देश के जनजातीय और छोटे किसानों के सामने आज भी खेती की सीमित जमीन, वर्षा पर निर्भरता, सिंचाई के अपर्याप्त साधन, गुणवत्तापूर्ण बीजों की कमी और उत्पादन लागत जैसी अनेक चुनौतियां मौजूद हैं। इन परिस्थितियों में किसानों की आय बढ़ाने के लिए ऐसी कृषि तकनीकों की जरूरत है, जो स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुकूल होने के साथ-साथ पानी, श्रम और अन्य संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित कर सकें। ओडिशा के खुर्दा जिले के हरिदामाड़ा, जामुझारी और बरापिता गांवों में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की पहल ने इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया है।
ICAR–भारतीय जल प्रबंधन संस्थान (ICAR–Indian Institute of Water Management), भुवनेश्वर द्वारा दिसंबर 2022 में शुरू किए गए फार्मर फर्स्ट प्रोग्राम (Farmer FIRST Programme–FFP) के अंतर्गत इन गांवों में स्थान-विशिष्ट कृषि तकनीकों, जल प्रबंधन, बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन और कृषि आधारित उद्यमों को बढ़ावा दिया गया। इस पहल का उद्देश्य किसानों को केवल धान की पारंपरिक खेती तक सीमित रखने के बजाय ऐसी एकीकृत कृषि प्रणाली की ओर ले जाना है, जिससे उनकी उत्पादकता, आय और आजीविका की स्थिरता में सुधार हो सके।
इस कार्यक्रम के परिणामों में धान की पैदावार में 10–20 प्रतिशत तक वृद्धि, गर्मियों में सिंचाई के पानी की 20–25 प्रतिशत तक बचत, लगभग 20 एकड़ परती भूमि को उच्च मूल्य वाली सब्जियों की खेती के अंतर्गत लाना और कृषि आधारित अतिरिक्त आय के अवसर विकसित करना शामिल है। इसी पहल से जुड़े प्रगतिशील किसान मानस कुमार दास ने धान, सब्जियों, दलहन, डेयरी और मत्स्य पालन को एकीकृत करके अपनी खेती को आय के विविध स्रोतों से जोड़ा है।
वर्षा आधारित खेती की चुनौतियों से निपटने की पहल
खुर्दा जिले के ये गांव पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी तटीय मैदानी कृषि-जलवायु क्षेत्र में आते हैं। यहां की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है और वार्षिक वर्षा लगभग 1,100 से 1,200 मिलीमीटर तक होती है। क्षेत्र में मिट्टी की बनावट अलग-अलग प्रकार की है और पानी की उपलब्धता भी समान नहीं रहती। कुछ खेत वर्षा पर निर्भर हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में आंशिक सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है।
इन परिस्थितियों में किसानों के लिए पूरे वर्ष खेती करना आसान नहीं था। खरीफ मौसम में धान की खेती प्रमुख गतिविधि रही, लेकिन रबी मौसम में पानी की कमी और सिंचाई के सीमित साधनों के कारण कई खेत खाली रह जाते थे। इससे उपलब्ध कृषि भूमि का पूरा उपयोग नहीं हो पाता था और किसानों की आय भी एक प्रमुख फसल पर निर्भर रहती थी।
क्षेत्र के लगभग 450 परिवारों में करीब 45 प्रतिशत परिवार अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित हैं। छोटे और सीमांत किसानों की अधिकता के कारण यहां ऐसी तकनीकों की आवश्यकता थी, जिन्हें किसान अपनी जमीन, संसाधनों और आर्थिक क्षमता के अनुसार अपना सकें।
इन्हीं जरूरतों को देखते हुए ICAR–IIWM ने फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के माध्यम से किसानों के साथ मिलकर कृषि विकास की योजना तैयार की। कार्यक्रम में फसल उत्पादन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, बागवानी, पशुपालन और कृषि आधारित उद्यमों को पांच प्रमुख विषयगत क्षेत्रों के रूप में शामिल किया गया। इस बहुआयामी दृष्टिकोण का उद्देश्य खेती की अलग-अलग गतिविधियों को एक-दूसरे का पूरक बनाना और किसानों की आय के अवसर बढ़ाना था।
उन्नत धान किस्मों और वैज्ञानिक खेती से बढ़ी उत्पादकता
