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Home कृषि समाचार

6 करोड़ लखपति दीदियों के लक्ष्य की ओर बड़ा कदम, ग्रामीण महिलाओं को मिलेगा आसान और पर्याप्त कर्ज

A big step towards the goal of 6 crore Lakhpati Didis

Emran Khan by Emran Khan
September 4, 2026
in कृषि समाचार
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6 करोड़ लखपति दीदियों के लक्ष्य की ओर बड़ा कदम, ग्रामीण महिलाओं को मिलेगा आसान और पर्याप्त कर्ज

'लखपति दीदी' से ग्रामीण आर्थिक बदलाव की संभावना

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ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण को आर्थिक मजबूती से जोड़ने की दिशा में केंद्र सरकार ने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और महिला उद्यमियों के लिए बैंक ऋण को अधिक तेज, पर्याप्त और सुलभ बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में मुंबई में हुई उच्चस्तरीय बैठक में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत स्वयं सहायता समूह-बैंक लिंकेज और व्यक्तिगत महिला उद्यम वित्तपोषण की व्यापक समीक्षा की गई।

बैठक में SHG की दीदियों, बैंकर्स, राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLM), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) तथा अन्य संबंधित संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं के सामने बैंक ऋण प्राप्त करने में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं की पहचान करना और उनके समाधान के लिए समयबद्ध रोडमैप तैयार करना रहा।

बैठक में ऋण स्वीकृति में देरी, कागजी प्रक्रिया, कम क्रेडिट लिमिट और बैंक शाखा स्तर पर आने वाली कठिनाइयों जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके साथ ही महिला उद्यमियों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने, वित्तीय सेवाओं की पहुंच बढ़ाने और अधिक महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दिया गया।

3 करोड़ से 6 करोड़ लखपति दीदियों का लक्ष्य

ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के अभियान में ‘लखपति दीदी’ पहल को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। बैठक में केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विजन का उल्लेख करते हुए कहा कि अब तक 3 करोड़ लखपति दीदियां बनाई जा चुकी हैं और लक्ष्य इसे बढ़ाकर 6 करोड़ करना है।

लखपति दीदी का लक्ष्य केवल किसी महिला की आय को एक निर्धारित स्तर तक पहुंचाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे ग्रामीण महिलाओं को स्थायी आय, उद्यमिता, वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जोड़ने का व्यापक उद्देश्य है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि शुरुआती चरण में उन महिलाओं को लखपति दीदी बनाना अपेक्षाकृत आसान था जिनकी आय पहले से 60, 70 या 80 हजार रुपये के आसपास थी। लेकिन अब 6 करोड़ के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए उन महिलाओं की आय बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा जिनकी मौजूदा आय 30, 40 या 50 हजार रुपये के स्तर पर है।

इसका सीधा संबंध ग्रामीण भारत के सबसे कमजोर आर्थिक वर्गों से है। यदि इन महिलाओं को पर्याप्त पूंजी, प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाता है तो वे छोटे व्यवसायों को आगे बढ़ाकर अपनी वार्षिक आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं।

10 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाएं SHG से जुड़ीं

DAY-NRLM के तहत अब तक 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाएं लगभग 92–93 लाख स्वयं सहायता समूहों में संगठित हो चुकी हैं। यह ग्रामीण भारत में महिला सामूहिकता और वित्तीय समावेशन के व्यापक विस्तार को दर्शाता है।

स्वयं सहायता समूहों ने गांवों में महिलाओं को केवल बचत और छोटे ऋण तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि उन्हें सामूहिक उद्यमिता की दिशा में आगे बढ़ाने का माध्यम भी बनाया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में SHG की महिलाएं कृषि से जुड़े कार्यों, पशुपालन, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई-कढ़ाई, हस्तशिल्प, छोटे व्यापार और अन्य स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में भाग ले रही हैं।

ऐसे में बैंक क्रेडिट का विस्तार ग्रामीण महिलाओं के लिए व्यवसाय बढ़ाने, नई गतिविधियां शुरू करने और आय के नए स्रोत विकसित करने का आधार बन सकता है।

SHGs को अब तक 13.67 लाख करोड़ रुपये से अधिक का क्रेडिट

बैठक में बताया गया कि बैंकों ने SHGs को अब तक 13.67 लाख करोड़ रुपये से अधिक का क्रेडिट उपलब्ध कराया है।

यह आंकड़ा बताता है कि SHG-बैंक लिंकेज ग्रामीण वित्तीय समावेशन का एक बड़ा माध्यम बन चुका है। लेकिन अब सरकार का ध्यान केवल ऋण वितरण की मात्रा पर नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने पर भी है कि ऋण सही समय पर, पर्याप्त मात्रा में और जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचे।

