भारत अपने निर्यात क्षेत्र को अधिक व्यापक और समावेशी बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार की ‘जिलों को निर्यात केंद्र’ (Districts as Export Hubs-DEH) पहल का उद्देश्य देश के प्रत्येक जिले की स्थानीय क्षमता, उत्पादों और सेवाओं को पहचानकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना है। इस पहल के माध्यम से जिला स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और उत्पादों को वैश्विक बाजार की मांग से जोड़ने के साथ-साथ रोजगार, स्थानीय उद्योग और छोटे एवं मध्यम उद्यमों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।
सरकार के अनुसार, भारत के वस्तु एवं सेवा निर्यात में लगातार वृद्धि हुई है। वर्ष 2024-25 में कुल वस्तु एवं सेवा निर्यात 825.25 अरब अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा, जबकि 2025-26 में इसके 863.11 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार का मानना है कि निर्यात वृद्धि को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए विकास प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाना जरूरी है।
इसी सोच के तहत DEH पहल को एक ऐसे ढांचे के रूप में विकसित किया गया है, जो स्थानीय उत्पादकों, उद्योगों, सरकारी संस्थानों और केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं को एक साथ जोड़कर जिलों को निर्यात नियोजन की इकाई के रूप में विकसित करता है।
क्यों जरूरी हुई जिला आधारित निर्यात रणनीति?
लंबे समय तक भारत की निर्यात गतिविधियां मुख्य रूप से कुछ स्थापित औद्योगिक क्षेत्रों और बड़े बंदरगाह शहरों के आसपास केंद्रित रहीं। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों, छोटे शहरों और दूरदराज के जिलों में मौजूद कई ऐसे उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार तक नहीं पहुंच पाए, जिनमें निर्यात की पर्याप्त क्षमता थी।
देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे अनेक स्थानीय उत्पाद मौजूद हैं जो अपनी गुणवत्ता और विशिष्टता के कारण वैश्विक बाजार में पहचान बना सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर बस्तर का लोहे का शिल्प, जलगांव के केले और मेघालय के संतरे स्थानीय उत्पादन क्षमता और विविधता को दर्शाते हैं।
सरकार ने इसी स्थानीय क्षमता को पहचानकर जिलों को निर्यात केंद्र के रूप में विकसित करने की रणनीति तैयार की है। इसका उद्देश्य प्रत्येक जिले को अपनी विशेष ताकत का उपयोग करते हुए देश के निर्यात में योगदान देने में सक्षम बनाना है।
ODOP से DEH तक पहुंचा निर्यात का मॉडल
जिला निर्यात केंद्र पहल की अवधारणा ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) कार्यक्रम से जुड़ी है। ODOP का उद्देश्य प्रत्येक जिले से एक विशिष्ट उत्पाद की पहचान करना, उसकी ब्रांडिंग और प्रचार करना तथा स्थानीय पहचान को आर्थिक अवसर में बदलना था।
DEH ने इसी अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए केवल एक उत्पाद के प्रचार के बजाय जिले की व्यापक निर्यात क्षमता पर ध्यान केंद्रित किया है।
इस मॉडल में जिले को केवल उत्पादन की इकाई नहीं बल्कि निर्यात नियोजन की इकाई के रूप में देखा जाता है। इसके जरिए स्थानीय उद्यमों को वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने और जिला आधारित आर्थिक विकास को गति देने का प्रयास किया जा रहा है। यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के व्यापक दृष्टिकोण से भी जुड़ी है।
770 से अधिक जिलों तक पहुंची DEH पहल
वाणिज्य विभाग के अंतर्गत विदेश व्यापार महानिदेशालय यानी DGFT द्वारा DEH पहल के माध्यम से उत्पादों के प्रचार के साथ व्यापक निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
सरकारी जानकारी के अनुसार, जनवरी 2026 तक DEH पहल देशभर के 770 से अधिक जिलों को कवर कर चुकी थी। यह इसकी व्यापक पहुंच और जिला स्तर पर निर्यात नियोजन के साथ बढ़ते एकीकरण को दर्शाता है।
DEH को किसी अलग वित्तपोषण योजना के बजाय मुख्य रूप से एक समन्वय ढांचे के रूप में देखा गया है। इसके तहत पहले से चल रही केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का उपयोग किया जाता है।
इससे निर्यात, विनिर्माण और रोजगार सृजन को स्थानीय स्तर पर बढ़ावा देने के साथ-साथ प्रत्येक जिले की विशिष्ट निर्यात संबंधी चुनौतियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है।
कैसे काम करता है जिला निर्यात केंद्र मॉडल?