इस कार्यक्रम के अंतर्गत सबसे पहले धान उत्पादन को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया गया, क्योंकि यह क्षेत्र के किसानों की प्रमुख फसल है। किसानों को प्रमाणित उच्च उपज देने वाली धान किस्मों के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया गया। विभिन्न मौसमों में लगभग 75 एकड़ क्षेत्र में उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक उत्पादन पद्धतियों का प्रदर्शन किया गया।
इस दौरान एमटीयू 1061, स्वर्णा सब-1, सीआर धान 314, सीआर धान 206 और बिनाधान 11 जैसी किस्मों को शामिल किया गया। इन किस्मों का चयन संबंधित कृषि परिस्थितियों, पारिस्थितिकी और किसानों की पसंद को ध्यान में रखकर किया गया।
केवल उन्नत बीज उपलब्ध कराना ही कार्यक्रम का उद्देश्य नहीं था। इसके साथ धान की कतार में रोपाई, बीज उपचार, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोग प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक पद्धतियों को भी अपनाया गया। बीज उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा जैसे जैविक साधनों का इस्तेमाल किया गया। इसके अतिरिक्त, नर्सरी प्रबंधन को बेहतर बनाने और फसल की शुरुआती वृद्धि के लिए उपयुक्त तकनीकों का प्रदर्शन किया गया।
धान की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए पूर्व-अंकुरण और पश्च-अंकुरण शाकनाशी के उपयोग का भी उल्लेख किया गया है। इनके साथ संतुलित उर्वरक प्रबंधन और कीट नियंत्रण के उपाय अपनाए गए, ताकि फसल की बढ़वार और उत्पादकता को बेहतर बनाया जा सके।
इन तकनीकों के परिणामस्वरूप धान की उपज में 10–20 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई। बेहतर उत्पादन के साथ लाभ-लागत अनुपात में सुधार और पानी की भौतिक तथा आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने में भी मदद मिली। इसका अर्थ है कि किसानों को उपलब्ध भूमि और पानी से अधिक प्रभावी उत्पादन प्राप्त करने की दिशा में लाभ मिला।
पानी बचाने के लिए अपनाई गईं स्थान-विशिष्ट तकनीकें
धान की खेती में पानी की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण कारक है। ऐसे क्षेत्रों में जहां सिंचाई के साधन सीमित हों और वर्षा पर निर्भरता अधिक हो, वहां पानी का सही समय पर उपयोग फसल की उत्पादकता को प्रभावित करता है। फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया।
इसके लिए खेतों में वर्षाजल संग्रह करने वाले छोटे तालाबों, जिन्हें सनकेन पॉन्ड कहा जाता है, का निर्माण किया गया। खेतों की मेड़ों की ऊंचाई को उपयुक्त बनाने, पॉलीथीन मल्चिंग और छोटे एकीकृत कृषि प्रणाली (Mini Integrated Farming System–IFS) मॉडल जैसी तकनीकों को भी अपनाया गया।
वर्षाजल संग्रह संरचनाओं और पाइप आधारित सिंचाई व्यवस्था ने किसानों को जरूरत के समय खेतों तक पानी पहुंचाने में सहायता दी। विशेष रूप से फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं में जीवनरक्षक सिंचाई उपलब्ध कराने से उत्पादन जोखिम को कम करने की संभावना बनी।
धान के खेतों में पानी के बेहतर प्रबंधन के लिए मेड़ों को मजबूत और उपयुक्त ऊंचाई पर बनाए रखने, वर्षा जल को खेतों में संरक्षित करने और सिंचाई के समय का वैज्ञानिक निर्धारण करने पर जोर दिया गया।
ग्रीष्मकालीन धान की खेती में एक महत्वपूर्ण पद्धति यह रही कि खेत में भरा हुआ पानी समाप्त होने के दो से तीन दिन बाद सिंचाई की जाए। इस तकनीक से लगातार खेत में पानी भरा रखने की आवश्यकता कम होती है और फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई की जा सकती है। कार्यक्रम के अनुसार, इस स्थान-विशिष्ट जल प्रबंधन पद्धति से गर्मियों में धान की सिंचाई के पानी में 20–25 प्रतिशत तक बचत हुई।
