वैश्विक बाजार में यूरिया सस्ता, भारत में बढ़ा खाद का भंडार; डीएपी की कीमत में तेजी
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में पिछले कुछ महीनों के दौरान बड़ी गिरावट देखने को मिली है। आपूर्ति व्यवस्था में सुधार और कई देशों से आयात बढ़ाने की रणनीति के कारण भारत में पहुंचने वाली यूरिया की लागत मई 2026 के ऊंचे स्तर से करीब 57 प्रतिशत घटकर अगस्त में लगभग 406 डॉलर प्रति टन रह गई। मई में यही लागत करीब 947 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थी। यूरिया की वैश्विक कीमत में अगस्त में सालाना आधार पर भी लगभग 23 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
यूरिया की कीमतों में यह गिरावट भारत सरकार के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि देश में किसानों को यूरिया कम और नियंत्रित खुदरा कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है। वैश्विक बाजार में कीमत घटने से सरकार पर पड़ने वाले सब्सिडी बोझ को लेकर भी नए सिरे से आकलन किया जा रहा है। अधिकारियों के अनुसार, यदि उर्वरकों की वैश्विक कीमतों में नरमी का मौजूदा रुझान आगे भी जारी रहता है तो चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी का खर्च पहले लगाए गए अनुमानों की तुलना में नियंत्रित रह सकता है।
पिछले महीनों में बढ़ा था खाद पर दबाव
वर्ष 2026 की शुरुआत से ही वैश्विक उर्वरक बाजार कई तरह के दबावों से प्रभावित रहा। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण ऊर्जा और माल ढुलाई की लागत में बढ़ोतरी हुई। यूरिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस, विशेष रूप से एलएनजी, महत्वपूर्ण कच्चा माल है। आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने के कारण यूरिया के उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर भी असर पड़ा।
इस दौरान वैश्विक बाजार में यूरिया के दाम तेजी से बढ़े और भारत में आयात की लागत भी बढ़ गई। अप्रैल और मई के दौरान आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में उर्वरक विभाग के आंतरिक आकलन में उर्वरक सब्सिडी का कुल खर्च 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई गई थी। हालांकि, बाद में आपूर्ति में सुधार और आयात के स्रोतों में विविधता आने से स्थिति में बदलाव आया।
उर्वरक सब्सिडी पर सरकार की नजर
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत सरकार ने उर्वरक सब्सिडी पर करीब 2.17 लाख करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें यूरिया के लिए लगभग 1.42 लाख करोड़ रुपये और पोषक तत्व आधारित सब्सिडी के तहत करीब 74,999 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह खर्च संशोधित अनुमान 1.86 लाख करोड़ रुपये से लगभग 17 प्रतिशत अधिक रहा।
चालू वित्त वर्ष के लिए उर्वरक सब्सिडी का बजट अनुमान लगभग 1.77 लाख करोड़ रुपये रखा गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अब तक करीब 1 लाख करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, जो बजट अनुमान का लगभग 56 प्रतिशत है। इसमें यूरिया के आयात और घरेलू उत्पादन से संबंधित खर्च का हिस्सा करीब 77,871 करोड़ रुपये बताया गया है।
अधिकारियों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी जारी रहने पर सरकार सब्सिडी के खर्च का लगातार पुनर्मूल्यांकन कर रही है। एक अनुमान के मुताबिक मौजूदा वैश्विक कीमतों का रुझान बना रहता है तो चालू वित्त वर्ष में सब्सिडी खर्च पिछले वित्त वर्ष के वास्तविक खर्च से करीब 15,000 से 20,000 करोड़ रुपये अधिक रह सकता है।
भारत ने बढ़ाया यूरिया का आयात
यूरिया की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने आयात के स्रोतों में भी विविधता बढ़ाई है। मौजूदा वित्त वर्ष में उर्वरक आयात से जुड़ी तीन प्रमुख एजेंसियों—नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड और इंडियन पोटाश लिमिटेड—के माध्यम से करीब 47.4 लाख टन यूरिया का आयात किया गया है।
इस बढ़े हुए आयात का असर घरेलू भंडार पर भी दिखाई दे रहा है। अगस्त के अंत तक देश में यूरिया का सरकारी भंडार करीब 75.1 लाख टन पहुंच गया था। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले लगभग 78 प्रतिशत अधिक है।
इतना बड़ा भंडार किसानों के लिए यूरिया की उपलब्धता बनाए रखने में मदद कर सकता है। खरीफ और आगे आने वाले रबी मौसम में मांग बढ़ने के दौरान पर्याप्त स्टॉक होने से आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव कम करने में मदद मिलती है।
कई देशों से यूरिया खरीद रहा भारत
यूरिया की आपूर्ति को किसी एक देश या सीमित स्रोत पर निर्भर रहने से बचाने के लिए भारत ने कई देशों से खरीद शुरू की है। इनमें ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्की और नीदरलैंड शामिल हैं।
