• About
  • Advertise
  • Privacy & Policy
  • Contact
Fasal Kranti Agriculture News
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
  • Login
No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry
No Result
View All Result
Fasal Kranti Agriculture News
No Result
View All Result
Home कृषि समाचार

टेक्सटाइल वेस्ट बनेगा ग्रामीण भारत के लिए रोजगार और कारोबार का नया आधार, जेम और टेक्सटाइल कमेटी ने किया एमओयू

Textile waste will become a new source of employment and business for rural India.

Emran Khan by Emran Khan
September 4, 2026
in कृषि समाचार, ब्रेकिंग न्यूज़
0
केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी में हुआ समझौता

केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी में हुआ समझौता

0
SHARES
2
VIEWS
Share on FacebookShare on Twitter

भारत में तेजी से बढ़ते कपड़ा कचरे को अब केवल पर्यावरणीय चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) और कपड़ा मंत्रालय के अंतर्गत टेक्सटाइल कमेटी (TC) ने रीसाइक्ल्ड और अपसाइक्ल्ड वस्त्र उत्पादों की सार्वजनिक खरीद को बढ़ावा देने के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।

मुंबई में टेक्सटाइल कमेटी के 62वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान हुए इस समझौते का उद्देश्य प्री-कंज्यूमर और पोस्ट-कंज्यूमर टेक्सटाइल वेस्ट, कपड़ा कतरन तथा पुराने कपड़ों को उपयोगी और मूल्यवर्धित उत्पादों में बदलकर उन्हें सरकारी खरीद प्रणाली से जोड़ना है।

यह पहल केवल शहरों में मौजूद टेक्सटाइल उद्योगों और रीसाइक्लिंग इकाइयों तक सीमित नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण संभावित प्रभाव ग्रामीण भारत में देखने को मिल सकता है, जहां बड़ी संख्या में बुनकर, दर्जी, कारीगर, महिला स्वयं सहायता समूह, छोटे उद्यमी और पारंपरिक हस्तशिल्प से जुड़े परिवार पहले से ही कपड़े, धागे और अन्य टेक्सटाइल सामग्री के साथ काम करते हैं।

वेस्ट से वैल्यू और वैल्यू से मार्केट तक का नया मॉडल

जेम और टेक्सटाइल कमेटी की साझेदारी का मूल विचार ‘वेस्ट-टू-वैल्यू-टू-मार्केट’ इकोसिस्टम तैयार करना है। इसका अर्थ है कि कपड़ा कचरे को पहले एकत्रित किया जाए, उसके बाद उसकी छंटाई और प्रोसेसिंग कर उसे नए उत्पादों में बदला जाए और अंततः उन उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराया जाए।

आज कपड़ा उद्योग में बड़ी मात्रा में कतरन, अनुपयोगी कपड़े, पुराने वस्त्र और उत्पादन के दौरान निकलने वाला टेक्सटाइल वेस्ट पैदा होता है। यदि इस सामग्री को व्यवस्थित रूप से एकत्रित करके रीसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग से जोड़ा जाए तो इससे कचरे की मात्रा कम होने के साथ-साथ नए आर्थिक अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

सरकारी खरीद इस पूरी प्रक्रिया में एक बड़ा बाजार उपलब्ध करा सकती है। जेम के माध्यम से सरकारी विभागों, संस्थानों और अन्य सार्वजनिक खरीदारों तक रीसाइक्ल्ड और अपसाइक्ल्ड उत्पादों की पहुंच बनने से ऐसे उत्पाद बनाने वाले छोटे उद्यमियों को नियमित और संगठित बाजार मिल सकता है।

गांवों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कपड़ा आधारित गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। इनमें बुनाई, सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प, कालीन निर्माण, कपड़ा निर्माण, पुराने कपड़ों की मरम्मत और पुन: उपयोग जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने कपड़ों और टेक्सटाइल वेस्ट को अक्सर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग तरीकों से दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। महिलाएं पुराने कपड़ों से बैग, पोटली, चटाई, सजावटी वस्तुएं, बच्चों के कपड़े, रजाई, कुशन कवर और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएं तैयार करती रही हैं।

यदि इन पारंपरिक गतिविधियों को बाजार, डिजाइन, गुणवत्ता मानकों, प्रशिक्षण और डिजिटल बिक्री से जोड़ा जाए तो यही काम ग्रामीण उद्यमिता का रूप ले सकता है।

जेम-टेक्सटाइल कमेटी का समझौता इस दिशा में एक संरचित बाजार उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। खासतौर पर ग्रामीण महिला समूहों और छोटे कारीगरों के लिए सरकारी खरीद का बाजार नए अवसर पैदा कर सकता है।

महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए बड़ा अवसर

ग्रामीण भारत में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) ने महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश के अनेक गांवों में महिलाएं सिलाई, कढ़ाई, हस्तशिल्प, बैग निर्माण, घरेलू उपयोग की वस्तुओं और अन्य उत्पादों के निर्माण से जुड़ी हैं।

टेक्सटाइल वेस्ट का उपयोग इन समूहों के लिए कम लागत वाले कच्चे माल का स्रोत बन सकता है।

उदाहरण के लिए कपड़ा उद्योग से निकलने वाली कतरन को इकट्ठा करके महिला समूह उससे कपड़े के बैग, फोल्डर, फाइल कवर, पाउच, डस्टर, सजावटी उत्पाद, उपयोगी घरेलू सामान और कार्यालयों में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न वस्तुएं तैयार कर सकते हैं।

यदि ऐसे उत्पाद गुणवत्ता मानकों को पूरा करते हैं और जेम पर सूचीबद्ध किए जाते हैं तो ग्रामीण महिला समूहों को स्थानीय बाजार से आगे निकलकर सरकारी खरीदारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है।

इससे महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ-साथ गांवों में स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने में भी मदद मिल सकती है।

कारीगरों और पारंपरिक कौशल को मिलेगा नया बाजार

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कपड़ा और हस्तशिल्प से जुड़े अनेक पारंपरिक कौशल पीढ़ियों से चले आ रहे हैं। समस्या यह है कि कई बार इन कारीगरों के पास उत्पाद बनाने का कौशल तो होता है, लेकिन बड़े बाजार तक पहुंच नहीं होती।

टेक्सटाइल वेस्ट को मूल्यवर्धित उत्पादों में बदलने का मॉडल ऐसे कारीगरों के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है।

पुराने कपड़ों या कपड़ा कतरन से बने उत्पादों में स्थानीय कला, कढ़ाई, पारंपरिक डिजाइन और क्षेत्रीय पहचान को शामिल किया जा सकता है। इससे ‘लोकल’ उत्पादों को सरकारी खरीद के बाजार में जगह मिल सकती है।

यह पहल ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के साथ भी जुड़ती है।

GeM पर बनेंगी समर्पित श्रेणियां

एमओयू के तहत GeM रीसाइक्ल्ड और अपसाइक्ल्ड टेक्सटाइल उत्पादों के लिए समर्पित श्रेणियां बनाने की दिशा में काम करेगा। इसके साथ ही विक्रेताओं के ऑनबोर्डिंग और ऑनलाइन मार्केट लिंकेज को सुविधाजनक बनाया जाएगा।

यह कदम छोटे उत्पादकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक छोटे उद्यमी अपने उत्पाद तैयार तो करते हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं होती कि सरकारी विभागों को किस प्रकार बेचा जाए।

डिजिटल सरकारी बाजार से जुड़ने के बाद इन उद्यमियों को देश के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद सरकारी खरीदारों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है।

हालांकि इसके लिए डिजिटल साक्षरता, उत्पाद कैटलॉग बनाने, मूल्य निर्धारण, पैकेजिंग, गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण भी जरूरी होगा।

इसी कारण इस साझेदारी में प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

टेक्सटाइल कमेटी निभाएगी महत्वपूर्ण भूमिका

समझौते के तहत टेक्सटाइल कमेटी रीसाइक्ल्ड और अपसाइक्ल्ड वस्त्र उत्पादों के पात्र निर्माताओं की पहचान, सत्यापन, प्रमाणीकरण और मान्यता में सहायता करेगी।

इसके अलावा हितधारकों से परामर्श, क्षमता निर्माण, बाजार अनुसंधान और तकनीकी विनिर्देश तैयार करने में भी सहयोग दिया जाएगा।

ग्रामीण उत्पादकों के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी बाजार में प्रवेश के लिए केवल उत्पाद बनाना पर्याप्त नहीं होता। उत्पाद की गुणवत्ता, सुरक्षा, टिकाऊपन, आकार, पैकेजिंग और अन्य तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करना भी आवश्यक होता है।

तकनीकी प्रशिक्षण और प्रमाणन व्यवस्था छोटे उत्पादकों को इन मानकों के अनुरूप तैयार करने में मदद कर सकती है।

हब-एंड-स्पोक मॉडल से गांवों तक पहुंच

इस साझेदारी में हब-एंड-स्पोक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। इसका उद्देश्य टेक्सटाइल कमेटी और उसके संबद्ध कार्यालयों के माध्यम से अंतिम छोर तक पहुंच बनाना तथा रीसाइक्लर्स और अपसाइक्लर्स को व्यवस्थित तरीके से जोड़ना है।

