भारत को वैश्विक व्यापार में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने मुक्त व्यापार समझौतों यानी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के प्रभावी इस्तेमाल को देशव्यापी अभियान का रूप देने पर जोर दिया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत के मौजूदा और आगामी एफटीए का लाभ केवल बड़े निर्यातकों या महानगरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश के प्रत्येक जिले, छोटे कारोबारी, व्यापारी, उद्यमी, स्टार्टअप, महिला उद्यमी और एमएसएमई तक पहुंचना चाहिए।
नई दिल्ली में आयोजित “एफटीए का लाभ उठाना: एक पहुंच कार्यक्रम” विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत के विस्तारित एफटीए नेटवर्क को वास्तविक निर्यात अवसरों में बदलने के लिए केंद्र, राज्य सरकारों, निर्यात संवर्धन परिषदों और उद्योग संगठनों को मिलकर काम करना होगा।
इस पहल का ग्रामीण भारत के लिए विशेष महत्व है। देश के छोटे शहरों और गांवों में कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, वस्त्र, चमड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, मसाले, कृषि आधारित उत्पाद और अनेक पारंपरिक उत्पाद तैयार होते हैं। यदि इन उत्पादों को वैश्विक बाजारों तक पहुंच मिलती है, तो एफटीए ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए नए रोजगार और आय के अवसर पैदा कर सकते हैं।
780 जिलों तक पहुंचेगा एफटीए अभियान
केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि एफटीए के लाभ को देश के हर हिस्से तक पहुंचाने के लिए अभियान को व्यापक बनाया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से देश के 780 जिलों में छोटे से छोटे व्यवसायी, व्यापारी, उद्यमी, स्टार्टअप और महिला उद्यमी तक पहुंच बनाने की जरूरत बताई।
यह दृष्टिकोण ‘जिला से वैश्विक बाजार’ की अवधारणा को मजबूत कर सकता है। अब किसी जिले की पहचान केवल स्थानीय बाजार या घरेलू बिक्री तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाले प्रतिस्पर्धी उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचाने के लिए आवश्यक जानकारी, प्रमाणन, गुणवत्ता मानक, वित्त और लॉजिस्टिक्स की सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी होगा।
सरकार की ‘जिलों को निर्यात केंद्र बनाने’ (Districts as Export Hubs) पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा अवसर
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि की केंद्रीय भूमिका है, लेकिन गांवों की आर्थिक गतिविधियां केवल खेती तक सीमित नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मसाला प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, हथकरघा, कपड़ा, फर्नीचर, कृषि उपकरण, जैविक और प्राकृतिक उत्पाद तथा कई अन्य छोटे उद्योग सक्रिय हैं।
एफटीए इन उत्पादों को उन विदेशी बाजारों में बेहतर बाजार पहुंच दे सकते हैं जहां भारत को शुल्क संबंधी प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त हो।
किसी ग्रामीण जिले में यदि कोई उत्पाद पहले केवल स्थानीय मंडी, राज्य या देश के दूसरे हिस्सों में बिकता था, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ने पर उसका संभावित बाजार कई गुना बढ़ सकता है।
हालांकि इसके लिए केवल एफटीए पर्याप्त नहीं है। उत्पाद की गुणवत्ता, पैकेजिंग, प्रमाणन, समय पर आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की आवश्यकताओं को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
किसानों को मिल सकता है निर्यात का नया बाजार
भारत के किसानों के लिए वैश्विक बाजार एक बड़ा अवसर है। कई भारतीय कृषि उत्पाद पहले से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी पहचान रखते हैं। मसाले, चावल, चाय, कॉफी, फल, सब्जियां, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और विभिन्न कृषि उत्पादों की विदेशी बाजारों में मांग है।
