इस पहल से देश में गुणवत्तापूर्ण सब्जी बीजों की उपलब्धता बढ़ने, आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रसार और किसानों को बेहतर किस्मों के चयन में मदद मिलने की उम्मीद है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात और अन्य सब्जी उत्पादक राज्यों के किसानों के लिए यह पहल महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
वाराणसी के चुनार क्षेत्र स्थित अदलपुरा परिसर में आयोजित कार्यक्रम में देश की 45 से अधिक प्रतिष्ठित बीज कंपनियों और कृषि व्यवसाय संगठनों के 80 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषि अनुसंधान संस्थानों और निजी बीज कंपनियों के बीच सहयोग बढ़ाना तथा प्रयोगशालाओं में विकसित कृषि तकनीकों को किसानों के खेतों तक पहुंचाना था।
ICAR-IIVR ने 10 सब्जी प्रौद्योगिकियों के लिए किया लाइसेंसिंग समझौता
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों, बीज उद्योग के प्रतिनिधियों और कृषि व्यवसाय से जुड़े विशेषज्ञों ने सब्जी उत्पादन के भविष्य पर चर्चा की। कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण तीन कंपनियों के साथ कुल 10 सब्जी प्रौद्योगिकियों के लाइसेंसिंग समझौतों पर हस्ताक्षर होना रहा।इन समझौतों का उद्देश्य केवल नई किस्मों का प्रचार करना नहीं है, बल्कि अनुसंधान से विकसित सब्जी प्रौद्योगिकियों को व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को मजबूत बनाना भी है।दरअसल, देश में बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान सब्जियों की खेती करते हैं। कई बार उन्हें बेहतर गुणवत्ता वाले बीज सही समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। इसके अलावा स्थानीय बाजारों में बीजों की गुणवत्ता, किस्मों की पहचान और उपलब्धता भी चुनौती बनी रहती है।
ऐसे में सरकारी अनुसंधान संस्थानों और निजी बीज कंपनियों की साझेदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बीज कंपनियां लाइसेंस प्राप्त किस्मों को निर्धारित शर्तों के अनुसार बाजार तक पहुंचाने में सहयोग कर सकती हैं। इससे किसानों के पास उन्नत किस्मों के अधिक विकल्प उपलब्ध होने की संभावना बढ़ती है।
इन तीन कंपनियों के साथ हुआ समझौता
आईसीएआर-आईआईवीआर ने गुजरात, बिहार और उत्तर प्रदेश की तीन बीज कंपनियों के साथ अलग-अलग प्रौद्योगिकियों के लिए समझौते किए हैं।
| कंपनी का नाम | स्थान | लाइसेंस प्राप्त प्रौद्योगिकियां |
|---|---|---|
| इंडो यूएस बायो-टेक लिमिटेड | अहमदाबाद, गुजरात | 8 सब्जी प्रौद्योगिकियां |
| एग्रोविन एग्री सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड | बेगूसराय, बिहार | मटर की काशी पूर्वी |
| देवा सीड्स | जालौन, उत्तर प्रदेश | मटर की काशी उदय |
इंडो यूएस बायो-टेक लिमिटेड की ओर से समर्थ पटेल ने समझौतों पर हस्ताक्षर किए। वहीं एग्रोविन एग्री सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड की ओर से उत्पल कुमार और देवा सीड्स की ओर से लक्ष्मण गुर्जर ने समझौतों पर हस्ताक्षर किए।इन समझौतों के माध्यम से संस्थान द्वारा विकसित किस्मों और संकरों को व्यावसायिक बीज क्षेत्र से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
कौन-कौन सी उन्नत किस्में समझौते में शामिल हैं?