DEH केंद्र, राज्य और जिला स्तर के बीच समन्वय की बहुस्तरीय व्यवस्था पर आधारित है।
केंद्रीय स्तर पर वाणिज्य विभाग समग्र नीतिगत दिशा प्रदान करता है। वहीं DGFT कार्यान्वयन, हितधारकों के बीच समन्वय और प्रगति की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
राज्य स्तर पर राज्य निर्यात संवर्धन समितियां (SEPC) कार्यान्वयन का मार्गदर्शन करती हैं और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय सुनिश्चित करती हैं।
जिला स्तर पर जिला निर्यात संवर्धन समितियां (DEPC) निर्यात के अवसरों की पहचान करती हैं, स्थानीय समस्याओं का समाधान तलाशती हैं और उद्योगों, निर्यातकों तथा अन्य हितधारकों के साथ समन्वय करती हैं।
590 जिलों के लिए तैयार हुए निर्यात कार्य योजनाओं के मसौदे
DEPC की प्रमुख जिम्मेदारियों में जिला निर्यात कार्य योजना (DEAP) तैयार करना शामिल है।
इन योजनाओं में जिले के निर्यात क्षमता वाले उत्पादों और सेवाओं का मानचित्रण, बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स का आकलन तथा निर्यात के रास्ते में आने वाली बाधाओं की पहचान की जाती है।
इसके साथ ही प्रतिस्पर्धात्मकता और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बेहतर बनाने के लिए आवश्यक उपायों की सिफारिश की जाती है।
सरकार के अनुसार, मार्च 2026 तक 590 जिलों के लिए DEAP के मसौदे तैयार किए जा चुके थे, जिनमें से 249 योजनाओं को संबंधित जिला निर्यात संवर्धन समितियों द्वारा औपचारिक रूप से अपनाया जा चुका था।
केवल उत्पाद नहीं, पूरा निर्यात इकोसिस्टम तैयार करने पर जोर
वैश्विक बाजार में किसी उत्पाद की प्रतिस्पर्धा केवल उसकी गुणवत्ता पर निर्भर नहीं करती। निर्यात के लिए लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, गुणवत्ता प्रमाणन, परीक्षण सुविधाएं, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी होती हैं।
DEH पहल के अंतर्गत जिलों में इन सभी पहलुओं को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
इसका उद्देश्य स्थानीय उत्पादकों को केवल निर्यात योग्य उत्पाद तैयार करने में मदद करना नहीं, बल्कि उन्हें वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना है।
कृषि उत्पादों और स्थानीय उत्पादों की पहचान
DEH के तहत विभिन्न जिलों में निर्यात क्षमता वाले उत्पादों एवं सेवाओं की पहचान की जा रही है। इनमें GI टैग वाले उत्पाद, कृषि क्लस्टर, खिलौना क्लस्टर और इंजीनियरिंग उत्पाद सहित विभिन्न श्रेणियां शामिल हैं।
कृषि और खाद्य उत्पादों की इसमें विशेष संभावनाएं हैं क्योंकि देश के अनेक जिलों की अर्थव्यवस्था स्थानीय कृषि उत्पादन और उससे जुड़े प्रसंस्करण उद्योगों पर आधारित है।
उदाहरण के तौर पर जलगांव के केले और जलगांव भरित बैंगन को निर्यात क्षमता वाले उत्पादों में शामिल किया गया है। इसी प्रकार आगर मालवा के संतरे तथा बस्तर के चावल, ज्वार और मक्का जैसे उत्पाद भी जिला आधारित निर्यात क्षमता को दर्शाते हैं।
इस प्रकार जिला आधारित निर्यात मॉडल कृषि उत्पादों के लिए स्थानीय उत्पादन से वैश्विक बाजार तक एक व्यवस्थित श्रृंखला विकसित करने की संभावना पैदा करता है।
वैश्विक गुणवत्ता मानकों पर ध्यान
किसी स्थानीय उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सफल बनाने के लिए वैश्विक गुणवत्ता और नियामकीय मानकों को पूरा करना जरूरी है।
DEH पहल के तहत गुणवत्ता मानकों, परीक्षण सुविधाओं, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और प्रमाणन को लेकर जागरूकता एवं क्षमता निर्माण पर जोर दिया जा रहा है।
इसका उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय अनुपालन आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने में मदद करना है।
कृषि क्षेत्र में यह पहल विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कृषि एवं खाद्य उत्पादों के लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग, ट्रेसबिलिटी और अन्य मानकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
डिजिटल माध्यम से छोटे कारोबारों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की कोशिश
DEH पहल में डिजिटल निर्यात को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से छोटे शहरों और दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित व्यवसाय भी व्यापक बाजारों तक पहुंच बना सकते हैं।
सरकार के अनुसार, DEH पहल के तहत Amazon, Shiprocket और DHL जैसे ई-कॉमर्स एवं लॉजिस्टिक्स प्लेटफॉर्म के साथ साझेदारी की गई है। इससे MSME को किफायती कूरियर एवं शिपिंग विकल्प उपलब्ध कराने में मदद मिलती है।
इसके अलावा डाकघर निर्यात केंद्र दस्तावेजीकरण, पैकेजिंग और छोटे माल के लिए कम लागत वाली डाक निर्यात सुविधाएं उपलब्ध कराकर इस डिजिटल एवं जमीनी पहुंच को मजबूत करते हैं।
निर्यातकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम
निर्यात के लिए नए उद्यमियों और स्थानीय व्यवसायों को प्रक्रियाओं की जानकारी देना भी DEH मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