धान आधारित फसल प्रणाली में कुल प्रणालीगत उपज 10–12 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंचने का उल्लेख किया गया है। बेहतर जल प्रबंधन, उन्नत बीजों और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन के संयुक्त प्रभाव से खेती की लागत कम करने और शुद्ध आय बढ़ाने की दिशा में भी सकारात्मक परिणाम सामने आए।
परती भूमि पर सब्जियों की खेती से खुला आय का नया रास्ता
इस कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण बदलाव रबी मौसम में दिखाई दिया। पहले अधिकांश किसान खरीफ मौसम में धान की खेती करते थे और घरों के आसपास छोटी रसोई वाटिकाओं तक ही सब्जियों का उत्पादन सीमित रहता था। सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण ऊंचाई वाले कई खेत रबी मौसम में खाली पड़े रहते थे।
फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के अंतर्गत वर्षाजल संग्रह तालाबों और पाइप आधारित सिंचाई व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध पानी का उपयोग करते हुए इन परती जमीनों को उत्पादक बनाने पर जोर दिया गया। किसानों को संकर सब्जियों के बीज उपलब्ध कराए गए और रबी मौसम में व्यावसायिक सब्जी उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया गया।
इस पहल के परिणामस्वरूप लगभग 20 एकड़ परती भूमि पर उच्च मूल्य वाली सब्जियों की खेती शुरू की गई। इनमें टमाटर, भिंडी, बैंगन, करेला, लोबिया, फूलगोभी और विभिन्न पत्तेदार सब्जियां शामिल थीं।
इन फसलों की उपज लगभग 14.25 से 28.5 टन प्रति हेक्टेयर के बीच रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन सब्जियों से किसानों को प्रति हेक्टेयर सालाना लगभग 1.32 लाख रुपये से 6.65 लाख रुपये तक की आय प्राप्त होने का उल्लेख किया गया है। यह आय फसल, उत्पादन और संबंधित परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग रही।
परती जमीन को खेती के अंतर्गत लाने से किसानों को अपनी उपलब्ध भूमि का बेहतर उपयोग करने का अवसर मिला। धान के बाद सब्जियों की खेती करने से कृषि गतिविधियों का विस्तार हुआ और परिवारों के लिए आय का एक अतिरिक्त स्रोत विकसित हुआ।
यह बदलाव आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसान अब केवल एक मौसम की फसल पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न फसलों के माध्यम से अपनी आय को विविध बनाने की संभावना तलाश रहे हैं।
पोषण वाटिका से परिवारों के भोजन में विविधता
कार्यक्रम के अंतर्गत बागवानी आधारित गतिविधियों को भी महत्व दिया गया। किसानों को संकर सब्जियों के बीज और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (IIHR) द्वारा तैयार किए गए न्यूट्री-गार्डन किट वितरित किए गए।
इन किट का उद्देश्य परिवारों को घर के आसपास उपलब्ध जमीन पर विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाने के लिए प्रोत्साहित करना था। इससे परिवारों को ताजी हरी सब्जियां उपलब्ध कराने और भोजन में विविधता बढ़ाने का अवसर मिला।
विशेष रूप से छोटे किसानों और जनजातीय परिवारों के लिए घरेलू स्तर पर सब्जियों का उत्पादन उपयोगी हो सकता है। इससे बाजार से सब्जियां खरीदने पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल सकती है और परिवारों को पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का अवसर मिलता है।
इस तरह कार्यक्रम ने कृषि को केवल बाजार में बिक्री और आय तक सीमित न रखकर परिवारों के पोषण और घरेलू खाद्य सुरक्षा से भी जोड़ने का प्रयास किया।
मशरूम उत्पादन और वर्मी कम्पोस्ट से कृषि आधारित उद्यमों को बढ़ावा
किसानों की आय बढ़ाने के लिए कार्यक्रम में उद्यम आधारित गतिविधियों को भी शामिल किया गया। इसके अंतर्गत मशरूम उत्पादन और वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया गया।