लोबिया की इस किस्म को लाइसेंसिंग समझौते में शामिल किया गया है। लोबिया की खेती करने वाले किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने की दिशा में यह उपयोगी पहल हो सकती है।
खीरे की यह संकर किस्म भी समझौते का हिस्सा है। इससे कद्दू वर्गीय फसलों के बीज क्षेत्र में अनुसंधान आधारित विकल्पों को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, किसानों को इन किस्मों के बीजों की बाजार में वास्तविक उपलब्धता, क्षेत्रीय अनुकूलता और अधिकृत विक्रेताओं के संबंध में संबंधित कंपनियों या कृषि विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए।
भिंडी, लोबिया और कद्दू वर्गीय सब्जियों को मिलेगा प्रोत्साहन
इस कार्यक्रम का महत्व केवल समझौते में शामिल 10 प्रौद्योगिकियों तक सीमित नहीं है। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान लंबे समय से भिंडी, लोबिया, खीरा, लौकी, कद्दू, करेला और अन्य सब्जियों के विकास पर अनुसंधान कर रहा है।भिंडी भारतीय किसानों की महत्वपूर्ण नकदी सब्जी फसलों में शामिल है। इसकी खेती विभिन्न मौसमों में की जाती है और घरेलू बाजार में इसकी नियमित मांग रहती है। हालांकि, पीला शिरा मोजेक और अन्य रोगों के कारण कई क्षेत्रों में किसानों को उत्पादन संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।आईसीएआर-आईआईवीआर ने पूर्व में भिंडी की काशी चमन जैसी किस्म विकसित की है, जिसमें प्रमुख विषाणुजनित रोगों के प्रति सहनशीलता बताई गई है। ऐसी अनुसंधान उपलब्धियां दर्शाती हैं कि उन्नत किस्मों का विकास सब्जी उत्पादन की चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
वहीं लोबिया एक महत्वपूर्ण दलहनी सब्जी है। इसकी हरी फलियों का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। लोबिया की खेती फसल विविधीकरण में भी उपयोगी है।इसी तरह कुकुरबिट्स यानी कद्दू वर्गीय फसलों में खीरा, लौकी, कद्दू, करेला, तोरई और अन्य बेल वाली सब्जियां शामिल हैं। भारतीय बाजारों में इन सब्जियों की व्यापक मांग रहती है। गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता बढ़ने से इस क्षेत्र में उत्पादन और व्यावसायिक खेती की संभावनाओं को मजबूती मिल सकती है।
किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं उन्नत किस्में
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. राजेश कुमार ने कार्यक्रम में उपस्थित बीज कंपनियों और कृषि व्यवसाय संगठनों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए कहा कि कृषि अनुसंधान का वास्तविक लाभ तभी सामने आता है, जब वैज्ञानिक तकनीकें किसानों के खेतों तक पहुंचती हैं।
उन्होंने बताया कि अनुसंधान संस्थानों की उपलब्धियों को किसानों की उत्पादकता, आय और आजीविका में सुधार से जोड़ना आवश्यक है। इसके लिए सरकारी संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच नियमित संवाद तथा सहयोग को मजबूत करना होगा।
इस पहल को किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है। बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों और उपयुक्त कृषि तकनीकों के इस्तेमाल से किसानों को उत्पादन लागत का बेहतर प्रबंधन करने और बाजार की मांग के अनुरूप सब्जियां उगाने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि, केवल उन्नत बीज इस्तेमाल करने से अधिक आय की गारंटी नहीं मिलती। खेती की सफलता मौसम, मिट्टी, सिंचाई, पोषण प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण और बाजार भाव जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
कृषि अनुसंधान और बीज उद्योग के बीच बढ़ेगी साझेदारी
देश में कृषि अनुसंधान संस्थान विभिन्न फसलों की नई किस्में विकसित करते हैं। इन किस्मों का उद्देश्य उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, पोषण, रोग प्रतिरोधकता और अलग-अलग कृषि परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन जैसे गुणों को विकसित करना होता है।लेकिन अनुसंधान केंद्र में नई किस्म विकसित हो जाने के बाद भी उसे बड़े पैमाने पर किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी बीज उत्पादन और वितरण व्यवस्था की आवश्यकता होती है।यहीं निजी बीज कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। लाइसेंसिंग समझौतों के माध्यम से कंपनियों को निर्धारित शर्तों पर अनुसंधान आधारित किस्मों और प्रौद्योगिकियों के व्यावसायिक उपयोग का अवसर मिलता है।आईसीएआर-आईआईवीआर पहले से ही इस दिशा में काम कर रहा है। संस्थान की प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण संबंधी जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में रिपोर्ट की गई प्रगति में 51 लाइसेंस, 43 प्रौद्योगिकी उपयोग और 22 कंपनियों के साथ हस्तांतरण का उल्लेख है। यह दर्शाता है कि संस्थान अनुसंधान परिणामों को व्यावहारिक कृषि उपयोग से जोड़ने पर विशेष ध्यान दे रहा है।
छोटे और सीमांत किसानों को कैसे मिलेगा फायदा?