DGFT के क्षेत्रीय कार्यालय जिला प्रशासन के साथ मिलकर लॉजिस्टिक्स प्लानिंग, निर्यात प्रक्रियाओं, पैकेजिंग मानकों और नियामकीय अनुपालन जैसे विषयों पर क्षमता निर्माण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
इन गतिविधियों में Export Credit Guarantee Corporation of India (ECGC), Export Promotion Council for Handicrafts (EPCH), Federation of Indian Export Organisations (FIEO), MSME मंत्रालय, India Post और EXIM Bank सहित विभिन्न संस्थानों की भागीदारी रही है।
इन कार्यक्रमों का उद्देश्य स्थानीय निर्यातकों को व्यावहारिक जानकारी और कौशल उपलब्ध कराना है, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से समझ सकें।
छह जिलों में GRID कार्यक्रम के जरिए विशेष सहयोग
DEH के तहत जमीनी स्तर पर निर्यात पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए विशेष संस्थानों के साथ साझेदारी भी की गई है।
DGFT ने चयनित जिलों में निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए EXIM Bank के साथ साझेदारी की है।
EXIM Bank के GRID—Grassroots Initiative for Development कार्यक्रम के अंतर्गत अनंतपुर, रायपुर, सोलन, तिरुप्पुर, कानपुर और कोल्हापुर छह जिलों को सहायता के लिए चुना गया है।
इस पहल का उद्देश्य क्षेत्र-विशिष्ट बाधाओं को समझना, संभावित लाभार्थियों की पहचान करना और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए जिला-विशिष्ट हस्तक्षेप तैयार करना है।
1 जून 2026 से लागू हुआ केंद्रित और चरणबद्ध दृष्टिकोण
सरकार ने DEH के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए 1 जून 2026 से परिणाम-उन्मुख, केंद्रित और चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाया है।
पहले चरण में 24 DGFT क्षेत्रीय प्राधिकरणों और 11 सहयोगी एजेंसियों के सहयोग से 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिलों को शामिल किया गया है।
इस चरण में नए निर्यातकों के पंजीकरण, केंद्र एवं राज्य सरकार की योजनाओं के समन्वय तथा GI उत्पादों और MSME समूहों की क्षमता का लाभ उठाकर निर्यात मूल्य बढ़ाने जैसे मापनीय परिणामों पर जोर दिया जा रहा है।
स्थानीय उत्पादों से वैश्विक बाजार तक पहुंचेगा जिला
DEH मॉडल का मूल उद्देश्य भारत के आर्थिक विकास को कुछ चुनिंदा औद्योगिक केंद्रों तक सीमित रखने के बजाय देश के प्रत्येक जिले की क्षमता का उपयोग करना है।
भारत के अलग-अलग जिलों में कृषि, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, इंजीनियरिंग, वस्त्र और अन्य क्षेत्रों में विशिष्ट क्षमताएं मौजूद हैं। यदि इन उत्पादों को उचित गुणवत्ता, ब्रांडिंग, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और बाजार पहुंच उपलब्ध हो तो वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।
जिला निर्यात केंद्र पहल इसी स्थानीय क्षमता को व्यवस्थित रूप से पहचानने और उसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जोड़ने का प्रयास है।
1 ट्रिलियन डॉलर निर्यात लक्ष्य की दिशा में बड़ा कदम
भारत 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के निर्यात लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए केंद्र, राज्य और जिला स्तर के बीच प्रभावी समन्वय जरूरी होगा।
सरकार के अनुसार, DEH ढांचा स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को व्यापार, निवेश और रोजगार के केंद्र के रूप में विकसित करने में मदद कर सकता है।
यदि जिले के स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंच मिलती है, तो इसका लाभ केवल बड़े निर्यातकों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि स्थानीय MSME, कारीगरों, किसानों, प्रसंस्करण इकाइयों और अन्य उद्यमों तक भी पहुंच सकता है।
‘जिलों को निर्यात केंद्र’ यानी DEH पहल भारत की निर्यात रणनीति में जमीनी स्तर पर बड़ा बदलाव लाने की क्षमता रखती है। इसका फोकस केवल निर्यात बढ़ाने पर नहीं बल्कि देश के अलग-अलग जिलों की विशिष्ट आर्थिक और उत्पादन क्षमता को पहचानकर उसे वैश्विक बाजार से जोड़ने पर है।
770 से अधिक जिलों तक पहल की पहुंच, 590 जिलों के DEAP मसौदे और 249 योजनाओं का औपचारिक रूप से अपनाया जाना इस दिशा में हुई प्रगति को दर्शाता है।
कृषि क्षेत्र के लिए भी यह मॉडल महत्वपूर्ण है, क्योंकि केले, संतरे, चावल, ज्वार, मक्का और अन्य स्थानीय उत्पादों को जिला स्तर पर पहचान, गुणवत्ता सुधार, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और निर्यात बाजार से जोड़ने के अवसर मिल सकते हैं।
आने वाले समय में यदि जिला प्रशासन, किसान उत्पादक संगठन, MSME, निर्यातक, उद्योग और सरकारी संस्थान मिलकर इस मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू करते हैं, तो स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ ग्रामीण रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