आयात स्रोतों में यह विविधता वैश्विक बाजार में किसी एक क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत को वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है। भारत के लिए यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में यूरिया का घरेलू उत्पादन होने के बावजूद उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस और एलएनजी की आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ा हुआ है।
भारत में यूरिया की खपत सबसे अधिक
भारत में कृषि उत्पादन के लिए यूरिया सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों में शामिल है। वित्त वर्ष 2025-26 में देश में कुल उर्वरक खपत करीब 7 करोड़ टन रही थी। इसमें यूरिया की खपत लगभग 4 करोड़ टन रही।
इसी अवधि में भारत ने करीब 1 करोड़ टन यूरिया का आयात किया था। इतनी बड़ी मांग को देखते हुए घरेलू उत्पादन के साथ-साथ आयात की भूमिका भी महत्वपूर्ण बनी हुई है।
सरकार की प्राथमिकता किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराने की है, ताकि वैश्विक बाजार में कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का सीधा असर किसानों की खरीद कीमत पर न पड़े।
डीएपी की वैश्विक कीमत में बढ़ोतरी
जहां यूरिया की वैश्विक कीमत में गिरावट आई है, वहीं डीएपी के मामले में स्थिति अलग बनी हुई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2026 में डीएपी की वैश्विक कीमत करीब 853 डॉलर प्रति टन थी, जो अगस्त में बढ़कर लगभग 925 डॉलर प्रति टन हो गई। यानी इस अवधि में कीमत में करीब 8.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
व्यापार क्षेत्र से जुड़े सूत्रों के अनुसार पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण माल ढुलाई की लागत बढ़ने से डीएपी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव आया है। भारत अपनी डीएपी और एनपीके की जरूरतों के लिए कई देशों से आयात करता है।
इन उर्वरकों की खरीद रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से की गई है। लाल सागर के रास्ते होने वाले व्यापार में भी माल ढुलाई की लागत और क्षेत्रीय परिस्थितियों का प्रभाव देखने को मिला है।
किसानों को नियंत्रित कीमत पर यूरिया
वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमत में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत में किसानों के लिए इसकी खुदरा कीमत लंबे समय से नियंत्रित है। 45 किलोग्राम यूरिया की बोरी किसानों को 266.50 रुपये में मिलती है। यह कीमत मार्च 2018 से अपरिवर्तित बताई गई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत भारतीय खुदरा कीमत के मुकाबले काफी अधिक है। वैश्विक कीमत को भारतीय मुद्रा में बदलने और इसमें आयात, परिवहन तथा अन्य लागत जोड़ने पर 45 किलोग्राम की मात्रा की लागत 4,000 रुपये से अधिक हो सकती है। ऐसे में किसानों को कम कीमत पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए सरकार को बड़ी मात्रा में सब्सिडी देनी पड़ती है।
इसी तरह किसानों के लिए डीएपी की खुदरा कीमत भी 50 किलोग्राम बोरी के लिए 1,350 रुपये पर बनाए रखने की बात कही गई है। अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने के बावजूद घरेलू स्तर पर कीमत को नियंत्रित रखने के लिए सरकारी सहायता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आगे क्या रहेगी स्थिति
यूरिया की वैश्विक कीमतों में हालिया गिरावट से भारत की आयात लागत और सब्सिडी खर्च पर दबाव कुछ कम हो सकता है। साथ ही, ऊंचा घरेलू भंडार और कई देशों से आयात की व्यवस्था किसानों के लिए उर्वरक उपलब्धता बनाए रखने में मदद कर सकती है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार अभी भी ऊर्जा कीमतों, समुद्री माल ढुलाई, भू-राजनीतिक परिस्थितियों और गैस की उपलब्धता जैसे कारकों से प्रभावित हो सकता है। इसलिए आने वाले महीनों में यूरिया और डीएपी की कीमतों पर नजर बनाए रखना जरूरी होगा।
भारत के लिए चुनौती केवल सस्ती दर पर उर्वरक उपलब्ध कराना ही नहीं, बल्कि पर्याप्त भंडार बनाए रखना और आयात स्रोतों को लगातार मजबूत करना भी है। यूरिया की कीमत में आई मौजूदा गिरावट से राहत जरूर मिली है, लेकिन डीएपी की बढ़ती वैश्विक कीमत यह संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार में अलग-अलग पोषक तत्वों की कीमतों का रुझान एक जैसा नहीं है। ऐसे में सरकार की आयात रणनीति, घरेलू उत्पादन और सब्सिडी व्यवस्था आने वाले समय में किसानों के लिए उर्वरक उपलब्धता और कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

