भारत के उर्वरक बाजार में सल्फर की बढ़ती कीमत अब डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की लागत को प्रभावित करने लगी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फर की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के कारण भारत में इसकी लैंडेड कीमत जनवरी के मुकाबले लगभग दोगुनी होकर 1,050–1,100 डॉलर प्रति टन के आसपास पहुंच गई है। सल्फर की कीमतों में यह उछाल ऐसे समय आया है जब भारत पहले से ही DAP और अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों की ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों तथा कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर दबाव का सामना कर रहा है।
सल्फर उर्वरक उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसका इस्तेमाल सीधे कृषि में सल्फर पोषक तत्व के रूप में होने के साथ-साथ फॉस्फोरिक एसिड और फॉस्फेटिक उर्वरकों के निर्माण की प्रक्रिया में भी होता है। इसलिए सल्फर की अंतरराष्ट्रीय कीमत में होने वाला बदलाव भारत में DAP, SSP और विभिन्न NPK कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की उत्पादन लागत पर असर डाल सकता है।
DAP उत्पादन में सल्फर की अहम भूमिका
DAP के उत्पादन में फॉस्फोरिक एसिड प्रमुख कच्चे माल में शामिल है और फॉस्फोरिक एसिड बनाने के लिए सल्फ्यूरिक एसिड की आवश्यकता होती है। सल्फ्यूरिक एसिड के निर्माण में सल्फर महत्वपूर्ण इनपुट है। अनुमान के अनुसार एक टन DAP के उत्पादन में करीब 0.18–0.20 टन सल्फर की जरूरत पड़ सकती है।
इसका मतलब है कि यदि सल्फर की कीमत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होती है तो DAP की उत्पादन लागत पर भी उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। हालांकि वास्तविक लागत पर असर केवल सल्फर की कीमत से तय नहीं होता। फॉस्फेट रॉक, अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड, प्राकृतिक गैस, समुद्री मालभाड़ा और मुद्रा विनिमय दर जैसे कई अन्य कारक भी DAP की अंतिम लागत को प्रभावित करते हैं।
वर्तमान परिस्थिति में सल्फर की कीमत में तेजी ने उर्वरक कंपनियों की लागत संरचना पर एक और दबाव जोड़ दिया है।
SSP पर भी सीधा असर
सल्फर की कीमत बढ़ने का असर केवल DAP तक सीमित नहीं है। सिंगल सुपर फॉस्फेट यानी SSP के निर्माण में भी सल्फ्यूरिक एसिड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। SSP में फास्फोरस के साथ सल्फर भी एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व के रूप में मौजूद रहता है।
भारत में तिलहन, दलहन और कई अन्य फसलों के लिए सल्फर की जरूरत को देखते हुए SSP का उपयोग किया जाता है। सरसों जैसी फसलों में सल्फर का महत्व विशेष रूप से देखा जाता है। ऐसे में सल्फर की महंगी उपलब्धता SSP निर्माताओं की लागत को प्रभावित कर सकती है।
यदि कच्चे माल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो कंपनियों के लिए उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की लागत भी बढ़ सकती है
भारत में किसान अलग-अलग पोषक तत्वों की जरूरत के अनुसार NPK और अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं। इनमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और कई उत्पादों में सल्फर सहित अन्य पोषक तत्व शामिल होते हैं।
सल्फर आधारित कच्चे माल की कीमत बढ़ने पर इन उर्वरकों की उत्पादन लागत भी प्रभावित हो सकती है। खासकर ऐसे कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के मामले में जिनमें सल्फर की मात्रा अधिक होती है, कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी का प्रभाव अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है।
हालांकि किसी उत्पाद की अंतिम लागत में सल्फर का वास्तविक योगदान उसकी रासायनिक संरचना और उत्पादन प्रक्रिया पर निर्भर करता है। इसलिए हर NPK या कॉम्प्लेक्स उर्वरक पर इसका असर समान नहीं होगा।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्यों बढ़ी सल्फर की कीमत
सल्फर एक वैश्विक कमोडिटी है और इसकी उपलब्धता काफी हद तक तेल तथा गैस उद्योग से जुड़ी रहती है। रिफाइनरी और गैस प्रसंस्करण से निकलने वाला सल्फर इसके प्रमुख स्रोतों में शामिल है। इसलिए वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव का असर सल्फर की उपलब्धता और कीमत पर भी पड़ सकता है।
इसके अलावा मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री व्यापार मार्गों में व्यवधान ने उर्वरक कच्चे माल की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ाई है। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए इसका असर लैंडेड कॉस्ट पर पड़ सकता है।
