नागालैंड के जुन्हेबोटो जिले में मुर्गीपालन ग्रामीण परिवारों के लिए आमदनी बढ़ाने और पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने का एक उपयोगी माध्यम बनकर उभर रहा है। यहां कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), जुन्हेबोटो ने नाबार्ड (NABARD) के सहयोग से ऐसी पहल शुरू की, जिसका उद्देश्य महिलाओं को वैज्ञानिक तरीके से बैकयार्ड पोल्ट्री यानी घर के आसपास मुर्गीपालन से जोड़ना, परिवारों को मांस और अंडों के रूप में पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना और ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर पैदा करना है।
इस पहल की खास बात यह है कि इसमें केवल मुर्गियां उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहा गया, बल्कि लाभार्थियों को चूजों की देखभाल, आहार प्रबंधन, टीकाकरण, बीमारी से बचाव और स्थानीय स्तर पर चूजा उत्पादन जैसी गतिविधियों से भी जोड़ा गया। कार्यक्रम के परिणाम बताते हैं कि छोटे स्तर पर शुरू की गई यह गतिविधि परिवारों की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के साथ अतिरिक्त आय का साधन भी बन सकती है।
कार्यक्रम के तहत लाभार्थी परिवारों ने 1,380 पक्षियों का घरेलू उपभोग किया, जबकि 2,135 पक्षियों को बेचकर आय अर्जित की। इसके अलावा, 22,618 अंडों का उत्पादन दर्ज किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, लाभार्थियों ने सामूहिक रूप से ₹30,80,360 की आय अर्जित की और प्रति लाभार्थी अब तक ₹32,592 की शुद्ध आय दर्ज की गई। ये आंकड़े बताते हैं कि सही प्रशिक्षण, जरूरी संसाधन और तकनीकी मार्गदर्शन मिलने पर Backyard Poultry ग्रामीण महिलाओं के लिए उपयोगी आजीविका गतिविधि बन सकती है।
नागालैंड में मांस और अंडों की उपलब्धता बढ़ाने की जरूरत
नागालैंड में पशु-आधारित प्रोटीन की मांग और स्थानीय उपलब्धता के बीच अंतर लंबे समय से एक महत्वपूर्ण चुनौती रहा है। मांस और अंडे शरीर को प्रोटीन सहित कई जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने में भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इन खाद्य पदार्थों की स्थानीय उपलब्धता बढ़ाना परिवारों के पोषण स्तर में सुधार के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
पशुपालन एवं पशु चिकित्सा सेवा विभाग, नागालैंड सरकार की वार्षिक प्रशासनिक रिपोर्ट 2022–23 में राज्य में मांस और अंडों की आवश्यकता तथा उपलब्धता के बीच अंतर दर्ज किया गया है। रिपोर्ट में प्रति व्यक्ति मांस की उपलब्धता 40 ग्राम प्रतिदिन बताई गई है, जबकि संदर्भित अनुशंसित मात्रा 70 ग्राम है। इसी तरह, अंडों की वार्षिक उपलब्धता प्रति व्यक्ति 22 बताई गई है, जबकि रिपोर्ट में आवश्यकता 182.5 अंडे प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष दर्शाई गई है।
ये आंकड़े स्थानीय स्तर पर पोल्ट्री उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत की ओर संकेत करते हैं। यदि गांवों में परिवार अपनी जरूरत के लिए मुर्गियां पाल सकें और अतिरिक्त पक्षियों तथा अंडों को स्थानीय बाजार में बेच सकें, तो इससे पोषण और आय दोनों के क्षेत्र में लाभ की संभावना बन सकती है।
हालांकि, पोल्ट्री उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल पक्षियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। अच्छी नस्ल, संतुलित आहार, स्वच्छ पानी, सुरक्षित आवास, टीकाकरण और बीमारी की समय पर पहचान भी जरूरी है। इन्हीं पहलुओं को ध्यान में रखते हुए KVK जुन्हेबोटो ने महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया।
NABARD समर्थित कार्यक्रम से महिलाओं को मिला नया अवसर
इस पहल का नाम है—“कम लागत वाले अंडा इनक्यूबेटर और बैकयार्ड पोल्ट्री उत्पादन के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूहों की सतत आजीविका और पोषण सुरक्षा को बढ़ावा देना।”
