भारत और लिकटेंस्टाइन के बीच कृषि अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों में सहयोग की संभावनाओं को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल सामने आई है। लिकटेंस्टाइन के वंशानुगत राजकुमार H.S.H. Hereditary Prince Alois ने 28 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI) का दौरा किया। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच कृषि अनुसंधान, उन्नत फसल किस्मों, जलवायु-अनुकूल खेती और Sustainable Agri-Food Systems से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।
यह दौरा ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब कृषि क्षेत्र के सामने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, किसानों की उत्पादकता बढ़ाने, पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने और पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने जैसी कई चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और विभिन्न देशों के संस्थानों के बीच सहयोग की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
दौरे के दौरान कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जट ने भारत की कृषि यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि देश ने खाद्य की कमी वाले दौर से खाद्य अधिशेष की स्थिति तक का सफर तय किया है। उन्होंने कृषि उत्पादन को पोषण, स्वास्थ्य, मूल्य श्रृंखला और पर्यावरणीय स्थिरता से जोड़ने वाले Integrated, Systems-Based Approach की आवश्यकता पर जोर दिया।
इस अवसर पर ICAR-IARI के वैज्ञानिकों ने भारतीय कृषि अनुसंधान की उपलब्धियों, उन्नत फसल किस्मों और भविष्य की कृषि जरूरतों पर जानकारी साझा की। दौरे का उद्देश्य कृषि विज्ञान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्रों में संभावित सहयोग की पहचान करना तथा दोनों देशों के संस्थानों के बीच वैज्ञानिक आदान-प्रदान की संभावनाओं को आगे बढ़ाना रहा।
खाद्य की कमी से खाद्य अधिशेष तक भारत की कृषि यात्रा
भारत की कृषि यात्रा में वैज्ञानिक अनुसंधान, उन्नत बीजों, सिंचाई सुविधाओं, फसल प्रबंधन और कृषि विस्तार सेवाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्रता के बाद देश को खाद्यान्न उत्पादन और खाद्य उपलब्धता से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। समय के साथ कृषि अनुसंधान और तकनीकी प्रगति ने उत्पादन क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जट ने अपने संबोधन में इसी परिवर्तन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत की कृषि को केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा जा सकता। आज आवश्यकता ऐसी कृषि प्रणालियों की है, जो खाद्यान्न उत्पादन के साथ पोषण सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य, कृषि मूल्य श्रृंखला और पर्यावरणीय संरक्षण को भी महत्व दें।
यह दृष्टिकोण आधुनिक कृषि की बदलती जरूरतों को दर्शाता है। पहले कृषि विकास का मुख्य जोर खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने पर रहा, लेकिन अब खेती को व्यापक खाद्य प्रणाली के हिस्से के रूप में देखने की जरूरत है। इसमें खेत से लेकर उपभोक्ता तक खाद्य उत्पादों की उपलब्धता, गुणवत्ता, प्रसंस्करण, भंडारण और बाजार तक पहुंच जैसे पहलू शामिल हैं।
भारत जैसे विशाल और विविध कृषि वाले देश में यह बदलाव विशेष महत्व रखता है। अलग-अलग राज्यों में मिट्टी, जलवायु, फसल प्रणालियों और किसानों की जरूरतों में अंतर है। इसलिए कृषि विकास के लिए क्षेत्र-विशिष्ट अनुसंधान और वैज्ञानिक सलाह जरूरी है।
डॉ. जट ने कृषि उत्पादन को पोषण, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थिरता से जोड़ने वाले समन्वित दृष्टिकोण पर जोर देकर यह स्पष्ट किया कि भविष्य की कृषि रणनीतियों में इन सभी पहलुओं को साथ लेकर चलना महत्वपूर्ण होगा।
ICAR-IARI की भूमिका और भारतीय कृषि अनुसंधान की विरासत
