देश में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत बनाने की दिशा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा किए जा रहे वैज्ञानिक प्रयासों को नई गति मिल रही है। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने हरियाणा के करनाल स्थित भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान का दौरा कर वहां चल रही अनुसंधान एवं विकास पहलों की समीक्षा की।
डॉ. जाट ने कहा कि भारत इस वर्ष गेहूं उत्पादन के मामले में पूरी तरह तैयार है और उच्च उत्पादन की संभावना है। इससे न केवल देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अन्य देशों की सहायता करने की क्षमता भी बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि ICAR जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए जलवायु-अनुकूल, पोषक तत्वों से भरपूर और उच्च उत्पादकता वाली फसल किस्मों के विकास पर विशेष ध्यान दे रहा है।
करनाल में चल रहे अनुसंधान कार्यक्रमों ने संरक्षण कृषि और संसाधन-कुशल खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तहत विकसित प्रणाली-आधारित अनुसंधान मॉडल ने जल उपयोग में 85 प्रतिशत तक की बचत, उर्वरक उपयोग में 28 प्रतिशत की कमी और फसल अवशेष जलाने में 95 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की है। इसके साथ ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 46 प्रतिशत कमी और कृषि उत्पादकता में 33 प्रतिशत तक वृद्धि देखने को मिली है, जिससे किसानों की आय लगभग दोगुनी हुई है।
डॉ. जाट ने जैविक नाइट्रिफिकेशन अवरोधन (BNI) तकनीक को कृषि क्षेत्र में एक बड़ा नवाचार बताते हुए कहा कि इसके माध्यम से उर्वरकों के उपयोग में 25 प्रतिशत तक कमी संभव है, जबकि उत्पादन पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। वर्तमान में 19 उन्नत गेहूं किस्मों का परीक्षण कम नाइट्रोजन स्तर पर किया जा रहा है। यदि इस तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाया जाता है, तो देश को हर साल हजारों करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
इस दौरान भारतीय गेहूं रस्ट अनुसंधान एवं निगरानी कार्यक्रम की भी समीक्षा की गई, जो गेहूं की फसलों को स्ट्राइप, लीफ और स्टेम रस्ट जैसे रोगों से बचाने में अहम भूमिका निभाता है। देशभर में 30 से अधिक संस्थानों और कृषि विज्ञान केंद्रों का नेटवर्क लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में निगरानी कर रहा है और हर वर्ष 1,000 से अधिक उन्नत किस्मों का परीक्षण किया जाता है।
ICAR द्वारा पोषण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लौह, जस्ता और प्रोटीन से समृद्ध 55 जैव-संरक्षित गेहूं किस्में विकसित की गई हैं। वर्तमान में देश के लगभग 45 प्रतिशत गेहूं क्षेत्र में इन किस्मों की खेती की जा रही है, जो किसानों के बीच इनके बढ़ते उपयोग को दर्शाता है।
संरक्षण कृषि के तहत शून्य जुताई, फसल अवशेष प्रबंधन और मशीनीकृत बुवाई जैसी तकनीकों ने न केवल उत्पादन में 6-10 प्रतिशत की वृद्धि की है, बल्कि ईंधन और समय की बचत में भी 70-75 प्रतिशत तक योगदान दिया है। इसके साथ ही मृदा कार्बनिक कार्बन स्तर में सुधार से भूमि की उर्वरता और जलवायु अनुकूलन क्षमता भी बढ़ी है।
इसके अलावा, जौ (बार्ले) पर हो रहे अनुसंधान को भी महत्वपूर्ण बताया गया। कम पानी और उर्वरक की आवश्यकता के कारण जौ एक जलवायु-अनुकूल फसल के रूप में उभर रहा है, जिसकी मांग खाद्य, पशु आहार और औद्योगिक क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रही है।
डॉ. जाट ने कहा कि ICAR का उद्देश्य वैज्ञानिक नवाचारों को सीधे किसानों तक पहुंचाना है, ताकि कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल बनाया जा सके। यह प्रयास वर्ष 2047 तक “विकसित भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