मशरूम उत्पादन किसानों को कृषि आधारित एक अतिरिक्त उद्यम उपलब्ध करा सकता है। वहीं, वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण जैविक पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने और कृषि अपशिष्ट का उपयोगी प्रबंधन करने में सहायक होता है।
इन गतिविधियों का उद्देश्य खेती के साथ अतिरिक्त आय के अवसर पैदा करना और किसानों को एक से अधिक आर्थिक स्रोतों से जोड़ना था। वर्मी कम्पोस्ट जैसी तकनीकें फसल उत्पादन प्रणाली में भी उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं, क्योंकि जैविक खाद का उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता और पोषक तत्व प्रबंधन के लिए किया जाता है।
उन्नत कुक्कुट पालन से अंडा उत्पादन में बड़ा सुधार
पशुपालन आधारित गतिविधियों में उन्नत मुर्गी नस्लों को शामिल किया गया। कार्यक्रम के अंतर्गत वनराजा, आरआईआर, कावेरी और वेजागुड़ा जैसी नस्लों को बढ़ावा दिया गया। इन नस्लों के उपयोग से अंडा उत्पादन में स्थानीय पक्षियों की तुलना में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, स्थानीय मुर्गियों से सालाना लगभग 30–40 अंडे प्राप्त होते थे, जबकि उन्नत नस्लों में यह संख्या लगभग 137 से 205 अंडे प्रति वर्ष तक पहुंची। इससे ग्रामीण परिवारों को अंडों की उपलब्धता बढ़ाने और संभावित रूप से अतिरिक्त बिक्री से आय प्राप्त करने का अवसर मिला।
डेयरी गतिविधियों को बेहतर बनाने के लिए पशुओं को खनिज मिश्रण उपलब्ध कराने और पशुपालन प्रबंधन में सुधार पर भी ध्यान दिया गया। इस प्रकार कृषि के साथ पशुधन को जोड़कर परिवारों की आजीविका के विविधीकरण का प्रयास किया गया।
तालाबों में मत्स्य पालन से बढ़ी आय और प्रोटीन की उपलब्धता
कार्यक्रम के अंतर्गत स्थानीय तालाबों में भारतीय प्रमुख कार्प मछलियों का संचयन करके मत्स्य पालन को भी प्रोत्साहित किया गया। गांवों में उपलब्ध जल संसाधनों का उपयोग कृषि सिंचाई के साथ-साथ मछली उत्पादन के लिए करने से एकीकृत कृषि प्रणाली की संभावनाएं बढ़ीं।
मत्स्य पालन से परिवारों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिल सकता है। साथ ही, मछली स्थानीय स्तर पर प्रोटीनयुक्त भोजन की उपलब्धता बढ़ाने में भी सहायक हो सकती है।
इस प्रकार फसल उत्पादन, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन को एक साथ जोड़ने का उद्देश्य उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना और परिवारों की आय को अलग-अलग गतिविधियों में बांटना था। इससे किसी एक फसल या गतिविधि पर निर्भरता कम करने की संभावना बनती है।
प्रगतिशील किसान मानस कुमार दास की प्रेरक सफलता
इस कार्यक्रम से जुड़े किसानों में हरिदामाड़ा गांव के मानस कुमार दास की कहानी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने वैज्ञानिक खेती और एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाकर अपनी लगभग 3.5 एकड़ जमीन तथा पट्टे पर लिए गए गांव के तालाब का उपयोग विभिन्न कृषि गतिविधियों के लिए किया।
मानस कुमार दास ने धान की खेती के साथ सब्जी उत्पादन, दलहन, डेयरी और मत्स्य पालन को जोड़ा। उन्होंने ICAR–IIWM द्वारा प्रोत्साहित तकनीकों को अपनी खेती की परिस्थितियों के अनुसार अपनाया।
उनकी कृषि पद्धति में उन्नत धान किस्मों का उपयोग, मचान आधारित सब्जी उत्पादन, तालाब के पानी से सिंचाई, मेड़ एवं नाली आधारित जल प्रबंधन, जैव उर्वरकों का इस्तेमाल और पर्यावरण के अनुकूल कीट नियंत्रण जैसी तकनीकें शामिल थीं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने क्रमिक रूप से विभिन्न सब्जियां उगाकर खेती की गतिविधियों को पूरे वर्ष अधिक व्यवस्थित बनाने का प्रयास किया।