इस कार्यक्रम के माध्यम से महिला लाभार्थियों को छोटे स्तर पर पोल्ट्री पालन शुरू करने के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए गए। इसका उद्देश्य महिलाओं को ऐसी गतिविधि से जोड़ना था, जिसे वे अपने घर और उपलब्ध संसाधनों के साथ संचालित कर सकें।
ग्रामीण परिवारों में बैकयार्ड पोल्ट्री का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इसे बड़े व्यावसायिक पोल्ट्री फार्म की तरह व्यापक ढांचे के साथ शुरू करना जरूरी नहीं होता। उचित प्रबंधन के साथ घर के आसपास सीमित संख्या में पक्षियों का पालन किया जा सकता है। परिवार जरूरत के अनुसार अंडों और मांस का उपयोग कर सकता है और अतिरिक्त उत्पादन बेचकर आमदनी अर्जित कर सकता है।
इस मॉडल में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी तक पहुंच मिलती है। इससे पोल्ट्री पालन को केवल घरेलू काम के रूप में देखने के बजाय आय से जुड़ी गतिविधि के रूप में विकसित करने का अवसर मिलता है।
गुणवत्तापूर्ण चूजों से लेकर आहार तक उपलब्ध कराई गई सहायता
कार्यक्रम की सफलता के लिए लाभार्थियों को शुरुआत में जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण था। इसी उद्देश्य से चयनित महिलाओं को उन्नत रेनबो रूस्टर नस्ल के एक दिन के चूजे दिए गए।
चूजों के शुरुआती दिनों में उचित देखभाल का विशेष महत्व होता है। इस दौरान तापमान, साफ पानी, संतुलित आहार और बीमारी से बचाव पर ध्यान देना पड़ता है। शुरुआती प्रबंधन में लापरवाही होने पर चूजों की मृत्यु दर बढ़ सकती है और किसान का खर्च भी प्रभावित हो सकता है।
इसे ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम के तहत चूजों के लिए शुरुआती 20 दिनों का आहार उपलब्ध कराया गया। लाभार्थियों को फीडर और ड्रिंकर भी दिए गए, ताकि पक्षियों को दाना और पानी उपलब्ध कराने में सुविधा हो।
इसके अलावा, टीकाकरण और दवा संबंधी सहायता भी कार्यक्रम का हिस्सा रही। पोल्ट्री पालन में बीमारी से बचाव का महत्व इसलिए अधिक है, क्योंकि संक्रमण फैलने पर एक साथ कई पक्षी प्रभावित हो सकते हैं। समय पर टीकाकरण, साफ-सफाई और नियमित निगरानी से ऐसे जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।
इस सहायता का उद्देश्य महिलाओं को मुर्गियां उपलब्ध कराने के साथ उन्हें वैज्ञानिक प्रबंधन की बुनियादी सुविधाओं से जोड़ना था, ताकि वे अपने पक्षियों की बेहतर देखभाल कर सकें और पालन की गतिविधि को लंबे समय तक जारी रख सकें।
वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन ने मजबूत की पहल
पोल्ट्री पालन में संसाधन उपलब्ध कराना पहला कदम है, लेकिन उससे बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए सही जानकारी भी जरूरी है। इसी वजह से KVK जुन्हेबोटो के वैज्ञानिकों ने लाभार्थियों को नियमित प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और खेत स्तर पर सहायता प्रदान की।
इस प्रशिक्षण में वैज्ञानिक पक्षी प्रबंधन और रोग निवारण से जुड़ी जानकारी का महत्व रहा। लाभार्थियों को यह समझने में मदद मिली कि पक्षियों के लिए स्वच्छ वातावरण, उपयुक्त आहार, साफ पानी और नियमित देखभाल क्यों जरूरी है।
बैकयार्ड पोल्ट्री में कई बार पक्षियों को खुले या अर्ध-खुले स्थानों पर रखा जाता है। ऐसे में उन्हें मौसम, शिकारी जानवरों और संक्रमण के जोखिम से बचाने के लिए उचित व्यवस्था जरूरी होती है। पक्षियों की संख्या के अनुसार जगह, सुरक्षित आश्रय और साफ-सफाई पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है।
KVK के वैज्ञानिकों की नियमित सहायता से लाभार्थियों को पालन के दौरान आने वाली समस्याओं को समझने और बेहतर प्रबंधन अपनाने का अवसर मिला। इस तरह कार्यक्रम ने प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग को पोल्ट्री उत्पादन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।
घरेलू पोषण में सुधार: परिवारों ने 1,380 पक्षियों का किया उपभोग
इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य परिवारों की पोषण सुरक्षा में सुधार करना था। पोल्ट्री पालन के माध्यम से परिवारों को अपने घर के आसपास ही मांस और अंडों की उपलब्धता बढ़ाने का अवसर मिला।