एफटीए के माध्यम से यदि भारतीय उत्पादों को प्रतिस्पर्धी शुल्क दर मिलती है, तो निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है।
इसका अप्रत्यक्ष लाभ किसानों तक भी पहुंच सकता है, खासकर तब जब किसान उत्पादक संगठन (FPO), सहकारी समितियां और कृषि-आधारित उद्यम सीधे निर्यात श्रृंखला से जुड़ें।
यदि किसी जिले में उत्पाद की पहचान करके उसके लिए निर्यात बाजार विकसित किया जाता है, तो स्थानीय किसानों को बाजार विविधीकरण का अवसर मिल सकता है।
एफटीए और कृषि उत्पादों की संभावनाएं
कार्यशाला में केंद्रीय मंत्री ने कृषि को उन प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया जहां भारत के लिए निर्यात के अवसर मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने अपने एफटीए में किसानों और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए बातचीत की है।
ग्रामीण भारत के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि कृषि उत्पादों का मूल्य केवल खेत में उत्पादन से तय नहीं होता। यदि उसी उत्पाद को साफ-सफाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और ब्रांडिंग के साथ विदेशी बाजार तक पहुंचाया जाए तो उसका आर्थिक मूल्य बढ़ सकता है।
इसलिए एफटीए का प्रभाव केवल निर्यातकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। किसान, FPO, कृषि प्रसंस्करण इकाइयां, भंडारण केंद्र, पैकेजिंग उद्योग और स्थानीय परिवहन व्यवस्था भी इस पूरी मूल्य श्रृंखला का हिस्सा बन सकते हैं।
छोटे किसानों और FPO के लिए जरूरी होगी जानकारी
ग्रामीण क्षेत्रों में एक बड़ी चुनौती यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों और एफटीए के नियमों की जानकारी छोटे उत्पादकों तक सीमित होती है।
एक बड़े निर्यातक के पास अपनी कानूनी और व्यापारिक टीम हो सकती है, लेकिन एक छोटा किसान समूह या ग्रामीण MSME इन नियमों को समझने के लिए विशेषज्ञों पर निर्भर रहता है।
इसी कारण केंद्रीय मंत्री ने एफटीए की जानकारी को स्थानीय भाषाओं में और आसानी से समझ आने वाले तरीके से उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। निर्यात संवर्धन परिषदों और उद्योग संगठनों को अपने संदेश अंतिम छोर तक पहुंचाने की जरूरत बताई गई है।
यदि यह जानकारी हिंदी, पंजाबी, मराठी, गुजराती, बंगाली, तमिल, तेलुगु और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराई जाती है, तो छोटे उद्यमियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार को समझना आसान हो सकता है।
महिला उद्यमियों के लिए भी खुलेंगे अवसर
ग्रामीण भारत में महिलाओं की भूमिका अब केवल कृषि कार्य तक सीमित नहीं है। बड़ी संख्या में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों, छोटे कारोबार, खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, सिलाई-कढ़ाई, डेयरी और अन्य गतिविधियों से जुड़ी हैं।
यदि महिला उद्यमियों को निर्यात संबंधी प्रशिक्षण, गुणवत्ता प्रमाणन, पैकेजिंग और डिजिटल कॉमर्स की जानकारी मिलती है तो वे अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ सकती हैं।
सरकार ने एफटीए अभियान में महिला उद्यमियों को विशेष रूप से शामिल करने की बात कही है। यह ग्रामीण महिलाओं को स्थानीय व्यवसाय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर बढ़ने का अवसर दे सकता है।
ई-कॉमर्स बनेगा ग्रामीण निर्यात का माध्यम
केंद्रीय मंत्री ने पहली बार निर्यात करने वालों और नए उत्पादों की पहचान पर जोर दिया तथा कहा कि ई-कॉमर्स छोटे और मध्यम उद्यमों तथा पहली बार निर्यात करने वालों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश का अपेक्षाकृत आसान रास्ता उपलब्ध कराता है।
