राजस्थान के अलवर और खैरथल जिलों में किसान अब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक समझ के मेल से खेती में बड़ा बदलाव ला रहे हैं। महंगी रासायनिक खादों से दूरी बनाते हुए यहां के किसान ‘बकरी की मेंगनी’ से तैयार जैविक खाद का उपयोग कर रहे हैं, जो खेती के लिए बेहद प्रभावी साबित हो रही है। किसानों का कहना है कि इस देसी खाद से न केवल लागत में कमी आई है, बल्कि फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, बकरी की मेंगनी सामान्य गोबर खाद की तुलना में अधिक पौष्टिक होती है। इसका मुख्य कारण बकरी का विविध आहार है, जिसमें जंगली पौधे और औषधीय वनस्पतियां शामिल होती हैं। इन पौधों के पोषक तत्व बकरी की मेंगनी के जरिए मिट्टी तक पहुंचते हैं, जिससे जमीन की उर्वरता बढ़ती है और फसलों को सूक्ष्म पोषक तत्वों की बेहतर आपूर्ति होती है।
खासतौर पर प्याज की खेती में यह खाद किसानों के लिए काफी लाभकारी सिद्ध हो रही है। खैरथल क्षेत्र, जहां बड़े पैमाने पर प्याज की खेती होती है, वहां किसानों ने पाया कि बकरी की मेंगनी का उपयोग करने से पत्तियों के पीलेपन की समस्या कम होती है और फसल अधिक हरी-भरी रहती है। साथ ही, यह खाद फंगस जैसे रोगों से भी फसल की सुरक्षा करने में मददगार है।
किसानों का अनुभव है कि पहले रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर हजारों रुपये खर्च करने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते थे, जबकि अब जैविक खाद के उपयोग से कम लागत में बेहतर उत्पादन संभव हो रहा है। कई प्रगतिशील किसान पूरी तरह जैविक खेती अपनाकर अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं, जिससे अन्य किसान भी इस दिशा में प्रेरित हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खाद न केवल उत्पादन बढ़ाती है, बल्कि पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत बनाती है। इससे रासायनिक दवाइयों पर निर्भरता कम होती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचता। हालांकि, जरूरत पड़ने पर वैज्ञानिक सलाह के अनुसार सीमित मात्रा में फफूंदनाशकों का उपयोग किया जा सकता है, ताकि फसल सुरक्षित रहे।
कुल मिलाकर, ‘बकरी की मेंगनी’ से तैयार जैविक खाद किसानों के लिए एक सस्ता, प्रभावी और पर्यावरण अनुकूल विकल्प बनकर उभरी है। यह पहल न केवल खेती की लागत घटाने में सहायक है, बल्कि उपभोक्ताओं तक रसायन-मुक्त और पौष्टिक खाद्य उत्पाद पहुंचाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।