ग्रामीण भारत के संदर्भ में यह मॉडल विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।

एक क्षेत्रीय स्तर पर टेक्सटाइल वेस्ट संग्रह और प्रसंस्करण का ‘हब’ विकसित किया जा सकता है, जबकि आसपास के गांवों में छोटे समूह या उद्यमी ‘स्पोक’ के रूप में काम कर सकते हैं।

इस व्यवस्था में गांवों से टेक्सटाइल वेस्ट एकत्रित किया जा सकता है, उसकी छंटाई और प्राथमिक प्रोसेसिंग की जा सकती है तथा स्थानीय स्तर पर कुछ उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

इससे परिवहन लागत कम करने और ग्रामीण क्षेत्रों में ही मूल्यवर्धन करने की संभावना बढ़ सकती है।

पुराने कपड़ों से बन सकते हैं नए उत्पाद

ग्रामीण क्षेत्रों में इस पहल के तहत अनेक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। पुराने कपड़ों और कतरन का उपयोग करके उपयोगी और बाजार योग्य उत्पादों की लंबी श्रृंखला विकसित की जा सकती है।

इनमें कपड़े के बैग, कार्यालय फाइल कवर, फोल्डर, पाउच, एप्रन, डस्टर, कुशन कवर, टेबल मैट, सजावटी वस्तुएं, पैकेजिंग सामग्री और अन्य गैर-परिधान उत्पाद शामिल हो सकते हैं।

कई उत्पादों में नए कपड़े की आवश्यकता कम की जा सकती है और उपलब्ध टेक्सटाइल वेस्ट का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है।

यदि डिजाइन और गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाए तो ऐसे उत्पाद पर्यावरण-अनुकूल और आकर्षक दोनों हो सकते हैं।

ग्रामीण रोजगार को मिल सकती है गति

सर्कुलर टेक्सटाइल इकोनॉमी केवल रीसाइक्लिंग इकाइयों तक सीमित नहीं रहती। इसके साथ एक पूरी मूल्य श्रृंखला विकसित हो सकती है।

इसमें कपड़ा कचरा संग्रह करने वाले लोग, छंटाई करने वाले श्रमिक, सफाई और प्रोसेसिंग इकाइयां, डिजाइनर, दर्जी, कारीगर, पैकेजिंग कर्मचारी, परिवहनकर्ता और डिजिटल बिक्री से जुड़े लोग शामिल हो सकते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह मूल्य श्रृंखला गैर-कृषि रोजगार के अवसर बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

विशेष रूप से उन गांवों में जहां कृषि आय मौसमी है, वहां टेक्सटाइल आधारित छोटे उद्यम परिवारों के लिए अतिरिक्त आय का माध्यम बन सकते हैं।

किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए अप्रत्यक्ष लाभ

टेक्सटाइल वेस्ट से जुड़े उद्यमों का लाभ केवल कारीगरों तक सीमित नहीं रहेगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नए गैर-कृषि आय स्रोत के विकसित होने से स्थानीय बाजार में आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

जब गांव में ही रोजगार और उद्यमिता के अवसर बढ़ते हैं तो स्थानीय स्तर पर वस्तुओं और सेवाओं की मांग भी बढ़ती है। इसका फायदा परिवहन, पैकेजिंग, मशीनरी, सिलाई उपकरण और अन्य छोटे व्यवसायों को मिल सकता है।

इस प्रकार सर्कुलर टेक्सटाइल इकोनॉमी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विविधीकरण में योगदान कर सकती है।

MSME और स्थानीय उद्यमियों को मिलेगा मंच

इस पहल में MSME और स्थानीय उद्यमों पर विशेष ध्यान दिया गया है। भारत में छोटे और मध्यम आकार के अनेक टेक्सटाइल उद्यम उत्पादन के दौरान बड़ी मात्रा में कतरन और अन्य वेस्ट उत्पन्न करते हैं।

यदि इन अवशेषों को दूसरे उद्यमियों तक पहुंचाया जाए तो एक स्थानीय औद्योगिक चक्र विकसित हो सकता है।

एक इकाई से निकलने वाला कपड़ा कचरा दूसरी इकाई के लिए कच्चा माल बन सकता है। इससे संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग होगा और कचरे को आर्थिक मूल्य में बदला जा सकेगा।

यह मॉडल छोटे शहरों और ग्रामीण औद्योगिक क्षेत्रों में विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

