भारत में सरकारी अनाज भंडारों को कीटों से सुरक्षित रखने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। दोनों संस्थानों ने FCI की भंडारण सुविधाओं में फसल कटाई के बाद होने वाले कीट नियंत्रण के वैकल्पिक तरीकों का परीक्षण करने के लिए समझौता किया है। इन परीक्षणों में नाइट्रोजन गैस, कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) और CO2 तथा फॉस्फीन के संयुक्त इस्तेमाल जैसी तकनीकों को आजमाया जाएगा।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य अनाज भंडारण में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे एल्युमिनियम फॉस्फाइड (ALP) और मैलाथियान के विकल्पों की प्रभावशीलता का अध्ययन करना है। सरकारी अनाज भंडारों में गेहूं और चावल को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए कीट नियंत्रण बेहद महत्वपूर्ण है। भंडारण के दौरान कीटों के प्रकोप से अनाज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और भंडारण नुकसान बढ़ सकता है।
दशकों से हो रहा है रासायनिक फ्यूमिगेशन का इस्तेमाल
भारत में खाद्यान्न के बड़े भंडारों को कीटों से बचाने के लिए दशकों से एल्युमिनियम फॉस्फाइड और मैलाथियान जैसे रसायनों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये रसायन भंडारित अनाज में कीटों के नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हालांकि, इन रसायनों के व्यापक और बार-बार इस्तेमाल के कारण कीटों में प्रतिरोध बढ़ने की समस्या सामने आई है। ICAR और FCI के संयुक्त कार्यक्रम के पीछे भी यही एक प्रमुख कारण बताया गया है।
आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत के कुछ प्रमुख राज्यों में भंडारण कीटों में रासायनिक प्रतिरोध की आवृत्ति 72 से 100 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसका मतलब है कि कुछ परिस्थितियों में पहले इस्तेमाल किए जाने वाले रासायनिक तरीकों की प्रभावशीलता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
कीटों में बढ़ते प्रतिरोध के कारण फ्यूमिगेशन चक्रों को भी अधिक बार दोहराना पड़ सकता है। इससे भंडारण व्यवस्था की परिचालन लागत बढ़ सकती है। ऐसे में वैकल्पिक तरीकों की तलाश को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कर्मचारियों की सुरक्षा पर भी जोर
भंडारण केंद्रों में कीट नियंत्रण के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों से जुड़े जोखिम केवल अनाज तक सीमित नहीं हैं। आधिकारिक बयान में कहा गया है कि मौजूदा रासायनिक तरीकों से कर्मचारियों के लिए श्वसन संबंधी जोखिम भी पैदा हो सकते हैं।
इसके अलावा, लंबे समय तक रासायनिक तरीकों के इस्तेमाल से पर्यावरणीय जोखिमों को लेकर भी चिंताएं सामने आती रही हैं। ऐसे में ICAR और FCI द्वारा गैस आधारित वैकल्पिक तकनीकों का परीक्षण भंडारण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
हालांकि, इन वैकल्पिक तरीकों को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले उनकी प्रभावशीलता, सुरक्षा, लागत और अलग-अलग परिस्थितियों में उपयोगिता का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाना जरूरी है। प्रस्तावित परीक्षण इसी दिशा में किए जाएंगे।
पहले चरण में तीन प्रमुख परीक्षण
ICAR और FCI की संयुक्त पहल के पहले चरण में तीन प्रमुख परीक्षण किए जाएंगे। इन परीक्षणों को अलग-अलग प्रकार की भंडारण परिस्थितियों में किया जाएगा, ताकि यह समझा जा सके कि कौन-सी तकनीक किस प्रकार के भंडारण में प्रभावी रहती है।
पहला परीक्षण धातु के साइलो में रखे गेहूं पर किया जाएगा। इसमें नाइट्रोजन गैस के जरिए फ्यूमिगेशन का परीक्षण किया जाएगा। भारत में गेहूं के भंडारण के लिए बड़े पैमाने पर साइलो आधारित प्रणालियों का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में साइलो में नाइट्रोजन गैस आधारित कीट नियंत्रण की प्रभावशीलता का अध्ययन महत्वपूर्ण होगा।
दूसरे परीक्षण में गोदामों में बोरियों में रखे गेहूं और चावल को शामिल किया जाएगा। इसमें कार्बन डाइऑक्साइड और फॉस्फीन गैस के संयुक्त इस्तेमाल का परीक्षण किया जाएगा। इस परीक्षण का उद्देश्य बोरियों में रखे अनाज में भंडारण कीटों के प्रबंधन और नियंत्रण की क्षमता का आकलन करना है।
तीसरा परीक्षण भी बोरियों में रखे गेहूं और चावल से संबंधित होगा। इसमें अनाज को हर्मेटिक यानी वायुरोधी कवर के अंदर रखकर कार्बन डाइऑक्साइड फ्यूमिगेशन का परीक्षण किया जाएगा।
