर सरकार को सब्सिडी बढ़ाने या अन्य कदम उठाने की जरूरत पड़ सकती है।
आयात का खाद की कीमत पर कितना असर?
भारत अपनी जरूरत का कुछ हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा करता है और कुछ मात्रा में उर्वरकों तथा कच्चे माल का आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों का भारत के उर्वरक बाजार पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कच्चे तेल और गैस की कीमत, प्राकृतिक गैस, अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड, रॉक फॉस्फेट और पोटाश की वैश्विक कीमतों में बदलाव से उर्वरक उत्पादन की लागत प्रभावित होती है।
इसके अलावा समुद्री परिवहन और विदेशी मुद्रा विनिमय दर में बदलाव भी आयातित खाद की लागत को प्रभावित कर सकता है।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसानों को खाद उचित कीमत पर मिले और साथ ही देश में उर्वरक की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ती है और सरकार सब्सिडी नहीं बढ़ाती है तो किसानों पर कीमत बढ़ने का दबाव आ सकता है। दूसरी तरफ सब्सिडी बढ़ाने से सरकार के बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
इसी वजह से केंद्र सरकार उर्वरक की कीमत, उपलब्धता, आयात और घरेलू उत्पादन पर लगातार नजर रखती है।
किसानों को क्या समझना चाहिए?
किसानों को यह समझना जरूरी है कि यूरिया, डीएपी और एनपीके की कीमत एक ही तरीके से निर्धारित नहीं होती। यूरिया में सरकारी मूल्य नियंत्रण की भूमिका सबसे अधिक है, जबकि डीएपी और एनपीके में बाजार और कंपनियों की भूमिका अधिक है।
साथ ही केवल सस्ती खाद का इस्तेमाल करना ही अच्छी खेती की गारंटी नहीं है। फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और अन्य पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है।
यूरिया का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगाड़ सकता है। इसलिए किसानों को मिट्टी की जांच और फसल की जरूरत के आधार पर उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत में खाद की कीमत तय करने की व्यवस्था उर्वरक के प्रकार के अनुसार अलग-अलग है। यूरिया की कीमत पर केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण है और इसकी कम कीमत बनाए रखने के लिए बड़ी मात्रा में सब्सिडी दी जाती है। दूसरी ओर डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों में कंपनियों को कीमत तय करने की अधिक स्वतंत्रता है, जबकि सरकार NBS सब्सिडी और निगरानी के जरिए किसानों के हितों की रक्षा करने की कोशिश करती है।
इस पूरी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यही है कि किसानों को खेती के लिए जरूरी उर्वरक उचित कीमत पर और पर्याप्त मात्रा में मिल सके। साथ ही सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता कम करने और उर्वरक सब्सिडी के बोझ को संतुलित रखने की दिशा में लगातार काम करती है।