कपड़ा उद्योग संसाधनों, ऊर्जा और पानी के उपयोग से जुड़ा हुआ है। ऐसे में पुराने वस्त्रों और उत्पादन के दौरान निकलने वाली सामग्री का दोबारा उपयोग संसाधनों पर दबाव कम करने में योगदान दे सकता है।

रीसाइक्लिंग और अपसाइक्लिंग के माध्यम से उपयोगी सामग्री का जीवन बढ़ाया जा सकता है। इससे लैंडफिल में जाने वाले टेक्सटाइल वेस्ट को कम करने में मदद मिल सकती है।

सर्कुलर अर्थव्यवस्था का मूल विचार ही यही है कि उत्पादों और संसाधनों को लंबे समय तक आर्थिक चक्र में बनाए रखा जाए और कचरे को न्यूनतम किया जाए।

सरकारी खरीद से बढ़ेगा भरोसा

रीसाइक्ल्ड उत्पादों के सामने एक बड़ी चुनौती बाजार में भरोसे और गुणवत्ता की होती है। सरकारी खरीद प्रणाली में प्रमाणित और मानकीकृत उत्पादों को शामिल करने से ऐसे उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ सकती है।

GeM के माध्यम से सरकारी संस्थानों को यदि प्रमाणित रीसाइक्ल्ड और अपसाइक्ल्ड उत्पाद उपलब्ध होते हैं तो सार्वजनिक क्षेत्र में इन उत्पादों की स्वीकार्यता बढ़ने की संभावना है।

सरकारी खरीद का पैमाना बड़ा होने के कारण यह मांग छोटे उत्पादकों के लिए स्थायी बाजार का आधार भी बन सकती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षण होगा अहम

इस पहल को सफल बनाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षण का विस्तार आवश्यक होगा।

कारीगरों और महिला समूहों को केवल सिलाई या उत्पाद निर्माण का प्रशिक्षण देने के बजाय उन्हें डिजाइन, गुणवत्ता, पैकेजिंग, लागत निर्धारण, डिजिटल कैटलॉग, ऑनलाइन ऑर्डर प्रबंधन और सरकारी खरीद प्रक्रिया की जानकारी देना भी जरूरी होगा।

यदि ग्रामीण उद्यमियों को इन सभी पहलुओं पर प्रशिक्षण मिलता है तो वे GeM जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का अधिक प्रभावी तरीके से उपयोग कर सकेंगे।

‘कचरा‘ नहीं, आर्थिक संसाधन के रूप में टेक्सटाइल वेस्ट

इस साझेदारी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि टेक्सटाइल वेस्ट को केवल कचरे के रूप में देखने के बजाय उसे आर्थिक संसाधन के रूप में देखा जाए।

पुराने कपड़े, उत्पादन की कतरन और अन्य टेक्सटाइल अवशेष उचित तकनीक और डिजाइन के माध्यम से नए उत्पादों में बदले जा सकते हैं।

ग्रामीण भारत में जहां संसाधन सीमित हैं लेकिन श्रम, कौशल और स्थानीय रचनात्मकता प्रचुर मात्रा में है, वहां यह मॉडल विशेष रूप से प्रभावी हो सकता है।

केंद्रीय मंत्री की मौजूदगी में हुआ समझौता

मुंबई में आयोजित टेक्सटाइल कमेटी के 62वें स्थापना दिवस समारोह में केंद्रीय कपड़ा मंत्री श्री गिरिराज सिंह और महाराष्ट्र सरकार के कपड़ा मंत्री श्री संजय सावकारे की उपस्थिति में यह पहल सामने आई।

वरिष्ठ अधिकारियों और उद्योग हितधारकों की मौजूदगी में GeM के अपर CEO श्री अजीत बी. चव्हाण और टेक्सटाइल कमेटी के सचिव श्री कार्तिकेय धंडा ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।

GeM के CEO श्री मिहिर कुमार ने कहा कि प्रमाणन, मानकीकरण और बाजार तक पहुंच को जोड़कर GeM-TC साझेदारी टेक्सटाइल वेस्ट से बने उत्पादों के लिए विश्वसनीय मांग पैदा करना चाहती है। सरकारी खरीद के व्यापक पैमाने के माध्यम से कार्यालयों, संस्थानों, उपहार देने और अन्य सार्वजनिक उपयोग की आवश्यकताओं में ऐसे उत्पादों को अपनाने की गति बढ़ाई जा सकती है।

