भारत को वैश्विक रासायनिक विनिर्माण और नवाचार के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में सरकार ने उद्योग जगत के साथ व्यापक विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। इसी क्रम में रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के रसायन एवं पेट्रोरसायन विभाग (DCPC) ने इन्वेस्ट इंडिया के सहयोग से एक उच्चस्तरीय सीईओ गोलमेज बैठक आयोजित की। बैठक का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2040 तक भारत के रसायन क्षेत्र को 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए आवश्यक नीतिगत, निवेश और औद्योगिक प्राथमिकताओं पर चर्चा करना था।
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री जे.पी. नड्डा की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल भी मौजूद रहीं। बैठक में देश-विदेश की रासायनिक कंपनियों के 100 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसमें बीएएसएफ, ट्रोनॉक्स, एक्सॉनमोबिल, फुजीफिल्म, लुब्रिजोल, डॉव केमिकल्स, यूपीएल, रिलायंस, डीसीएम श्रीराम, एचएमईएल, एसएबीआईसी और हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स सहित कई प्रमुख वैश्विक और भारतीय कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
2040 तक 1 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य पर जोर
गोलमेज बैठक का विषय ‘भारत का रसायन क्षेत्र: वर्ष 2040 तक 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का मार्ग प्रशस्त करना’ रखा गया। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत के पास रसायन क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी विनिर्माण केंद्र बनने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश, आधुनिक तकनीक, मजबूत बुनियादी ढांचे, कुशल मानव संसाधन और अनुकूल नीतिगत वातावरण को जरूरी माना गया।
बैठक में विशेष रसायन, पेट्रो-रसायन और थोक रसायन क्षेत्र से जुड़ी 30 से अधिक प्रमुख वैश्विक और भारतीय कंपनियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उद्योग जगत ने क्षेत्र की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता और विकास के लिए कई महत्वपूर्ण मुद्दे सरकार के सामने रखे।
इन मुद्दों में निवेश को बढ़ावा देना, औद्योगिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, व्यापार सुधारात्मक उपाय, अनुसंधान एवं विकास, तकनीकी अधिग्रहण, मंजूरी प्रक्रिया को सरल बनाना और कच्चे माल की आपूर्ति को सुरक्षित करना प्रमुख रूप से शामिल रहे।
बड़े निवेश के लिए वित्तपोषण तंत्र जरूरी
रसायन उद्योग के प्रतिनिधियों ने बड़े पैमाने पर निवेश को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त वित्तपोषण और निवेश सहायता तंत्र विकसित करने की जरूरत बताई। विशेष रूप से अपस्ट्रीम परियोजनाओं में बड़ी पूंजी की आवश्यकता होती है। ऐसे में इन परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता और निवेश को प्रोत्साहित करने वाले तंत्र को मजबूत करना महत्वपूर्ण माना गया।
उद्योग जगत का मानना है कि यदि भारत को 2040 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की रसायन अर्थव्यवस्था बनानी है, तो केवल मौजूदा उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए नई परियोजनाओं, आधुनिक उत्पादन सुविधाओं और अत्याधुनिक तकनीकों में बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी।
बैठक में सरकार और उद्योग के बीच सहयोग के माध्यम से निवेश की बाधाओं को दूर करने तथा लंबी अवधि की परियोजनाओं के लिए बेहतर वातावरण तैयार करने पर विचार किया गया।
PCPIR को आधुनिक रासायनिक विनिर्माण केंद्र बनाने की मांग
उद्योग प्रतिनिधियों ने मौजूदा पीसीपीआईआर यानी पेट्रोलियम, रसायन एवं पेट्रो-रसायन निवेश क्षेत्र को केवल औद्योगिक क्षेत्रों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें प्रमुख रासायनिक विनिर्माण केंद्रों के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
इसके तहत उद्योगों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे, उपयोगिता सुविधाओं और अन्य आवश्यक औद्योगिक सेवाओं का विकास करने की बात सामने आई। ऐसे केंद्रों में एकीकृत औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित होने से कंपनियों को उत्पादन, परिवहन, ऊर्जा और अन्य सुविधाओं का बेहतर लाभ मिल सकता है।
यह मॉडल विशेष रूप से उन रासायनिक परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, जिनमें बड़े स्तर पर उत्पादन और साझा बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है।
अनुचित व्यापारिक गतिविधियों से सुरक्षा पर जोर
गोलमेज बैठक में उद्योग जगत ने अनुचित व्यापारिक गतिविधियों से घरेलू उद्योग को सुरक्षा देने की आवश्यकता भी उठाई। प्रतिनिधियों ने कहा कि भारत में रासायनिक उद्योग को वैश्विक कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए समान अवसर उपलब्ध होना चाहिए।