रिपोर्टिंग अवधि में लाभार्थी परिवारों ने कुल 1,380 पक्षियों का उपभोग किया। इससे उन्हें अपने भोजन में पशु-आधारित प्रोटीन शामिल करने का अवसर मिला। स्थानीय स्तर पर उत्पादन होने से परिवारों को अपनी जरूरत के लिए उपलब्ध पक्षियों का उपयोग करने की सुविधा भी मिल सकती है।
पोषण सुरक्षा का अर्थ केवल खाद्य पदार्थों की उपलब्धता नहीं है, बल्कि परिवारों की उन तक पहुंच और नियमित उपभोग की क्षमता भी है। जब परिवार खुद कुछ खाद्य पदार्थों का उत्पादन करने लगता है, तो उसकी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए एक अतिरिक्त साधन विकसित हो सकता है।
इस पहल में उत्पादन और घरेलू उपयोग को साथ लेकर चलने की कोशिश की गई। इससे पोल्ट्री पालन केवल बाजार में बिक्री तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परिवारों के भोजन और पोषण से भी जुड़ा।
2,135 पक्षियों की बिक्री से महिलाओं को मिली आय
बैकयार्ड पोल्ट्री की आर्थिक उपयोगिता कार्यक्रम के बिक्री संबंधी आंकड़ों में भी दिखाई देती है। रिपोर्ट के अनुसार, लाभार्थियों ने आय अर्जित करने के लिए 2,135 पक्षियों को बेचा।
पक्षियों की बिक्री से ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त कमाई का अवसर मिला। छोटे स्तर पर पोल्ट्री पालन करने वाले परिवार घरेलू जरूरतों के लिए कुछ पक्षियों का उपयोग करते हुए बाकी पक्षियों को बेच सकते हैं। इस तरह उत्पादन का एक हिस्सा पोषण सुरक्षा में योगदान देता है और दूसरा हिस्सा नकद आय का साधन बन सकता है।
कार्यक्रम के तहत लाभार्थियों ने सामूहिक रूप से ₹30,80,360 की आय अर्जित की। प्रति लाभार्थी ₹32,592 की शुद्ध आय दर्ज की गई। ये आंकड़े कार्यक्रम की रिपोर्टिंग अवधि से संबंधित हैं और इन्हें उसी संदर्भ में समझना चाहिए।
यह पहल इस बात को रेखांकित करती है कि ग्रामीण आजीविका के लिए हमेशा बड़े निवेश वाले उद्यम ही जरूरी नहीं होते। स्थानीय जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार छोटे स्तर पर शुरू की गई गतिविधियां भी परिवारों के लिए आय के अतिरिक्त अवसर तैयार कर सकती हैं।
हालांकि, वास्तविक लाभ पक्षियों की संख्या, आहार की लागत, मृत्यु दर, देखभाल पर लगने वाले समय और बिक्री मूल्य पर निर्भर करता है। इसलिए अन्य क्षेत्रों में इस मॉडल को अपनाते समय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागत और बाजार का आकलन करना जरूरी होगा।
22,618 अंडों का उत्पादन, घरेलू उपयोग और बिक्री के अवसर
कार्यक्रम के दौरान कुल 22,618 अंडों का उत्पादन दर्ज किया गया। इन अंडों का उपयोग लाभार्थी परिवारों ने घरेलू उपभोग के लिए किया या उन्हें बेचकर आय अर्जित की।
अंडे प्रोटीन और कई जरूरी पोषक तत्वों के स्रोत हैं। ग्रामीण परिवारों में अंडों का नियमित उत्पादन होने से घर के भोजन में इन्हें शामिल करने का अवसर बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अतिरिक्त अंडों की बिक्री से महिलाओं को नकद आय भी मिल सकती है।
अंडा उत्पादन की क्षमता पक्षियों की नस्ल, उम्र, आहार, स्वास्थ्य और प्रबंधन पर निर्भर करती है। इसलिए उत्पादन को बनाए रखने के लिए केवल पक्षियों की उपलब्धता नहीं, बल्कि उनके लिए उचित आहार, साफ पानी और नियमित देखभाल भी जरूरी है।
जुन्हेबोटो की इस पहल में अंडों का उत्पादन घरेलू पोषण और आय, दोनों उद्देश्यों से जुड़ा रहा। यह मॉडल दर्शाता है कि पोल्ट्री पालन से प्राप्त उत्पादों का उपयोग परिवार की जरूरतों और बाजार की मांग के अनुसार किया जा सकता है।
कम लागत वाले अंडा इनक्यूबेटर से स्थानीय चूजा उत्पादन को बढ़ावा
इस कार्यक्रम का एक अहम पहलू कम लागत वाले अंडा इनक्यूबेटर की शुरुआत है। सामान्य तौर पर पोल्ट्री पालन करने वाले छोटे किसानों को चूजों की उपलब्धता के लिए बाहरी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ सकता है। दूर से चूजे मंगाने में उपलब्धता, परिवहन और समय से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