नई दिल्ली स्थित ICAR–Indian Agricultural Research Institute देश के प्रमुख कृषि अनुसंधान संस्थानों में शामिल है। संस्थान ने भारतीय कृषि के विकास, फसल उत्पादकता बढ़ाने और उन्नत कृषि तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
दौरे के दौरान ICAR-IARI के निदेशक डॉ. छ. श्रीनिवास राव ने संस्थान के ऐतिहासिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारत की Green Revolution में IARI की भूमिका और कृषि उत्पादकता तथा पोषण सुरक्षा को मजबूत करने में इसके निरंतर योगदान का उल्लेख किया।
हरित क्रांति के दौरान उन्नत फसल किस्मों, कृषि अनुसंधान और उत्पादन तकनीकों ने भारत में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में अहम योगदान दिया। इसके बाद कृषि अनुसंधान का दायरा लगातार व्यापक हुआ। अब फसल उत्पादकता के साथ जलवायु परिवर्तन, संसाधन दक्षता, पोषक तत्वों का प्रबंधन और पोषण गुणवत्ता जैसे विषय भी वैज्ञानिक प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
IARI में विकसित और अध्ययन की जाने वाली कृषि तकनीकों का महत्व केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। इनका उद्देश्य ऐसी तकनीकें और किस्में विकसित करना भी है, जिन्हें किसानों की परिस्थितियों के अनुसार खेतों में अपनाया जा सके।
संस्थान का यह अनुभव भारत–लिकटेंस्टाइन कृषि सहयोग के लिए भी उपयोगी आधार प्रदान कर सकता है। वैज्ञानिक आदान-प्रदान के माध्यम से अनुसंधान के विभिन्न क्षेत्रों में संभावित साझेदारी, तकनीकी अनुभव साझा करने और टिकाऊ कृषि प्रणालियों पर चर्चा के अवसर विकसित हो सकते हैं।
जलवायु-अनुकूल फसल किस्मों पर विशेष जोर
दौरे के दौरान ICAR के उपमहानिदेशक (Crop Science) डॉ. डी. के. यादव ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के योगदानों की जानकारी दी। उन्होंने Climate-Resilient, Biofortified और Input-Efficient Crop Varieties के विकास से जुड़े प्रयासों को प्रस्तुत किया।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कृषि उत्पादकता बढ़ाने के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करना भी आवश्यक है। यह लक्ष्य वर्तमान कृषि अनुसंधान के प्रमुख विषयों में शामिल है।
Climate-Resilient Varieties क्यों हैं जरूरी?
जलवायु परिवर्तन के कारण खेती में मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है। तापमान में बदलाव, अनियमित वर्षा, सूखे की स्थिति और अत्यधिक बारिश जैसी परिस्थितियां फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में ऐसी फसल किस्मों का विकास महत्वपूर्ण है, जो उपयुक्त कृषि परिस्थितियों में जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना करने में बेहतर क्षमता रखती हों।
जलवायु-अनुकूल किस्मों के विकास का उद्देश्य किसानों को बदलती परिस्थितियों के बीच उत्पादन बनाए रखने में सहायता करना है। हालांकि, किसी किस्म का वास्तविक प्रदर्शन स्थानीय जलवायु, मिट्टी, फसल प्रबंधन और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है। इसलिए नई किस्मों का परीक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उनका चयन जरूरी है।
Biofortified Crops से पोषण सुरक्षा
Biofortified फसलें ऐसी किस्मों से संबंधित हैं, जिनमें प्रजनन और वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से कुछ आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने पर ध्यान दिया जाता है। इनका उद्देश्य खाद्य पदार्थों के पोषण मूल्य में सुधार करना है।
भारत में खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा भी महत्वपूर्ण विषय है। पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध होने के बावजूद लोगों के आहार में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी एक चुनौती हो सकती है। ऐसे में पोषण गुणवत्ता वाली फसल किस्में व्यापक खाद्य प्रणाली में उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं।