ग्रामीण उद्यमियों के लिए ई-कॉमर्स का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
पहले किसी छोटे गांव में बने उत्पाद को विदेशी खरीदार तक पहुंचाने के लिए कई स्तर के बिचौलियों की आवश्यकता पड़ती थी। डिजिटल प्लेटफॉर्म इस दूरी को कम कर सकते हैं।
हालांकि डिजिटल बिक्री के साथ उत्पाद की गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय शिपिंग, रिटर्न, भुगतान, प्रमाणन और ग्राहक सेवा जैसी चुनौतियों का समाधान भी जरूरी होगा।
भारत के नौ एफटीए से बड़ा बाजार
केंद्रीय मंत्री के अनुसार भारत के नौ एफटीए लगभग 60 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त GDP वाली अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंच प्रदान करते हैं और वैश्विक व्यापार के लगभग दो-तिहाई हिस्से तक तरजीही पहुंच का आधार बनते हैं। आगामी समझौतों और बाजार पहुंच को और गहरा करने के प्रयासों के साथ भारत वैश्विक व्यापार के लगभग 75 प्रतिशत हिस्से तक प्रतिस्पर्धी दरों पर पहुंच बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
यह आंकड़ा भारत के लिए संभावित बाजार का बड़ा संकेत देता है।
लेकिन बाजार तक पहुंच और बाजार का वास्तविक उपयोग दो अलग बातें हैं। किसी देश के साथ एफटीए होने का अर्थ यह नहीं है कि हर भारतीय उत्पाद स्वतः सफल हो जाएगा। उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता, कीमत, पैकेजिंग और समय पर आपूर्ति के मानकों पर खरा उतरना होगा।
वस्त्र उद्योग में भारत की प्रतिस्पर्धा
वस्त्र उद्योग का उदाहरण देते हुए केंद्रीय मंत्री ने बांग्लादेश और वियतनाम के साथ भारत की प्रतिस्पर्धा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अब कई विकसित बाजारों में भारत को प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर दरों का लाभ मिल रहा है। ऐसे में भारतीय उद्योग के सामने अब पैमाने, गुणवत्ता, ग्राहक विश्वास, समय पर डिलीवरी और पैकेजिंग के स्तर पर बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है।
इसका ग्रामीण क्षेत्र से भी सीधा संबंध है।
भारत के गांवों में हथकरघा, हस्तशिल्प और वस्त्र निर्माण से जुड़े हजारों छोटे समूह और कारीगर हैं। यदि इन्हें आधुनिक डिजाइन, गुणवत्ता मानक और निर्यात बाजार से जोड़ा जाए तो ग्रामीण हस्तशिल्प और टेक्सटाइल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बाजार मिल सकता है।
एमएसएमई बनेंगे निर्यात विस्तार की रीढ़
भारत के छोटे और मध्यम उद्यमों को एफटीए का वास्तविक लाभ पहुंचाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
कई MSME पहले से घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धी उत्पाद तैयार कर रहे हैं, लेकिन वे निर्यात की प्रक्रिया से अपरिचित हैं।
उनके लिए निर्यात लाइसेंस, प्रमाणन, सीमा शुल्क प्रक्रिया, मूल देश प्रमाणपत्र, विदेशी खरीदारों की आवश्यकताएं और भुगतान व्यवस्था जैसी चीजें चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।
इसीलिए निर्यात प्रोत्साहन मिशन के तहत निर्यात ऋण तक आसान पहुंच, डिजिटल अनुपालन और एफटीए दस्तावेजीकरण में सहायता जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया जा रहा है।
जिला स्तर पर बनेगा निर्यात का इकोसिस्टम
एफटीए अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका जिला और क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण है।
प्रत्येक जिले में ऐसे उत्पादों की पहचान की जा सकती है जिनमें अंतरराष्ट्रीय बाजार की संभावना है। इसके बाद उत्पादक समूहों, MSME, FPO, कारीगरों और व्यापारियों को एक साथ जोड़कर निर्यात क्लस्टर विकसित किए जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए किसी जिले में मसाले प्रमुख उत्पाद हैं तो वहां मसाला प्रसंस्करण, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, परीक्षण और निर्यात की सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।