कम लागत वाले इनक्यूबेटर के माध्यम से स्थानीय स्तर पर चूजा उत्पादन की संभावना विकसित की गई। इनक्यूबेटर अंडों को नियंत्रित परिस्थितियों में सेने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके सफल संचालन के लिए तापमान, आर्द्रता, अंडों की गुणवत्ता और स्वच्छता जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी होता है।
कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों के खेतों में स्थापित इनक्यूबेटरों से नियमित रूप से चूजों का उत्पादन शुरू होने की जानकारी दी गई है। इससे भविष्य में लाभार्थी गांवों और आसपास के क्षेत्रों में चूजों की उपलब्धता बेहतर होने की उम्मीद है।
स्थानीय स्तर पर चूजे उपलब्ध होने से बैकयार्ड पोल्ट्री गतिविधियों को जारी रखने और आगे बढ़ाने में सहायता मिल सकती है। इससे महिला समूहों को पोल्ट्री पालन की आपूर्ति व्यवस्था में भी भूमिका निभाने का अवसर मिल सकता है।
हालांकि, इनक्यूबेटर का लाभ उसकी उत्पादन क्षमता, संचालन लागत, बिजली की उपलब्धता, अंडों की गुणवत्ता और चूजों की स्थानीय मांग पर निर्भर करेगा। इसलिए तकनीकी प्रशिक्षण और नियमित देखरेख इस व्यवस्था को टिकाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी हैं।
महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए ग्रामीण उद्यमिता का मॉडल
जुन्हेबोटो में लागू यह पहल महिला स्वयं सहायता समूहों को स्थानीय संसाधनों पर आधारित आजीविका गतिविधि से जोड़ने का उदाहरण है। कार्यक्रम में महिलाओं को चूजे, शुरुआती आहार, उपकरण, टीकाकरण सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया। इससे उन्हें पोल्ट्री पालन की शुरुआत करने के लिए जरूरी सहयोग मिला।
ऐसी गतिविधियों से महिलाओं को घरेलू उपभोग और बिक्री के लिए उत्पादन करने का अवसर मिलता है। यदि समूह के सदस्य नियमित रूप से अनुभव साझा करें और बाजार की जरूरतों को समझें, तो वे उत्पादन और बिक्री की बेहतर योजना भी बना सकते हैं।
इस मॉडल की उपयोगिता इस बात में है कि यह पोषण और आमदनी को अलग-अलग लक्ष्य मानने के बजाय दोनों को एक साथ जोड़ता है। परिवार कुछ उत्पादन का उपयोग अपने भोजन के लिए कर सकता है, जबकि अतिरिक्त उत्पादन बेचकर जरूरी घरेलू खर्चों में योगदान दे सकता है।
दूसरे क्षेत्रों में भी इस तरह के कार्यक्रम लागू करने के लिए स्थानीय नस्लों और जलवायु की उपयुक्तता, बाजार की मांग, प्रशिक्षण की उपलब्धता और पशु स्वास्थ्य सेवाओं को ध्यान में रखना होगा। केवल संसाधन वितरित कर देने से स्थायी परिणाम सुनिश्चित नहीं होते; नियमित तकनीकी सहायता और लाभार्थियों की भागीदारी भी आवश्यक है।
स्थानीय उत्पादन से पोषण और आजीविका, दोनों को सहारा
KVK जुन्हेबोटो और NABARD के सहयोग से संचालित बैकयार्ड पोल्ट्री कार्यक्रम यह दिखाता है कि वैज्ञानिक प्रशिक्षण, जरूरी उपकरण और निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन के साथ ग्रामीण महिलाओं को आजीविका के अवसरों से जोड़ा जा सकता है।
कार्यक्रम में 1,380 पक्षियों का घरेलू उपभोग, 2,135 पक्षियों की बिक्री और 22,618 अंडों का उत्पादन दर्ज किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, लाभार्थियों ने सामूहिक रूप से ₹30,80,360 की आय अर्जित की और प्रति लाभार्थी ₹32,592 की शुद्ध आय दर्ज की। इसके साथ ही कम लागत वाले इनक्यूबेटरों के माध्यम से स्थानीय चूजा उत्पादन की दिशा में भी प्रगति हुई है।
इस पहल का महत्व केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह परिवारों को मांस और अंडों की उपलब्धता बढ़ाने, महिलाओं को उत्पादन और बिक्री से जोड़ने तथा स्थानीय स्तर पर पोल्ट्री गतिविधियों को मजबूत करने का अवसर देती है।
यदि इसी तरह की पहल को स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, बाजार संपर्क और निरंतर तकनीकी सहायता के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो बैकयार्ड पोल्ट्री ग्रामीण आजीविका और पोषण सुरक्षा के लिए उपयोगी माध्यम बन सकती है।