Input-Efficient Varieties से संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल
कृषि उत्पादन में बीज, उर्वरक, पानी और ऊर्जा जैसे संसाधनों की लागत महत्वपूर्ण होती है। Input-Efficient Crop Varieties पर अनुसंधान का उद्देश्य ऐसी किस्मों और उत्पादन प्रणालियों को बढ़ावा देना है, जिनमें संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग संभव हो।
किसानों के लिए इसका महत्व इसलिए है, क्योंकि उत्पादन बढ़ाने के साथ खेती की लागत और पर्यावरणीय प्रभावों को नियंत्रित करना भी जरूरी है। हालांकि, वास्तविक लाभ फसल की किस्म, क्षेत्र की परिस्थितियों और खेती के प्रबंधन पर निर्भर करते हैं।
डॉ. डी. के. यादव की प्रस्तुति ने भारतीय कृषि अनुसंधान में इन तीनों पहलुओं—जलवायु अनुकूलता, पोषण गुणवत्ता और संसाधन दक्षता—के महत्व को रेखांकित किया।
वैज्ञानिकों से संवाद और उन्नत फसल किस्मों का अवलोकन
ICAR-IARI दौरे के दौरान लिकटेंस्टाइन के प्रतिनिधिमंडल ने संस्थान के Genetics Division में वैज्ञानिकों के साथ संवाद किया। प्रतिनिधिमंडल ने उन्नत फसल किस्मों का अवलोकन किया और कृषि अनुसंधान से जुड़े विषयों पर जानकारी प्राप्त की।
Genetics Division जैसे अनुसंधान विभागों की भूमिका फसलों के आनुवंशिक गुणों को समझने, उपयोगी विशेषताओं की पहचान करने और बेहतर किस्मों के विकास से संबंधित वैज्ञानिक कार्यों में महत्वपूर्ण होती है। फसल सुधार कार्यक्रमों के माध्यम से उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता और विभिन्न कृषि परिस्थितियों में प्रदर्शन से जुड़े लक्ष्यों पर काम किया जाता है।
इस प्रकार के वैज्ञानिक संवाद से अलग-अलग संस्थानों को अनुसंधान की प्राथमिकताओं, तकनीकी जरूरतों और भविष्य में सहयोग के संभावित क्षेत्रों को समझने का अवसर मिलता है।
प्रतिनिधिमंडल का उन्नत फसल किस्मों का अवलोकन करना इस दौरे का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में किसी विशेष फसल किस्म को संयुक्त रूप से विकसित करने, किसी नई तकनीक के हस्तांतरण या किसी औपचारिक शोध परियोजना की घोषणा का उल्लेख नहीं है। इसलिए इस दौरे को संभावित वैज्ञानिक सहयोग और संस्थागत संवाद की दिशा में एक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए।
IARI परिसर में पौधारोपण से पर्यावरणीय स्थिरता का संदेश
दौरे के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने IARI Alumni Complex में पौधारोपण गतिविधि में भी भाग लिया। यह कार्यक्रम संस्थान में आयोजित दौरे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
पौधारोपण और हरित क्षेत्र विकसित करने जैसी गतिविधियां पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का माध्यम बन सकती हैं। कृषि के संदर्भ में पर्यावरणीय स्थिरता का अर्थ केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और कृषि तथा पारिस्थितिकी के बीच संतुलन बनाए रखने से भी जुड़ा है।
खेती की दीर्घकालिक उत्पादकता के लिए मिट्टी, पानी और जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक है। इसी कारण आधुनिक कृषि अनुसंधान में उत्पादन वृद्धि के साथ पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
IARI में आयोजित पौधारोपण गतिविधि ने वैज्ञानिक सहयोग के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी के महत्व को भी रेखांकित किया।
भारत–लिकटेंस्टाइन सहयोग में क्या हैं संभावनाएं?
भारत और लिकटेंस्टाइन के बीच कृषि अनुसंधान और तकनीकी नवाचार से जुड़े संभावित सहयोग का महत्व इस बात में है कि कृषि चुनौतियों के समाधान के लिए विभिन्न संस्थानों के अनुभव और वैज्ञानिक क्षमताएं साझा की जा सकती हैं।
इस दौरे के दौरान कृषि अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और Sustainable Agri-Food Systems में सहयोग की संभावनाओं का पता लगाने पर जोर दिया गया। ऐसे संवाद से भविष्य में शोध संस्थानों के बीच संपर्क, वैज्ञानिकों के आदान-प्रदान और साझा प्राथमिकताओं की पहचान के अवसर विकसित हो सकते हैं।