किसी दूसरे जिले में हस्तशिल्प प्रमुख है तो डिजाइन, गुणवत्ता और ई-कॉमर्स आधारित निर्यात मॉडल विकसित किया जा सकता है।
इस प्रकार हर जिले की स्थानीय ताकत को वैश्विक बाजार से जोड़ा जा सकता है।
1 ट्रिलियन डॉलर निर्यात लक्ष्य
भारत ने चालू वर्ष के लिए 1 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। अप्रैल से जुलाई की अवधि में भारत का निर्यात लगभग 317 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह लगभग 280 अरब डॉलर था।
सरकार का लक्ष्य केवल बड़े निर्यातकों के माध्यम से इस वृद्धि को हासिल करना नहीं है। छोटे निर्यातकों को बड़ा बनाने और नए निर्यातकों को तैयार करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
ग्रामीण भारत इस रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
यदि हजारों छोटे व्यवसाय भी निर्यात श्रृंखला में शामिल होते हैं तो देश के निर्यात आधार का विस्तार होगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
2047 के लिए बड़ी आर्थिक महत्वाकांक्षा
केंद्रीय मंत्री ने भारत को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बड़ा हिस्सा हासिल करने का लक्ष्य सामने रखा।
उन्होंने 2030 तक 2 ट्रिलियन डॉलर के निर्यात लक्ष्य की दिशा में प्रयास जारी रखने पर भी जोर दिया।
इतने बड़े लक्ष्य के लिए भारत को निर्यातकों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ नए जिलों और नए उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में शामिल करना होगा।
यही कारण है कि एफटीए का लाभ अंतिम छोर तक पहुंचाने की रणनीति महत्वपूर्ण हो जाती है।
गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर जोर
वैश्विक बाजार में प्रवेश के लिए केवल कम कीमत पर्याप्त नहीं है। भारतीय उत्पादों को गुणवत्ता, तकनीकी मानकों, स्वच्छता और SPS मानकों का पालन करना होगा।
केंद्रीय मंत्री ने तकनीकी मानकों और स्वच्छता एवं SPS मानकों के महत्व पर जोर दिया तथा भारत को एक विश्वसनीय वैश्विक साझेदार के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता बताई।
कृषि निर्यात के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। फल, सब्जियां, मसाले, प्रसंस्कृत खाद्य और अन्य कृषि उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा के कठोर मानक लागू होते हैं।
ग्रामीण उत्पादकों को इन मानकों की जानकारी देना इसलिए आवश्यक होगा।
लॉजिस्टिक्स और पहाड़ी क्षेत्रों की चुनौतियां
देश के कुछ दूरदराज क्षेत्रों के लिए परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत बड़ी चुनौती है। केंद्रीय मंत्री ने पहाड़ी क्षेत्रों, पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों से होने वाले निर्यात की चुनौतियों का उल्लेख करते हुए सहायता की आवश्यकता बताई।
ग्रामीण निर्यात के लिए बेहतर सड़क, कोल्ड चेन, वेयरहाउस, पैकेजिंग और परिवहन सुविधाएं महत्वपूर्ण होंगी।
यदि उत्पाद गांव से बंदरगाह या एयर कार्गो तक समय पर नहीं पहुंचता तो एफटीए से मिलने वाला शुल्क लाभ भी पर्याप्त साबित नहीं होगा।
स्थानीय भाषा में जानकारी की जरूरत
ग्रामीण उद्यमियों को वैश्विक बाजार से जोड़ने के लिए स्थानीय भाषा में जानकारी उपलब्ध कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सरकार और निर्यात संवर्धन परिषदों को एफटीए की जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध करानी होगी। छोटे व्यवसायी को यह समझना होगा कि किस देश में उसके उत्पाद की मांग है, वहां कितना शुल्क लागू है, कौन से प्रमाणपत्र जरूरी हैं और निर्यात की प्रक्रिया क्या है।
