भारत सरकार ने ग्लूफोसिनेट और इसके लवणों (Glufosinate and its Salts) के आयात पर लागू न्यूनतम आयात मूल्य संबंधी प्रतिबंध को अगले छह महीने के लिए बढ़ा दिया है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के 12 अक्टूबर 2026 को जारी अधिसूचना के अनुसार, यह प्रतिबंध अब 12 अप्रैल 2027 तक लागू रहेगा। इस फैसले से कम कीमत पर आयात होने वाले इस खरपतवारनाशक रसायन पर नियंत्रण जारी रहेगा और घरेलू उत्पादकों को संरक्षण देने की नीति को आगे बढ़ाया गया है।
ग्लूफोसिनेट एक गैर-चयनात्मक खरपतवारनाशक है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न प्रकार के खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। इस रसायन के वैश्विक कारोबार में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय उत्पादकों ने पहले भी चिंता जताई थी कि चीन से कम कीमत पर आने वाली आपूर्ति घरेलू विनिर्माण और बाजार में प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सकती है। इसी पृष्ठभूमि में भारत ने ग्लूफोसिनेट के आयात पर व्यापारिक प्रतिबंधों की व्यवस्था लागू की है।
DGFT ने अधिसूचना संख्या 43/2026-27 के माध्यम से प्रतिबंध की अवधि बढ़ाई है। इससे पहले 13 अप्रैल 2026 को अधिसूचना संख्या 10/2026-27 के जरिए यह व्यवस्था लागू की गई थी। नए आदेश में पहले से निर्धारित शर्तों को बरकरार रखा गया है। इसका अर्थ है कि आयात के लिए लागू न्यूनतम मूल्य संबंधी प्रावधानों में बदलाव किए बिना उनकी वैधता छह महीने और बढ़ा दी गई है।
क्या है न्यूनतम आयात मूल्य की व्यवस्था?
न्यूनतम आयात मूल्य (Minimum Import Price—MIP) ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत किसी उत्पाद का आयात निर्धारित मूल्य से कम कीमत पर करने पर प्रतिबंध लागू हो सकता है। ग्लूफोसिनेट के मामले में न्यूनतम मूल्य की गणना शिपमेंट के लागत, बीमा और भाड़ा यानी सीआईएफ (CIF) मूल्य तथा लागू एंटी-डंपिंग शुल्क को मिलाकर प्रति किलोग्राम के आधार पर की जाती है।
इस व्यवस्था के तहत केवल आयात शुल्क की गणना ही महत्वपूर्ण नहीं रहती, बल्कि आयातित उत्पाद का मूल्य भी निर्धारित शर्तों के अनुरूप होना चाहिए। इससे कम कीमत वाले आयात पर अतिरिक्त नियंत्रण लगाया जा सकता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में न्यूनतम आयात मूल्य की कोई अलग निश्चित राशि नहीं दी गई है, इसलिए इसे किसी एक तय डॉलर या रुपये प्रति किलोग्राम की सीमा के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
यह प्रतिबंध आईटीसी (एचएस) 2022 के आयात नीति वर्गीकरण की अनुसूची-1 के अध्याय 38 में शामिल आठ सीमा शुल्क कोड के अंतर्गत आने वाले ग्लूफोसिनेट और उसके लवणों पर लागू होता है। यह अधिसूचना विदेश व्यापार (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1992 की धारा 3 और 5 के तहत वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री की मंजूरी से जारी की गई है।
एंटी–डंपिंग शुल्क के साथ दोहरी सुरक्षा व्यवस्था
ग्लूफोसिनेट के आयात पर न्यूनतम मूल्य की सीमा बढ़ाने का फैसला भारत की व्यापक व्यापार नीति का हिस्सा है। पिछले दो वर्षों में इस रसायन के आयात पर कई तरह के व्यापारिक उपाय अपनाए गए हैं। इनमें एंटी-डंपिंग शुल्क और अब न्यूनतम आयात मूल्य की व्यवस्था को आगे बढ़ाना शामिल है।
मई 2025 के आसपास भारत ने चीन से आने वाले ग्लूफोसिनेट और इसके लवणों पर एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया था। यह कदम घरेलू उत्पादकों की शिकायतों के बाद उठाया गया था। उनका कहना था कि चीन से कम कीमत पर आने वाले उत्पाद भारतीय विनिर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन बना रहे हैं।
एंटी-डंपिंग शुल्क का उद्देश्य डंपिंग की स्थिति में घरेलू उद्योग को होने वाले नुकसान से बचाना है। जब किसी देश से उत्पाद सामान्य मूल्य से कम कीमत पर निर्यात किया जाता है और इससे आयात करने वाले देश के घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंचता है, तो जांच के बाद संबंधित शुल्क लगाया जा सकता है।
हालांकि, केवल एंटी-डंपिंग शुल्क लगने से आयात की कीमतों पर पूरा नियंत्रण सुनिश्चित नहीं होता। यदि निर्यातक अपनी कीमतों में बदलाव करके शुल्क के प्रभाव को कम करने की कोशिश करते हैं, तो पहले से लागू शुल्क का अपेक्षित असर कमजोर हो सकता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए भारत ने ग्लूफोसिनेट के मामले में आगे की समीक्षा भी शुरू की है।