कई बार ग्रामीण महिला उद्यमियों के सामने समस्या यह होती है कि उन्हें व्यवसाय शुरू करने या विस्तार करने के लिए ऋण की आवश्यकता होती है, लेकिन ऋण स्वीकृति में देरी होने से उनका अवसर निकल जाता है।

इसी कारण बैठक में तेज और सुलभ क्रेडिट पर विशेष जोर दिया गया।

अगले पांच वर्षों में 10 लाख करोड़ रुपये SHGs को ऋण

केंद्रीय मंत्री ने अगले पांच वर्षों के लिए एक महत्वाकांक्षी वित्तीय लक्ष्य सामने रखा है। इसके तहत स्वयं सहायता समूहों को 10 लाख करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

इसके अतिरिक्त व्यक्तिगत महिला उद्यमियों यानी दीदियों को 1 लाख करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

यह लक्ष्य ग्रामीण महिला उद्यमिता को सामूहिक स्तर के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर पर भी मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

SHG के माध्यम से महिलाएं सामूहिक कारोबार कर सकती हैं, जबकि व्यक्तिगत क्रेडिट के माध्यम से कोई महिला अपने स्तर पर दुकान, प्रसंस्करण इकाई, पशुपालन व्यवसाय, सेवा केंद्र या अन्य उद्यम शुरू अथवा विस्तार कर सकती है।

कृषि परिवारों की महिलाओं के लिए बढ़ सकते हैं अवसर

ग्रामीण भारत में कृषि परिवारों में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। खेती के साथ पशुपालन, डेयरी, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण और स्थानीय स्तर के कई काम महिलाओं द्वारा किए जाते हैं।

यदि बैंक ऋण को इन गतिविधियों से जोड़ा जाता है तो ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भूमिका और मजबूत हो सकती है।

उदाहरण के लिए कोई SHG स्थानीय स्तर पर दूध संग्रह, खाद्य प्रसंस्करण या कृषि उत्पादों की पैकेजिंग का काम शुरू कर सकता है। इसी तरह महिलाएं स्थानीय उत्पादों को ब्रांडिंग और पैकेजिंग के साथ बाजार तक पहुंचा सकती हैं।

इस प्रकार बैंक क्रेडिट केवल ऋण नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उत्पादन और आय बढ़ाने का माध्यम बन सकता है।

सबसे गरीब क्षेत्रों को प्राथमिकता देने पर जोर

बैठक में केंद्रीय मंत्री ने एक महत्वपूर्ण बात कही कि जहां गरीबी अधिक है, वहां क्रेडिट की पहुंच भी अधिक होनी चाहिए।

ग्रामीण भारत में आर्थिक अवसर समान रूप से वितरित नहीं हैं। कुछ क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएं और उद्यमिता पहले से मजबूत हैं, जबकि पिछड़े और अधिक गरीब क्षेत्रों में महिलाओं के पास पूंजी और औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुंच सीमित हो सकती है।

मंत्री ने इस असमानता को दूर करने पर जोर देते हुए कहा कि बैंकिंग व्यवस्था को उन क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

यह दृष्टिकोण ग्रामीण वित्तीय समावेशन को अधिक लक्षित और समावेशी बना सकता है।

बैंक शाखाओं में संवेदनशीलता और प्रशिक्षण की जरूरत

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि SHG की दीदियों को सबसे ज्यादा समस्या बैंक स्तर पर आती है। इसलिए बैंक कर्मचारियों के प्रशिक्षण और संवेदनशीलता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

ग्रामीण महिला उद्यमियों के लिए बैंक की प्रक्रिया कई बार जटिल हो सकती है। दस्तावेज, आवेदन प्रक्रिया, ऋण सीमा, पुनर्भुगतान शर्तों और अन्य बैंकिंग प्रक्रियाओं की जानकारी सीमित होने के कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसे में बैंक कर्मचारियों का व्यवहार और मार्गदर्शन महत्वपूर्ण हो जाता है।

यदि बैंक शाखा स्तर पर महिला उद्यमियों को सरल भाषा में जानकारी और उचित मार्गदर्शन मिले तो ऋण प्रक्रिया अधिक सुगम हो सकती है।

निजी बैंकों की भागीदारी भी जरूरी

बैठक में निजी बैंकों की भूमिका पर भी जोर दिया गया। केंद्रीय मंत्री ने शिकायतों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार निजी बैंकर्स जिला स्तरीय समन्वय समिति (DLCC) की बैठकों में उपस्थित नहीं होते।

ग्रामीण वित्तीय समावेशन को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों बैंकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

यदि बैंकर्स नियमित रूप से SRLM और जिला स्तर की बैठकों में भाग लेते हैं तो स्थानीय समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए बेहतर समन्वय बनाया जा सकता है।