इसके लिए आवश्यक व्यापार सुधारात्मक उपाय अपनाने पर चर्चा हुई। इसका उद्देश्य घरेलू निर्माताओं को अनुचित व्यापारिक व्यवहार से बचाना और एक ऐसा प्रतिस्पर्धी वातावरण तैयार करना है, जिसमें भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में अपनी क्षमता का विस्तार कर सकें।
आरएंडडी और नवाचार को बढ़ावा देने की जरूरत
रसायन क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए अनुसंधान एवं विकास तथा तकनीकी नवाचार को महत्वपूर्ण आधार माना गया। बैठक में आरएंडडी, नई तकनीकों और तकनीकी विकास के लिए अधिक सहायता उपलब्ध कराने की जरूरत पर चर्चा की गई।
उद्योग जगत की ओर से वैश्विक प्रतिभाओं को भारत में आकर्षित करने के लिए विशेष कर प्रोत्साहन देने का सुझाव भी सामने आया। इस संबंध में चीन, जापान और ब्रिटेन जैसे देशों की नीतियों का उदाहरण दिया गया।
इसके अलावा, दक्षिण कोरिया और अमेरिका की तर्ज पर प्रौद्योगिकी अधिग्रहण के लिए एक संप्रभु कोष बनाने का सुझाव भी रखा गया। इसका उद्देश्य भारतीय कंपनियों को अत्याधुनिक वैश्विक तकनीक हासिल करने और उसे देश में विकसित करने में मदद करना है।
यदि ऐसे उपाय लागू होते हैं, तो भारतीय रसायन उद्योग में नई तकनीकों के इस्तेमाल, उत्पाद विकास और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता को बढ़ावा मिल सकता है।
सिंगल विंडो मंजूरी पर भी चर्चा
रसायन और पेट्रो-रसायन परियोजनाओं की स्थापना में केंद्र और राज्य स्तर पर कई तरह की मंजूरियां शामिल होती हैं। उद्योग प्रतिनिधियों ने इस प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
बैठक में रसायन एवं पेट्रो-रसायन परियोजनाओं के लिए समयबद्ध सिंगल-विंडो मंजूरी व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया गया। इससे परियोजनाओं को स्थापित करने में लगने वाले समय को कम किया जा सकता है और निवेशकों के लिए कारोबारी प्रक्रिया अधिक सुगम हो सकती है।
सरकार और उद्योग दोनों के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबी मंजूरी प्रक्रिया के कारण कई बार निवेश परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी हो सकती है।
राष्ट्रीय फीडस्टॉक नीति की जरूरत
वैश्विक स्तर पर बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले व्यवधानों को देखते हुए बैठक में एक व्यापक राष्ट्रीय फीडस्टॉक नीति विकसित करने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।
रासायनिक उद्योग के लिए कच्चे माल की स्थिर और विश्वसनीय उपलब्धता उत्पादन की निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में किसी भी तरह का व्यवधान घरेलू उद्योग की लागत और उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर फीडस्टॉक नीति तैयार करने से भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में होने वाले बदलावों के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
जे.पी. नड्डा ने कहा—निवेश और घरेलू क्षमता बढ़ाना जरूरी
बैठक को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने कहा कि भारत को वर्ष 2040 तक रसायन क्षेत्र को 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार और उद्योग के बीच निरंतर तथा संस्थागत संवाद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि इस संवाद का उद्देश्य उद्योग के सामने आने वाली बाधाओं की पहचान करना और प्राप्त सुझावों को समयबद्ध कार्रवाई में बदलना है। उन्होंने रसायन क्षेत्र के विकास के लिए निरंतर निवेश, तकनीकी विकास और घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
नड्डा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार निवेश, नवाचार, सतत विकास और दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने पर लगातार काम कर रही है।
उन्होंने उद्योग प्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए मुद्दों को उचित रूप से संज्ञान में लेने और संबंधित मंत्रालयों के समक्ष आवश्यक कार्रवाई के लिए प्रस्तुत करने का आश्वासन दिया।
अनुप्रिया पटेल ने गिनाए सरकार के सुधार
केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने अपने संबोधन में रसायन एवं पेट्रो-रसायन क्षेत्र सहित विभिन्न क्षेत्रों में विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा हाल में किए गए सुधारों और शुरू की गई योजनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने भाव्य रसायन, कोयला गैसीकरण, रेयर अर्थ कॉरिडोर, क्रिटिकल मिनरल मिशन तथा कर और श्रम सुधारों को महत्वपूर्ण पहल बताया।
उन्होंने कहा कि सरकार केवल नियामक सुविधा प्रदाता की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उद्योग के लिए एक सक्रिय विकास भागीदार के रूप में काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसका उद्देश्य प्रशासनिक बोझ कम करना और निवेश की दीर्घकालिक व्यवहार्यता को मजबूत करना है।
घरेलू मांग से पैदा होंगे बड़े अवसर