मत्स्य पालन के लिए उन्होंने भारतीय प्रमुख कार्प मछलियों की खेती को भी अपनी कृषि प्रणाली में शामिल किया। इस प्रकार उनकी खेती केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं रही, बल्कि कृषि, पशुपालन और जल संसाधनों को एक साथ जोड़ने वाला मॉडल बन गई।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मानस कुमार दास को अपनी कृषि गतिविधियों से सालाना लगभग 3.56 लाख रुपये की आय प्राप्त हुई। इसके अलावा, कुशल राजमिस्त्री के रूप में काम करके उन्होंने लगभग 1.80 लाख रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित की। इस तरह उनकी कुल वार्षिक आय लगभग 5.46 लाख रुपये रही।
उनके प्रयासों और प्रगतिशील कृषि गतिविधियों को मान्यता देते हुए ICAR–NAARM, हैदराबाद ने उन्हें वर्ष 2025 में प्रगतिशील किसान पुरस्कार से सम्मानित किया। यह उपलब्धि वैज्ञानिक खेती को अपनाने, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और आय के विविध स्रोत विकसित करने के उनके प्रयासों को रेखांकित करती है।
मानस कुमार दास का उदाहरण यह भी बताता है कि छोटे किसान खेती के साथ दूसरे कौशल और उद्यमों को जोड़कर अपनी आजीविका को मजबूत कर सकते हैं। उनकी सफलता आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।
किसान-वैज्ञानिक संपर्क से टिकाऊ कृषि की ओर कदम
फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू किसानों और वैज्ञानिकों के बीच सीधा संपर्क स्थापित करना है। स्थानीय जरूरतों को समझकर तकनीकों का चयन करना और किसानों को प्रदर्शन के माध्यम से उनका व्यावहारिक अनुभव देना इस प्रकार की पहल को उपयोगी बनाता है।
हरिदामाड़ा, जामुझारी और बरापिता में लागू की गई तकनीकों ने दिखाया कि एक ही समाधान सभी खेतों के लिए उपयुक्त नहीं होता। मिट्टी की बनावट, पानी की उपलब्धता, फसल की प्रकृति और किसानों की पसंद के अनुसार तकनीकों में बदलाव करना आवश्यक है।
उन्नत बीजों से लेकर वर्षाजल संग्रह, सिंचाई प्रबंधन, सब्जी उत्पादन, पशुपालन और मत्स्य पालन तक फैली गतिविधियों ने कृषि प्रणाली को अधिक विविध बनाने की दिशा में काम किया। इससे पानी की उत्पादकता बढ़ाने, खाली पड़ी भूमि का उपयोग करने और परिवारों की आय के नए अवसर विकसित करने में मदद मिली।
विकसित भारत 2047 की दिशा में स्थानीय कृषि मॉडल
ओडिशा के इन जनजातीय गांवों में फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के अंतर्गत हुए बदलाव इस बात का उदाहरण हैं कि वैज्ञानिक कृषि तकनीकों का स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयोग ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने में योगदान दे सकता है।
धान उत्पादन में सुधार, सिंचाई के पानी की बचत, रबी मौसम में सब्जियों की खेती, पोषण वाटिकाओं का विकास और कृषि आधारित उद्यमों को बढ़ावा देना इस पहल के प्रमुख परिणामों में शामिल हैं। वहीं, मानस कुमार दास जैसे किसानों ने एकीकृत खेती के माध्यम से यह प्रदर्शित किया कि उपलब्ध भूमि, तालाब और श्रम का बेहतर नियोजन आय के कई स्रोत तैयार कर सकता है।
हालांकि, इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों में लागू करने से पहले स्थानीय जलवायु, बाजार की उपलब्धता, निवेश क्षमता और किसानों की जरूरतों का मूल्यांकन करना जरूरी है। फिर भी यह पहल छोटे और जनजातीय किसानों के लिए संसाधन-कुशल तथा विविधीकृत खेती की संभावनाओं को रेखांकित करती है।
कुल मिलाकर, ICAR–IIWM के फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम ने हरिदामाड़ा, जामुझारी और बरापिता गांवों में खेती को केवल धान उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय एक व्यापक आजीविका प्रणाली के रूप में विकसित करने का रास्ता दिखाया है। पानी का बेहतर प्रबंधन, वैज्ञानिक फसल उत्पादन और कृषि आधारित उद्यमों का समन्वय किसानों को अधिक टिकाऊ और लाभकारी खेती की दिशा में आगे बढ़ने में मदद कर सकता है।