इन तीनों परीक्षणों के जरिए अलग-अलग भंडारण प्रणालियों में वैकल्पिक गैस आधारित तकनीकों की उपयोगिता को समझने का प्रयास किया जाएगा।
दो साल का होगा पहला चरण
इस संयुक्त परियोजना का पहला चरण दो वर्षों का होगा। इस दौरान चयनित FCI भंडारण सुविधाओं में प्रस्तावित तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा। परीक्षणों से प्राप्त परिणामों के आधार पर यह आकलन किया जाएगा कि अलग-अलग परिस्थितियों में इन तरीकों से कीट नियंत्रण कितना प्रभावी रहता है।
किसी भी वैकल्पिक तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए केवल कीट नियंत्रण की क्षमता देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ अनाज की गुणवत्ता, भंडारण की स्थिति, प्रक्रिया की व्यवहारिकता और परिचालन लागत जैसे पहलुओं का भी अध्ययन किया जाना जरूरी होगा।
दो साल के पहले चरण से प्राप्त अनुभव आगे की परीक्षण प्रक्रिया के लिए आधार तैयार करेगा।
अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में होगा दूसरा चरण
पहले चरण के बाद परियोजना के दूसरे चरण की योजना बनाई गई है। यह चरण एक वर्ष का होगा और इसमें देश के अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बहु-स्थान परीक्षण किए जाएंगे।
भारत में तापमान, आर्द्रता और भंडारण परिस्थितियां अलग-अलग क्षेत्रों में काफी भिन्न हो सकती हैं। इसलिए किसी एक स्थान पर सफल तकनीक का प्रदर्शन देश के हर क्षेत्र में समान परिणाम दे, यह जरूरी नहीं है।
इसी वजह से दूसरे चरण में अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों को शामिल किया जाएगा। इन परीक्षणों के आधार पर क्षेत्र-विशिष्ट मानक संचालन प्रक्रियाएं यानी SOP तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।
इन SOP के माध्यम से यह तय करने में मदद मिल सकती है कि अलग-अलग क्षेत्रों और भंडारण प्रणालियों में वैकल्पिक कीट नियंत्रण तकनीकों का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए।
अनाज भंडारण में नई तकनीकों की जरूरत
भारत में खाद्यान्न सुरक्षा के लिए सरकारी भंडारण व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है। गेहूं और चावल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों का बड़ा भंडार विभिन्न सरकारी एजेंसियों के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है। लंबे समय तक भंडारण के दौरान कीट नियंत्रण और अनाज की गुणवत्ता बनाए रखना इस पूरी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यदि भंडारण कीटों में मौजूदा रसायनों के प्रति प्रतिरोध बढ़ता है, तो भविष्य में प्रभावी नियंत्रण के लिए नए विकल्पों की आवश्यकता हो सकती है। इसी संदर्भ में नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों पर आधारित तकनीकों का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, इन तकनीकों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल को लेकर अंतिम निर्णय परीक्षणों के परिणामों पर निर्भर करेगा। फिलहाल ICAR और FCI का ध्यान वैज्ञानिक परीक्षण और अलग-अलग भंडारण परिस्थितियों में इनके प्रदर्शन को समझने पर है।
किसानों से लेकर खाद्य सुरक्षा तक असर
भंडारण के दौरान अनाज की सुरक्षा केवल सरकारी गोदामों का विषय नहीं है। यह देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है। भंडारण में होने वाले नुकसान को कम करने से उपलब्ध खाद्यान्न की उपयोगिता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
ICAR और FCI की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब भारत में वैज्ञानिक और सुरक्षित भंडारण तकनीकों पर जोर बढ़ रहा है। यदि परीक्षणों में वैकल्पिक फ्यूमिगेशन तकनीक प्रभावी और व्यवहारिक साबित होती हैं, तो भविष्य में इनके इस्तेमाल के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार हो सकता है।
फिलहाल परियोजना के पहले चरण में नाइट्रोजन, CO2 और CO2-फॉस्फीन संयोजन का परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद बहु-स्थान परीक्षणों के जरिए अलग-अलग कृषि-जलवायु परिस्थितियों के लिए SOP तैयार करने की दिशा में काम होगा। इस पूरी प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिलेगी कि पारंपरिक रासायनिक कीट नियंत्रण के साथ या उसके विकल्प के रूप में कौन-सी तकनीकें भारतीय अनाज भंडारण व्यवस्था में व्यावहारिक रूप से उपयोगी हो सकती हैं।

