भारत को जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व दिलाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने बायोE3 नीति को आगे बढ़ाया है। यह नीति अत्याधुनिक तकनीकों और नवाचार के जरिए देश में जैव-आधारित उत्पादों के विकास और उत्पादन को नई गति देने के लिए तैयार की गई है। इसका लक्ष्य जैव-विनिर्माण प्रक्रियाओं में क्रांतिकारी बदलाव लाकर उच्च मूल्य वाले उत्पादों का तेजी से विस्तार करना है।
इस नीति के तहत जीनोम एडिटिंग, सिंथेटिक बायोलॉजी, मेटाबोलिक इंजीनियरिंग, बायोप्रोसेस इंजीनियरिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जाएगा। इन तकनीकों के उपयोग से स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नवाचार को मजबूती मिलेगी।
सरकार ने इस नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए छह प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की है। इनमें जैव-आधारित रसायन, बायोपॉलिमर और फार्मा उत्पाद, स्मार्ट प्रोटीन और फंक्शनल फूड, सटीक जैव-चिकित्सीय उपचार, जलवायु-लचीली कृषि, कार्बन कैप्चर और उपयोग तथा समुद्री और अंतरिक्ष अनुसंधान शामिल हैं। इन क्षेत्रों में अनुसंधान और विकास को गति देकर भारत को बायोटेक्नोलॉजी में अग्रणी बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
नीति के तहत पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के जरिए देशभर में अत्याधुनिक साझा सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इनमें बायो-एआई हब, बायोफाउंड्री और बायोमैन्युफैक्चरिंग हब जैसी संस्थाएं शामिल होंगी। ये केंद्र स्टार्टअप्स, शोध संस्थानों और उद्योगों को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाकर नवाचार को बढ़ावा देंगे और उन्हें महंगी इंफ्रास्ट्रक्चर लागत से राहत प्रदान करेंगे।
नई दिल्ली में स्थापित DBT-ICGEB Biofoundry इस दिशा में एक बड़ा कदम है। यह सुविधा प्रयोगशाला स्तर के शोध और औद्योगिक उत्पादन के बीच की दूरी को कम करती है। यहां आधुनिक उपकरणों और एआई आधारित प्रक्रियाओं के जरिए वैज्ञानिकों को तेजी से और सटीक परिणाम प्राप्त करने में मदद मिलती है। यह केंद्र स्टार्टअप्स और उद्योगों को अपने उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने में भी सहयोग देता है।
नीति के तहत अंतरिक्ष अनुसंधान को भी विशेष महत्व दिया गया है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर सूक्ष्म शैवाल और सायनोबैक्टीरिया पर किए गए प्रयोगों ने यह दिखाया है कि ये जीव सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में भी प्रभावी रूप से कार्य कर सकते हैं। ये कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पोषक तत्व और खाद्य पूरक तैयार कर सकते हैं, जिससे भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों में जीवन समर्थन प्रणाली विकसित करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, ये सूक्ष्म जीव पृथ्वी पर भी औद्योगिक उपयोग के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं, जैसे जैव-आधारित उत्पादों का उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण। इससे टिकाऊ विकास को बढ़ावा मिलेगा और नई आर्थिक संभावनाएं खुलेंगी।
कुल मिलाकर, ‘बायोE3 नीति’ भारत के बायोटेक सेक्टर के लिए एक परिवर्तनकारी पहल साबित हो सकती है। यह न केवल अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देगी, बल्कि देश को वैश्विक स्तर पर बायो-मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में भी मजबूत आधार तैयार करेगी।