इससे बैंक और ग्रामीण महिला उद्यमियों के बीच दूरी कम हो सकती है।

हर तीन महीने में वर्चुअल और छह महीने में भौतिक समीक्षा

सरकार ने केवल लक्ष्य निर्धारित करने के बजाय उनकी निगरानी के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था बनाने का निर्णय लिया है।

केंद्रीय मंत्री ने निर्देश दिया कि बैठक में किए गए सभी कमिटमेंट्स—चाहे वे NABARD, RBI, बैंकर्स या SRLM से संबंधित हों—को निर्धारित समय सीमा में पूरा किया जाए।

इसके लिए हर तीन महीने में वर्चुअल बैठक और हर छह महीने में भौतिक बैठक आयोजित करने का निर्णय लिया गया है।

नियमित समीक्षा से यह पता लगाया जा सकेगा कि निर्धारित लक्ष्य की दिशा में कितनी प्रगति हुई है और कहां बाधाएं आ रही हैं।

यह व्यवस्था विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बैंकिंग और उद्यमिता से जुड़ी समस्याएं कई बार जिला स्तर पर अलग-अलग होती हैं।

हेल्पलाइन से दूर होंगी ऋण संबंधी समस्याएं

ग्रामीण महिला उद्यमियों के लिए हेल्पलाइन व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया गया है।

यदि किसी महिला का ऋण आवेदन लंबे समय से लंबित है, उसे दस्तावेजों को लेकर परेशानी है या बैंक शाखा स्तर पर कोई समस्या आती है, तो शिकायत और मार्गदर्शन के लिए एक प्रभावी हेल्पलाइन उपयोगी साबित हो सकती है।

इससे महिला उद्यमियों को बार-बार अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने से राहत मिल सकती है।

हेल्पलाइन को बैंकिंग व्यवस्था, SRLM और संबंधित संस्थानों के साथ जोड़ने पर शिकायतों के समाधान की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी हो सकती है।

‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना से काम करने का आह्वान

केंद्रीय मंत्री ने इस अभियान को केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने का आह्वान किया।

उन्होंने भारतीय संस्कृति के सूत्र ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति का दुख अपना दुख समझकर काम किया जाए तो बदलाव अधिक प्रभावी ढंग से लाया जा सकता है।

उन्होंने अधिकारियों, बैंकर्स और अन्य हितधारकों से महिला सशक्तिकरण के लक्ष्य से भावनात्मक रूप से जुड़ने और अपनी भूमिका को केवल नौकरी या पेशे तक सीमित न रखने का आह्वान किया।

यह दृष्टिकोण ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के अंतिम छोर तक प्रभावी क्रियान्वयन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

40-50 हजार रुपये कमाने वाली महिलाओं को लखपति बनाने की चुनौती

6 करोड़ लखपति दीदियों का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अब उन महिलाओं पर विशेष ध्यान देना होगा जिनकी आय अभी लखपति की निर्धारित सीमा से कम है।

30, 40 या 50 हजार रुपये की आय वाली ग्रामीण महिलाओं को यदि अतिरिक्त उद्यम, प्रशिक्षण, बाजार और ऋण उपलब्ध कराया जाता है तो उनकी आय को अगले स्तर तक ले जाया जा सकता है।

इसके लिए केवल ऋण देना पर्याप्त नहीं होगा।

महिलाओं को क्रेडिट + प्रशिक्षण + बाजार + तकनीक + ब्रांडिंग + डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे विभिन्न संसाधनों से जोड़ना होगा।

यदि यह पूरा इकोसिस्टम विकसित होता है तो लखपति दीदी अभियान को स्थायी आर्थिक मॉडल में बदला जा सकता है।

ग्रामीण युवाओं को भी मिल सकता है रोजगार

महिला उद्यमिता के विस्तार का प्रभाव केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहता।

जब किसी गांव में महिला स्वयं सहायता समूह खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, पैकेजिंग या अन्य व्यवसाय शुरू करता है तो उसमें स्थानीय युवाओं के लिए भी रोजगार पैदा हो सकता है।

उद्यम के विस्तार के साथ परिवहन, पैकेजिंग, मार्केटिंग, डिजिटल सेवाओं और सप्लाई चेन से जुड़े अवसर भी विकसित हो सकते हैं।

इस प्रकार ग्रामीण महिलाओं को मिलने वाला ऋण पूरे ग्रामीण परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

वित्तीय समावेशन 2.0 पर आगे बढ़ेगा काम

बैठक में हुई चर्चाओं को Financial Inclusion 2.0 के भविष्य के एक्शन प्लान में शामिल किए जाने की बात कही गई है।

इसका फोकस SHGs को समय पर और पर्याप्त क्रेडिट उपलब्ध कराने, महिला उद्यमियों के लिए समर्पित वित्तीय सहायता बढ़ाने और ग्रामीण भारत में उच्च गुणवत्ता वाली वित्तीय सेवाओं की पहुंच मजबूत करने पर रहेगा।