रसायन एवं पेट्रो-रसायन विभाग के सचिव तेजवीर सिंह ने कहा कि प्रमुख डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में बढ़ती घरेलू मांग के कारण रसायन क्षेत्र में व्यापक अवसर मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि भविष्य की नीतियां तैयार करने के लिए उद्योग जगत के प्रमुख लोगों के साथ करीबी सहयोग जरूरी है। उन्होंने उद्योग प्रतिनिधियों द्वारा उठाए गए प्रश्नों का भी जवाब दिया और सरकार तथा उद्योग के बीच निरंतर संवाद की आवश्यकता पर बल दिया।
भारत में तेजी से बढ़ते विनिर्माण, बुनियादी ढांचे, कृषि, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्रों के कारण रसायन एवं पेट्रो-रसायन उत्पादों की घरेलू मांग में आगे और वृद्धि की संभावनाएं हैं। ऐसे में रसायन क्षेत्र देश के औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत में निवेश के लिए बेहतर संभावनाएं
इन्वेस्ट इंडिया की प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी निवृति राय ने कहा कि भारत वैश्विक रासायनिक विनिर्माण के लिए पसंदीदा गंतव्य बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उन्होंने भारत के बड़े घरेलू बाजार, कुशल प्रतिभा, बेहतर होते बुनियादी ढांचे और लगातार जारी सुधारों को इसकी प्रमुख ताकत बताया।
बैठक में वैश्विक निवेश के रुझानों, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई के प्रवाह, राज्यों की प्रतिस्पर्धात्मकता और क्षेत्र-विशिष्ट अवसरों पर प्रस्तुति भी दी गई। इन्वेस्ट इंडिया ने उद्योग जगत के नेताओं के साथ किए गए सर्वेक्षण के परिणाम भी साझा किए। सर्वेक्षण में रसायन क्षेत्र में निवेश को लेकर उद्योग जगत की ओर से मजबूत रुचि सामने आई।
राज्यों ने भी प्रस्तुत किए निवेश प्रस्ताव
गोलमेज बैठक में केवल केंद्र सरकार और उद्योग जगत ही नहीं, बल्कि विभिन्न राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। ओडिशा, गुजरात, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने राज्यों में निवेश आकर्षित करने के लिए उपलब्ध नीतिगत पैकेज और अवसरों की जानकारी दी।
इन राज्यों की ओर से प्रस्तुत नीतिगत पहलों का उद्देश्य रासायनिक एवं पेट्रो-रासायनिक परियोजनाओं को आकर्षित करना और राज्य स्तर पर औद्योगिक इकोसिस्टम को मजबूत करना है।
राज्यों के बीच निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा को रसायन क्षेत्र के विस्तार के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। इससे कंपनियों को बेहतर बुनियादी ढांचे, नीतिगत प्रोत्साहन और स्थानीय औद्योगिक सुविधाओं के आधार पर निवेश के लिए विकल्प मिल सकते हैं।
1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए सरकार-उद्योग साझेदारी अहम
रसायन क्षेत्र को 2040 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य बड़ा और दीर्घकालिक है। इसे हासिल करने के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। निजी क्षेत्र का निवेश, वैश्विक तकनीक, अनुसंधान एवं विकास, कुशल मानव संसाधन और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
गोलमेज बैठक में इसी साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया गया। उद्योग की समस्याओं को सीधे सरकार के सामने रखने और उनके समाधान के लिए संस्थागत संवाद व्यवस्था विकसित करने की दिशा में यह बैठक महत्वपूर्ण मंच बनी।
रसायन उद्योग कृषि, स्वास्थ्य, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, निर्माण और अनेक अन्य क्षेत्रों से सीधे जुड़ा हुआ है। इसलिए इस क्षेत्र का विस्तार केवल रासायनिक कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
सिफारिशों से बनेगा भविष्य का नीति ढांचा
बैठक से सामने आने वाली सिफारिशें भविष्य के नीति निर्माण, संस्थागत सुधारों और निवेश सुविधा ढांचे को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। सरकार का उद्देश्य इन सुझावों पर ‘समग्र सरकारी दृष्टिकोण’ के तहत कार्रवाई करना है।
भारत को वैश्विक रासायनिक विनिर्माण और नवाचार केंद्र बनाने के लिए निवेश, तकनीक, बुनियादी ढांचे, व्यापार नीति, फीडस्टॉक सुरक्षा और मंजूरी प्रक्रिया जैसे सभी क्षेत्रों में एक साथ काम करना होगा।
यदि उद्योग जगत द्वारा उठाए गए मुद्दों पर प्रभावी और समयबद्ध कार्रवाई होती है, तो इससे भारत में नई रासायनिक परियोजनाओं के लिए निवेश का वातावरण बेहतर हो सकता है। साथ ही घरेलू विनिर्माण क्षमता बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम करने और वैश्विक बाजार में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ाने के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, जे.पी. नड्डा की अध्यक्षता में हुई यह सीईओ गोलमेज बैठक भारत के रसायन क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वर्ष 2040 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की रसायन अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करने के लिए सरकार, उद्योग, राज्यों और वैश्विक निवेशकों के बीच मजबूत साझेदारी निर्णायक साबित होगी।