देश में सब्जी उत्पादन करने वाले अनेक किसान छोटी जोत पर खेती करते हैं। ऐसे किसानों के सामने गुणवत्तापूर्ण बीज खरीदने, उत्पादन में नुकसान कम करने और सही बाजार तक पहुंचने जैसी चुनौतियां रहती हैं।नई साझेदारी से यदि उन्नत किस्मों के बीज व्यापक स्तर पर उपलब्ध होते हैं, तो छोटे किसानों को भी अपनी जरूरत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किस्में चुनने का अवसर मिल सकता है।सब्जी उत्पादन में समय पर अच्छी गुणवत्ता वाले बीज मिलना बेहद महत्वपूर्ण है। बीज की शुद्धता, अंकुरण क्षमता और किस्म की पहचान का सीधा संबंध फसल की स्थापना और एकरूपता से होता है।इसके अतिरिक्त किसानों के लिए नई किस्मों के प्रदर्शन, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और वैज्ञानिक सलाह की भी आवश्यकता होगी। यदि किसानों को बीज के साथ सही खेती संबंधी जानकारी मिले, तो तकनीक अपनाने के परिणाम बेहतर हो सकते हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों के लिए खास महत्व
समझौतों में उत्तर प्रदेश के जालौन और बिहार के बेगूसराय की कंपनियों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है। दोनों राज्यों में सब्जियों की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय बाजारों के लिए महत्वपूर्ण गतिविधि है।
उत्तर प्रदेश में वाराणसी और आसपास के कई क्षेत्रों में सब्जी उत्पादन किसानों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। वहीं बिहार में भी विभिन्न मौसमों में सब्जियों की व्यावसायिक खेती की जाती है।
मटर, लोबिया, खीरा, कद्दू और अन्य सब्जियों के गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध होने से किसानों को फसल विविधीकरण के नए अवसर मिल सकते हैं।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि लाइसेंसिंग समझौता होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी किस्मों के बीज तुरंत प्रत्येक जिले में उपलब्ध हो जाएंगे। इनकी उपलब्धता बीज उत्पादन, वितरण, गुणवत्ता परीक्षण और संबंधित कंपनी की बिक्री व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
सब्जी किसानों को किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
नई किस्मों के बीज बाजार में उपलब्ध होने पर किसानों को किसी भी किस्म का चयन करने से पहले स्थानीय कृषि परिस्थितियों की जानकारी लेना जरूरी है।
सबसे पहले किसानों को यह देखना चाहिए कि चयनित किस्म उनके क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और खेती के मौसम के लिए उपयुक्त है या नहीं। इसके बाद अधिकृत विक्रेता से प्रमाणित या उचित गुणवत्ता वाले बीज खरीदने चाहिए।
बीज खरीदते समय पैकेट पर किस्म का नाम, निर्माता का विवरण, लॉट नंबर, अंकुरण संबंधी जानकारी और वैधता अवधि की जांच करना भी महत्वपूर्ण है।किसानों को नई किस्म बड़े क्षेत्र में लगाने से पहले अपने खेत के सीमित हिस्से में उसका प्रदर्शन देखना उपयोगी हो सकता है। इससे स्थानीय परिस्थितियों में उसकी बढ़वार, फसल अवधि और बाजार स्वीकार्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है।इसके अलावा फसल की सही बुवाई, संतुलित पोषण, सिंचाई व्यवस्था और समय पर रोग प्रबंधन भी उत्पादन के लिए आवश्यक हैं।
भविष्य में सब्जी उत्पादन को मिल सकती है नई दिशा
देश में गुणवत्तापूर्ण सब्जियों की मांग, बदलती जलवायु और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए कृषि अनुसंधान तथा बीज प्रौद्योगिकी का महत्व लगातार बढ़ रहा है।ऐसे समय में आईसीएआर-आईआईवीआर की नई साझेदारी संस्थान की विकसित किस्मों को व्यावसायिक कृषि प्रणाली से जोड़ने का अवसर प्रदान करती है।विशेष रूप से लोबिया, खीरा, कद्दू, मटर और अन्य सब्जियों की किस्मों के लाइसेंसिंग समझौते किसानों तक बेहतर बीज विकल्प पहुंचाने की दिशा में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, वाराणसी स्थित भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान द्वारा तीन कंपनियों के साथ 10 सब्जी प्रौद्योगिकियों के लिए किए गए समझौते कृषि अनुसंधान और बीज उद्योग के बीच बढ़ते सहयोग का संकेत हैं। इनका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि लाइसेंस प्राप्त किस्मों के गुणवत्तापूर्ण बीज किसानों तक कितनी आसानी से पहुंचते हैं, उनकी कीमत कितनी किफायती रहती है और स्थानीय खेती की परिस्थितियों में उनका प्रदर्शन कैसा होता है।
यदि बीज उत्पादन, वितरण और किसान प्रशिक्षण की व्यवस्था प्रभावी रहती है, तो यह पहल देश में सब्जी उत्पादन को मजबूत करने और किसानों के लिए बेहतर कृषि अवसर तैयार करने में योगदान दे सकती है।