एंटी–एब्जॉर्प्शन समीक्षा भी चल रही है
वर्ष 2026 के मध्य में व्यापार उपचार महानिदेशालय (DGTR) ने ग्लूफोसिनेट के मामले में एक अलग एंटी-एब्जॉर्प्शन समीक्षा शुरू की थी। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि क्या चीन के निर्यातक मौजूदा एंटी-डंपिंग शुल्क के प्रभाव को कम करने के लिए अपने निर्यात मूल्य में कटौती कर रहे हैं।
एंटी-एब्जॉर्प्शन समीक्षा में यह देखा जाता है कि पहले लगाए गए व्यापारिक शुल्क का प्रभाव निर्यात कीमतों में बदलाव के कारण कमजोर तो नहीं पड़ रहा। यदि जांच में ऐसा पाया जाता है, तो संबंधित नियमों के तहत आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।
इस समीक्षा के लंबित रहने के दौरान संबंधित सीमा शुल्क अधिकारियों को प्रभावित आयातों का अस्थायी आधार पर मूल्यांकन करने और आयातकों से वित्तीय गारंटी लेने के निर्देश दिए गए हैं। यह गारंटी भविष्य में संभावित अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने की स्थिति को ध्यान में रखकर ली जा रही है।
इस प्रकार, ग्लूफोसिनेट के मामले में भारत केवल आयात की कीमतों पर न्यूनतम सीमा लागू रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि पहले से लगाए गए एंटी-डंपिंग शुल्क की प्रभावशीलता की भी जांच कर रहा है। फिर भी, एंटी-एब्जॉर्प्शन समीक्षा का अंतिम परिणाम अभी अलग विषय है और इसे न्यूनतम आयात मूल्य की अवधि बढ़ाने वाले आदेश से अलग समझना चाहिए।
घरेलू उत्पादकों और आयातकों पर क्या होगा असर?
न्यूनतम आयात मूल्य की सीमा को अप्रैल 2027 तक बढ़ाने से घरेलू ग्लूफोसिनेट उत्पादकों को व्यापारिक सुरक्षा का मौजूदा ढांचा मिलता रहेगा। कम कीमत वाले आयात पर प्रतिबंध जारी रहने से भारतीय निर्माताओं को कीमतों के स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए कुछ अतिरिक्त संरक्षण मिल सकता है।
दूसरी ओर, इस रसायन का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों के लिए आयात की लागत भी महत्वपूर्ण है। भारत में कृषि रसायन तैयार करने वाली कई कंपनियां तकनीकी स्तर के सक्रिय घटकों और अन्य कच्चे माल की खरीद के आधार पर अपने उत्पाद बनाती हैं। यदि व्यापारिक प्रतिबंधों के कारण आयात की लागत बढ़ती है या कम कीमत पर उपलब्ध आपूर्ति के विकल्प सीमित होते हैं, तो इन कंपनियों की खरीद और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है।
इसका संभावित असर तैयार खरपतवारनाशक उत्पादों की लागत पर भी पड़ सकता है। हालांकि, यह कहना अभी उचित नहीं होगा कि प्रतिबंध बढ़ने से किसानों के लिए ग्लूफोसिनेट आधारित उत्पाद निश्चित रूप से महंगे हो जाएंगे। वास्तविक प्रभाव आयात मूल्य, शुल्क, घरेलू आपूर्ति, कंपनियों की लागत और बाजार में प्रतिस्पर्धा जैसे कारकों पर निर्भर करेगा।
इस मामले में घरेलू उत्पादकों के हितों और आयात पर निर्भर कंपनियों की जरूरतों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण रहेगा। एक ओर सरकार के व्यापारिक उपायों का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को अनुचित मूल्य प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा देना है, वहीं दूसरी ओर कृषि रसायन उद्योग को कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता और उचित लागत की भी जरूरत होती है।
प्रतिबंध बढ़ने से आयात नीति को मिली स्पष्टता
न्यूनतम आयात मूल्य संबंधी प्रतिबंध की अवधि अक्टूबर 2026 के मध्य में समाप्त होने वाली थी। अब इसे 12 अप्रैल 2027 तक बढ़ाने से आयातकों, घरेलू उत्पादकों और कृषि रसायन उद्योग को अगले छह महीनों के लिए नियामकीय स्थिति स्पष्ट हो गई है।
नई अवधि मौजूदा रबी सीजन के साथ-साथ अगले खरीफ सीजन के शुरुआती हिस्से तक फैली हुई है। इस दौरान संबंधित कारोबारियों को आयात की योजना बनाते समय न्यूनतम मूल्य की शर्तों और लागू एंटी-डंपिंग शुल्क को ध्यान में रखना होगा।
कुल मिलाकर, भारत का यह कदम ग्लूफोसिनेट के आयात पर लागू व्यापारिक सुरक्षा उपायों को जारी रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है। अब उद्योग की नजर एंटी-एब्जॉर्प्शन समीक्षा के नतीजों और आगे होने वाले नियामकीय फैसलों पर रहेगी। इनसे यह स्पष्ट होगा कि चीन से आने वाले ग्लूफोसिनेट के कारोबार पर मौजूदा प्रतिबंधों का आगे क्या प्रभाव पड़ता है।