वित्तीय समावेशन का अगला चरण केवल बैंक खाता खोलने तक सीमित नहीं होगा। इसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को ऐसी वित्तीय सेवाओं से जोड़ना है जो उनकी आय और आर्थिक गतिविधियों को मजबूत कर सकें।

बैंक लोन से आगे बाजार तक पहुंच जरूरी

महिला उद्यमियों के लिए वित्त उपलब्ध कराना पहला कदम है। व्यवसाय को सफल बनाने के लिए बाजार तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी है।

यदि किसी महिला समूह को ऋण मिल जाता है लेकिन उसके उत्पाद के लिए पर्याप्त बाजार नहीं है तो व्यवसाय का विस्तार कठिन हो सकता है।

इसलिए SHGs को स्थानीय बाजार, सरकारी खरीद, डिजिटल कॉमर्स, मेलों, प्रदर्शनियों और अन्य बिक्री चैनलों से जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा।

ग्रामीण उत्पादों की पैकेजिंग, गुणवत्ता और ब्रांडिंग में सुधार करके उनके लिए बड़े बाजार विकसित किए जा सकते हैं।

‘लखपति दीदी’ से ग्रामीण आर्थिक बदलाव की संभावना

लखपति दीदी अभियान का व्यापक प्रभाव ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है।

जब महिला की आय बढ़ती है तो परिवार की आर्थिक क्षमता मजबूत होती है। इससे बच्चों की शिक्षा, बेहतर पोषण, स्वास्थ्य, आवास और अन्य जरूरतों पर खर्च करने की क्षमता भी बढ़ सकती है।

साथ ही महिला की आर्थिक भागीदारी बढ़ने से परिवार के वित्तीय निर्णयों में उसकी भूमिका भी मजबूत हो सकती है।

इसलिए महिला उद्यमिता को बढ़ावा देना केवल रोजगार का विषय नहीं बल्कि ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का माध्यम भी बन सकता है।

6 करोड़ लखपति दीदियों का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है और इसे हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर समन्वित प्रयास की जरूरत होगी।

बैंकों को समय पर ऋण देना होगा। SRLM को SHGs और बैंकों के बीच समन्वय मजबूत करना होगा। NABARD और RBI को वित्तीय प्रणाली से जुड़े समाधान उपलब्ध कराने होंगे। जिला प्रशासन को स्थानीय स्तर पर बाधाओं को दूर करना होगा और महिला समूहों को प्रशिक्षण तथा बाजार से जोड़ना होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि ऋण का वितरण केवल आंकड़ा पूरा करने के लिए न हो, बल्कि वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जाए।

मुंबई में हुई उच्चस्तरीय बैठक ने ग्रामीण महिला सशक्तिकरण के लिए एक स्पष्ट दिशा प्रस्तुत की है। अब लक्ष्य केवल महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों में संगठित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें मजबूत उद्यमी बनाने का है।

DAY-NRLM के तहत 10 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाओं का SHGs से जुड़ना और बैंकों द्वारा 13.67 लाख करोड़ रुपये से अधिक का क्रेडिट उपलब्ध कराना इस यात्रा की बड़ी उपलब्धि है। अब अगले पांच वर्षों में SHGs को 10 लाख करोड़ रुपये और व्यक्तिगत दीदियों को 1 लाख करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराने का लक्ष्य इस अभियान को और बड़े स्तर पर ले जाने की तैयारी है।

सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य 3 करोड़ से 6 करोड़ लखपति दीदियों तक पहुंचना है।

इस लक्ष्य की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सबसे गरीब और दूरदराज गांवों की महिलाओं तक बैंक क्रेडिट कितनी तेजी से पहुंचता है, बैंक शाखाओं में उन्हें कितना सहयोग मिलता है और ऋण को वास्तविक आय-सृजन गतिविधियों से कितना प्रभावी ढंग से जोड़ा जाता है।

यदि वित्तीय सहायता के साथ प्रशिक्षण, तकनीक, बाजार और मार्गदर्शन का मजबूत तंत्र तैयार किया जाता है, तो ग्रामीण महिलाएं केवल ऋण लेने वाली नहीं बल्कि रोजगार पैदा करने वाली उद्यमी बन सकती हैं।

यही बदलाव विकसित भारत की ग्रामीण नींव को मजबूत कर सकता है।

केंद्रीय मंत्री का संदेश स्पष्ट है—लक्ष्य बड़ा है, लेकिन असंभव नहीं। यदि बैंक, सरकार, संस्थाएं, अधिकारी और समाज मिलकर संकल्प के साथ काम करें, तो ग्रामीण भारत की करोड़ों महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख सकती हैं।

 

Tags: FarmingShivraj Singh agriculture
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