ऐसी जानकारी यदि जिला स्तर पर हेल्पडेस्क, प्रशिक्षण कार्यक्रम और डिजिटल माध्यम से उपलब्ध होती है तो नए निर्यातकों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है।
सरकार, राज्य और उद्योग की संयुक्त जिम्मेदारी
एफटीए का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए केवल केंद्र सरकार की भूमिका पर्याप्त नहीं होगी।
राज्य सरकारों, जिला प्रशासन, निर्यात संवर्धन परिषदों, उद्योग संगठनों, बैंकों, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म को भी मिलकर काम करना होगा।
केंद्रीय मंत्री ने राज्यों और केंद्र के बीच सहयोग मजबूत करने तथा क्षेत्रवार और क्लस्टरवार कार्यशालाएं आयोजित करने पर जोर दिया है। जिला या राज्य स्तर पर संपर्क सूत्र के साथ सुविधा तंत्र बनाने की बात भी कही गई है।
ग्रामीण भारत से वैश्विक भारत की ओर
भारत के लिए एफटीए का वास्तविक महत्व तभी सामने आएगा जब इसका लाभ देश के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचेगा।
एक गांव का किसान उत्पादक संगठन, एक महिला स्वयं सहायता समूह, एक छोटा खाद्य प्रसंस्करण उद्यम, एक हस्तशिल्प कारीगर या किसी जिले का छोटा MSME यदि वैश्विक खरीदार से जुड़ता है तो वह केवल अपने व्यवसाय का विस्तार नहीं करता, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में रोजगार और आय का नया चक्र भी शुरू करता है।
यही कारण है कि एफटीए को केवल व्यापार समझौता न मानकर ग्रामीण विकास और उद्यमिता के एक अवसर के रूप में भी देखा जा सकता है।
भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती एफटीए पर हस्ताक्षर करने से आगे बढ़कर उनके वास्तविक उपयोग की है।
हर राज्य को अपने ऐसे उत्पादों और समूहों की पहचान करनी होगी जिन्हें एफटीए से पहले से लाभ मिल रहा है और उन क्षेत्रों की भी पहचान करनी होगी जहां अवसर होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है।
इसके साथ ही पहली बार निर्यात करने वालों की पहचान, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन करना होगा।
केंद्र सरकार की रणनीति में नए निर्यातकों को बढ़ावा देना, छोटे निर्यातकों को बड़े निर्यातकों में बदलना, उत्पाद भंडार का विस्तार करना और जिला स्तर तक निर्यात के अवसर पहुंचाना शामिल है।
यदि यह रणनीति प्रभावी ढंग से लागू होती है तो भारत के निर्यात मानचित्र में बड़े महानगरों के साथ-साथ छोटे शहरों और ग्रामीण जिलों की भूमिका भी बढ़ सकती है।
एफटीए भारत के लिए वैश्विक बाजार में बेहतर पहुंच का रास्ता खोलते हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब देश के छोटे उद्यमी और ग्रामीण उत्पादक भी इनका उपयोग करना सीखेंगे।
कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, फार्मास्यूटिकल्स, समुद्री उत्पाद, रत्न एवं आभूषण और चमड़ा जैसे क्षेत्रों में देश के अलग-अलग जिलों की अपनी विशेष ताकत है।
इन स्थानीय ताकतों को वैश्विक मांग से जोड़ना भारत के निर्यात विस्तार की अगली बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है।
केंद्रीय मंत्री का यह आह्वान कि एफटीए का लाभ हर जिले, हर छोटे व्यवसायी, हर उद्यमी और हर महिला उद्यमी तक पहुंचे, ग्रामीण भारत के लिए विशेष महत्व रखता है।
यदि जिला स्तर पर सही उत्पाद की पहचान, गुणवत्ता सुधार, वित्त, प्रमाणन, डिजिटल बाजार, लॉजिस्टिक्स और निर्यात मार्गदर्शन की व्यवस्था मजबूत होती है, तो गांवों से निकलने वाले उत्पाद दुनिया के बाजारों तक पहुंच सकते हैं।
इससे न केवल भारत के निर्यात में वृद्धि होगी, बल्कि ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार, महिलाओं के लिए उद्यमिता, किसानों के लिए नए बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