आगे की राह

जेम और टेक्सटाइल कमेटी की यह साझेदारी भारत में सर्कुलर टेक्सटाइल इकोनॉमी के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसका लाभ देश के अंतिम छोर तक कितनी प्रभावी तरीके से पहुंचता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में संग्रह केंद्र, प्रशिक्षण सुविधाएं, महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी, स्थानीय रीसाइक्लिंग इकाइयां, कारीगर क्लस्टर और डिजिटल बाजार से जुड़ाव इस मॉडल को मजबूत आधार दे सकते हैं।

यदि गांवों में मौजूद कौशल और उपलब्ध टेक्सटाइल वेस्ट को संगठित बाजार से जोड़ा जाता है तो यह पहल एक साथ कई उद्देश्यों को पूरा कर सकती है—कचरे में कमी, संसाधन संरक्षण, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण रोजगार, MSME विकास और स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा।

आने वाले समय में भारत के गांव केवल कृषि उत्पादों के केंद्र ही नहीं, बल्कि सर्कुलर और हरित अर्थव्यवस्था के नए उत्पादन केंद्र भी बन सकते हैं। टेक्सटाइल वेस्ट से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने का मॉडल इस परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण साबित हो सकता है।

सरकारी खरीद के विशाल बाजार को ग्रामीण कारीगरों और छोटे उद्यमों से जोड़ने की यह पहल यदि प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो ‘वेस्ट टू वैल्यू’ का विचार वास्तविक रूप से ‘वेस्ट टू रोजगार, रोजगार टू आय और आय टू ग्रामीण विकास‘ में बदल सकता है।

इस प्रकार GeM और टेक्सटाइल कमेटी का यह समझौता केवल कपड़ा कचरे के प्रबंधन की पहल नहीं है, बल्कि यह भारत में एक ऐसे समावेशी और टिकाऊ आर्थिक मॉडल की नींव रख सकता है, जिसमें शहरों से निकलने वाला टेक्सटाइल वेस्ट गांवों के लिए कच्चा माल बने और ग्रामीण कौशल उसे नए आर्थिक अवसर में बदल सके।

 

Tags: FarmingRural IndiaTextile IndiaTexttile
Previous Post

पोल्ट्री सेक्टर के लिए गुणवत्तापूर्ण मक्का की बढ़ती जरूरत, पूर्वी भारत में 25–30 मिलियन टन अतिरिक्त उत्पादन की संभावना

Next Post

एफटीए का लाभ गांव-गांव तक पहुंचाने की तैयारी, भारत के 780 जिलों से बढ़ेगा वैश्विक निर्यात

Next Post
एफटीए का लाभ गांव-गांव तक पहुंचाने की तैयारी, भारत के 780 जिलों से बढ़ेगा वैश्विक निर्यात

एफटीए का लाभ गांव-गांव तक पहुंचाने की तैयारी, भारत के 780 जिलों से बढ़ेगा वैश्विक निर्यात

Recent Posts

  • Organic Cotton Farming: जानें क्या है लागत, उत्पादन और बाजार की पूरी जानकारी
  • BRAND R.COMM 2026 का आधिकारिक लॉन्च, कृषि और ग्रामीण संचार जगत के दिग्गजों का जुटेगा मंच
  • बकरी पालन से आय कैसे बढ़ाएं? वैज्ञानिक तरीके अपनाकर कम लागत में बढ़ाएं मुनाफा
  • त्रिपुरा के किसानों की आय बढ़ाने पर जोर, Integrated Farming System में High-Income Components जोड़ने की सलाह
  • 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य में Fisheries और Aquaculture की बड़ी भूमिका, ICAR-CIBA की Research & Development गतिविधियों की समीक्षा

Recent Comments

No comments to show.
Fasal Kranti is a leading monthly agricultural magazine dedicated to empowering Indian farmers. Published scince 2013 in Hindi, Punjabi, Marathi, and Gujarati, it provides valuable insights, modern farming techniques, and the latest agricultural updates. With a vision to support 21st-century farmers, Fasal Kranti strives to be a trusted source of knowledge and innovation in the agricultural sector.

Category

  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes

Newsletter

Subscribe to our Newsletter. You choose the topics of your interest and we’ll send you handpicked news and latest updates based on your choice.

Quick Links

  • Privacy policy
  • Terms and Conditions

Contact

Promote your brand with Fasalkranti. Connect with us for advertising.
  • E-Mail: info@fasalkranti.in
  • Phone: +91 9625941688
Copyrights © 2026. Fasal Kranti, Inc. All Rights Reserved. Maintained By Fasalkranti Team .

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • Agriculture News
  • Success Stories
  • Interviews
  • Weather
  • Articles
  • Schemes
  • Animal Husbandry

© 2026 Fasalkranti - News and Magazine by Fasalkranti news.