लैंडेड कीमत में केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार की मूल कीमत शामिल नहीं होती, बल्कि मालभाड़ा, बीमा, हैंडलिंग, बंदरगाह और अन्य लॉजिस्टिक लागत भी शामिल होती हैं। इसलिए वैश्विक कीमत में मामूली बदलाव भी भारत पहुंचने तक अधिक लागत में बदल सकता है।
DAP पहले से ही दबाव में
सल्फर की कीमतों में तेजी ऐसे समय आई है जब वैश्विक DAP बाजार भी दबाव में है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमतें पहले ही ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। भारत अपनी घरेलू जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है।
DAP की कीमत बढ़ने के पीछे फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया, सल्फर और फॉस्फेट रॉक जैसे कच्चे माल की लागत के अलावा आपूर्ति और मांग की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। यदि इन सभी इनपुट की कीमतें एक साथ बढ़ती हैं तो आयातित DAP की लागत पर दबाव और बढ़ सकता है।
भारत सरकार किसानों को DAP और अन्य P&K उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी व्यवस्था के तहत सहायता देती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सरकारी वित्त पर भी पड़ सकता है।
सब्सिडी खर्च बढ़ने की आशंका
भारत में यूरिया के विपरीत DAP, MOP और NPK जैसे P&K उर्वरकों पर पोषक तत्व आधारित सब्सिडी यानी NBS व्यवस्था लागू है। सरकार हर सीजन के लिए प्रति किलोग्राम पोषक तत्व के आधार पर सब्सिडी दर तय करती है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों या उनके कच्चे माल की कीमत बढ़ती है तो कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में किसानों पर अचानक कीमत का पूरा बोझ डालने के बजाय सरकार को सब्सिडी के स्तर, कंपनियों के आयात मूल्य और बाजार उपलब्धता के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
सल्फर की कीमत यदि लंबे समय तक 1,000 डॉलर प्रति टन से ऊपर रहती है, तो इससे फॉस्फेटिक उर्वरकों की लागत संरचना पर अतिरिक्त दबाव बना रह सकता है। इसका संभावित प्रभाव आने वाले समय में सरकार के P&K उर्वरक सब्सिडी खर्च पर भी दिखाई दे सकता है।
किसानों के लिए क्या मतलब है?
सल्फर की अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने का सीधा अर्थ यह नहीं है कि किसानों के लिए DAP या SSP की कीमत उसी अनुपात में बढ़ जाएगी। भारत में सरकार उर्वरक कीमतों और सब्सिडी के माध्यम से किसानों पर लागत का बोझ सीमित रखने की कोशिश करती है।
लेकिन यदि वैश्विक कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार, उर्वरक कंपनियों और आयातकों के सामने लागत और उपलब्धता का संतुलन बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है।
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे केवल DAP पर निर्भर रहने के बजाय अपनी फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार संतुलित पोषक तत्वों का इस्तेमाल करें। मिट्टी परीक्षण के आधार पर फास्फोरस, नाइट्रोजन, पोटाश और सल्फर की जरूरत तय करने से अनावश्यक उर्वरक खर्च को कम किया जा सकता है।
आगे बाजार पर नजर
आने वाले महीनों में सल्फर की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार, मध्य-पूर्व की स्थिति, समुद्री परिवहन और प्रमुख उत्पादक देशों की आपूर्ति नीति का असर महत्वपूर्ण रहेगा। यदि आपूर्ति में सुधार होता है तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव और लॉजिस्टिक समस्याएं बनी रहने पर ऊंची कीमतों का दौर लंबा खिंच सकता है।
भारत के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि रबी सीजन शुरू होने वाला है और इस दौरान फॉस्फेटिक तथा अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की मांग बढ़ती है। सरकार को एक तरफ किसानों के लिए पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराना होगा और दूसरी तरफ आयात लागत तथा सब्सिडी खर्च को भी नियंत्रित रखना होगा।
कुल मिलाकर, सल्फर की लैंडेड कीमत का 1,050–1,100 डॉलर प्रति टन तक पहुंचना भारतीय उर्वरक उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण लागत दबाव है। DAP के उत्पादन में सल्फर से जुड़ी लागत, SSP में सल्फ्यूरिक एसिड की जरूरत और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों में सल्फर आधारित इनपुट के कारण इसका असर व्यापक हो सकता है। आने वाले रबी सीजन में वैश्विक कच्चे माल की कीमतों और भारत की उर्वरक खरीद नीति पर बाजार की नजर रहेगी।