संभावित सहयोग के कुछ व्यापक क्षेत्र निम्नलिखित हो सकते हैं:
- कृषि अनुसंधान: फसल उत्पादन, गुणवत्ता और टिकाऊ कृषि प्रणालियों से संबंधित वैज्ञानिक अनुभव साझा करना।
- तकनीकी नवाचार: कृषि की चुनौतियों के समाधान के लिए उपयोगी तकनीकों और शोध दृष्टिकोणों पर संवाद।
- जलवायु-अनुकूल खेती: बदलती जलवायु परिस्थितियों में कृषि उत्पादन को अधिक सक्षम बनाने के उपायों पर चर्चा।
- पोषण सुरक्षा: Biofortified Crops और खाद्य प्रणाली में पोषण गुणवत्ता के महत्व पर सहयोग की संभावनाओं का आकलन।
- Sustainable Agri-Food Systems: उत्पादन से लेकर मूल्य श्रृंखला तक कृषि और खाद्य प्रणाली को अधिक टिकाऊ बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श।
ये क्षेत्र दौरे में व्यक्त व्यापक प्राथमिकताओं से जुड़े संभावित सहयोग के विषय हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन्हें औपचारिक रूप से स्वीकृत संयुक्त परियोजनाएं या घोषित समझौते नहीं माना जाना चाहिए।
किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
अंतरराष्ट्रीय कृषि सहयोग का अंतिम उद्देश्य केवल संस्थानों के बीच संपर्क बढ़ाना नहीं होना चाहिए। इसका महत्व तब अधिक होता है, जब वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी विकास किसानों की जरूरतों के अनुरूप उपयोगी समाधान उपलब्ध कराने में मदद करें।
भारत में बड़ी संख्या में किसान जलवायु संबंधी जोखिमों, खेती की लागत, संसाधनों की उपलब्धता और बाजार की चुनौतियों का सामना करते हैं। ऐसे में ऐसी कृषि प्रणालियों की जरूरत है, जो उत्पादन बढ़ाने के साथ खेती की स्थिरता को भी मजबूत करें।
Climate-Resilient Varieties, Biofortified Crops और Input-Efficient Technologies जैसे विषयों पर अनुसंधान इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन तकनीक को किसानों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय परीक्षण, कृषि विस्तार सेवाएं, प्रशिक्षण और गुणवत्तापूर्ण कृषि सामग्री की उपलब्धता भी आवश्यक है।
ICAR-IARI में हुए संवाद ने कृषि अनुसंधान और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों को लेकर साझा प्राथमिकताओं पर चर्चा का अवसर उपलब्ध कराया। भविष्य में यदि इन चर्चाओं के आधार पर संस्थागत सहयोग विकसित होता है, तो उसका महत्व वैज्ञानिक ज्ञान साझा करने और कृषि क्षेत्र की चुनौतियों के समाधान की संभावनाओं के संदर्भ में देखा जा सकेगा।
टिकाऊ कृषि के लिए वैज्ञानिक साझेदारी की दिशा में कदम
लिकटेंस्टाइन के वंशानुगत राजकुमार H.S.H. Hereditary Prince Alois का 28 अक्टूबर 2026 को ICAR-IARI, नई दिल्ली का दौरा भारत और लिकटेंस्टाइन के बीच कृषि अनुसंधान तथा तकनीकी नवाचार में संभावित सहयोग को समझने का अवसर रहा।
दौरे के दौरान डॉ. एम. एल. जट ने भारत की खाद्य अधिशेष राष्ट्र बनने की यात्रा और कृषि को पोषण, स्वास्थ्य, मूल्य श्रृंखला तथा पर्यावरणीय स्थिरता से जोड़ने वाले समन्वित दृष्टिकोण पर जोर दिया। डॉ. डी. के. यादव ने जलवायु-अनुकूल, Biofortified और Input-Efficient फसल किस्मों में ICAR के योगदान को प्रस्तुत किया, जबकि डॉ. छ. श्रीनिवास राव ने IARI की ऐतिहासिक भूमिका और कृषि उत्पादकता तथा पोषण सुरक्षा में इसके योगदान को रेखांकित किया।
Genetics Division में वैज्ञानिकों के साथ संवाद, उन्नत फसल किस्मों का अवलोकन और पौधारोपण गतिविधि इस दौरे के प्रमुख हिस्से रहे। इस पहल ने कृषि विज्ञान, तकनीकी नवाचार और टिकाऊ Agri-Food Systems के क्षेत्र में वैज्ञानिक आदान-प्रदान तथा संस्थागत साझेदारी की संभावनाओं को सामने रखा।
आने वाले समय में ऐसे संवादों का महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वे किस प्रकार व्यावहारिक शोध सहयोग, ज्ञान के आदान-प्रदान और किसानों की जरूरतों के अनुरूप टिकाऊ कृषि समाधान विकसित करने में योगदान देते हैं।

