भारत में भूमि शासन, नीति और विकास से जुड़े मुद्दों पर ILDC विभिन्न हितधारकों को एक मंच पर लाता है। जिसे वर्ष 2017 से इंडिया लैंड एण्ड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस (ILDC) के रूप में जाना–पहचाना जा रहा है। यह कॉन्फ्रेंस सरकारी निकाय, नागरिक संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं को सालाना एक साझा संवाद मंच प्रदान करती है। वर्ष 2017 में अपनी स्थापना से लेकर अब तक 70 देशों के 3,000 से अधिक प्रतिभागियों ने इन कॉन्फ्रेंस में शिरकत की है। जबकि, 200 से अधिक संस्थानों का सहयोग रहा है। वहीं, 300 से अधिक सत्र आयोजित किए जा चुके हैं। बीते वर्ष 2025 में ILDC की यह 9वीं थी। जो 18 से 20 नवंबर के बीच गुजरात के प्रमुख शहर अहमदाबाद में सम्पन्न हुयी। इस कॉन्फ्रेंस में ‘लैंडस्टैक’ संस्था ने प्रबंधकीय दायित्व को निभाया। अहमदाबाद मेनेजमेंट एसोसिएशन (AMA) में सम्पन्न हुयी इस कॉन्फ्रेंस में 23 देशों के 492 प्रतिभागी शामिल हुए। जिसमें 207 महिलायें, 281 पुरुष और 3 अन्य प्रतिभागी थे। इस बार की कॉन्फ्रेंस का विषय ‘सतत विकास में भूमि की केन्द्रीय भूमिका: अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान’ था। कॉन्फ्रेंस के अंतर्गत कार्यक्रमों में 73 विषयगत सत्रों का संचालन हुआ। जिसमें कुछ सत्र ‘शहरी नियोजन अतीत, वर्तमान और भविष्य, गुजरात की नगर योजना, पर केंद्रित थे। इन सत्रों के संवाद में संध्या नायडू जनार्दन, ध्रुव पटेल, सेजल पटेल, गणेश अहीर, अश्विनी देशपांडे, रोहन शेठ जैसे विभिन्न वक्ताओं ने अपने तरह–तरह के विचार और अनुभव साझा किए।
संध्या नायडू जनार्दन कम्युनिटी डिजाइन एजेंसी की संस्थापक हैं। इस संवाद में अपने विचार साझा करते हुए वे कहती हैं कि, ‘शहरी साझा संसाधनों की परिभाषा एक पश्चिमी दृष्टिकोण से आती है। जिसमें शहरी साझा संसाधनों की समझ, हमारी शिक्षा और सोच भी शामिल हैं। मुझे लगता है कि, अब हम शहरी साझा संसाधनों को परिभाषित करने की स्वतंत्रता हासिल कर रहे हैं।, इसके आगे वे अपने कार्य का जिक्र करते हुए कहती हैं कि, ‘हम मुंबई में हासिए के समुदाय की महिलाओं के साथ समूह में पुनर्वास कालोनी को लेकर काम कर रहे हैं। इस कार्य में हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि, समुदाय कैसे सार्वजनिक स्थान माने जाने वाले क्षेत्र से जुड़ते हैं। वहीं, महिलाओं के साथ काम में हमारा लक्ष्य यह था कि, हम इन महिलाओं के साथ कैसे काम करें। ताकि, खाली जगहों को बनाए रखा जाए।
संध्या आगे फरमाती हैं कि, ‘जब हमने महिलाओं को एकजुट किया, तब महिलाओं ने 17-18 वर्ष से कचरे में दबी जमीन को साफ करने का फैसला लिया। जब महिलाओं ने कचरा साफ किया तब कचरे के नीचे की जमीन बाहर आयी। पर अब सवाल था कि, इस जमीन को अतिक्रमण, अनधिकृत कब्जे से कैसे बचाएं, ऐसे में महिलाओं ने इस जमीन को संरक्षित करने के लिए पेड़ लगा दिए। ताकि लोगों को हवा, छाया और ठंडक मिल सके।,
ध्रुव पटेल CREDAI के प्रेसीडेंट हैं। इस कॉन्फ्रेंस के कार्यक्रम में वे भी शामिल हुए। संवाद सत्र में संबोधित करते हुए वे जाहिर करते हैं कि, ‘राज्य और शहर में 1960 के बाद से अब तक शहरी
नियोजन देखें तब समझ आता है कि, गुजरात उन राज्यों में हैं जहां स्थानीय नियोजन पद्धति है। अब तक हमने संगठनित विकास देखा। अब तक नियोजक यह कल्पना करते थे कि, शहर का नियोजन कैसे बनाया जाएं और बुनयादी ढांचागत सुविधाएं कैसे विकसित की जाएं। मगर, अब हमें विकास को विश्वस्तरीय बनाने के लिए सुधार की गुंजाइश है।,
आगे वे एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि, ‘अहमदाबाद के एक सिलाग इलाके में एक रिंग रोड गुजरती है। ये रोड लगभग 83 किलोमीटर लंबी है। जो 20 वर्ष पहले बनाई गयी थी। यह रोड अहमदाबाद की जीवन रेखा है। पर आज समय के साथ–साथ सड़क का उपयोग, बुनियादी ढांचा, यातायात प्रबंधन बहुत कुछ भीड़भाड़ वाला हो गया है। अब हमें शहरी नियोजन सामूहिकता और दूरदर्शिता के साथ करना होगा। जिसमें यह देखना होगा कि, 15-20 वर्ष बाद इस नियोजन में क्या बदलाव और असर दिखेंगें।,
इसके बाद ध्रुव यह भी कहते हैं कि, ‘सरकार और अधिकारी भी इस बात को चाहते हैं कि, सभी हितधारकों को नियोजन निर्मित करने, क्रियान्वित करने, निगरानी करने और उसमें सुधार करने के लिए एक साथ आना होगा। तभी एक अच्छा नियोजन तैयार किया जा सकता है।,
से जल पटेल CEPT यूनिवर्सिटी से जुड़ी हैं। इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होकर उन्होंने भी संवाद सत्र में अपने विचार साझा किये। इस दौरान शहरी पुनर्विकास की चर्चा करते हुए वे कहती हैं कि, ‘आज गुजरात के शहरी पुनर्विकास में मुख्यत: शहरी अनौपचारिक बस्तियां, गरीबों के, सार्वजनिक और निजी आवास को व्यवस्थित करना शामिल है। आवास पुनर्विकास नीति में भी बहुत तेजी आयी है। आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र में 10 प्रतिशत निवेश पुनर्विकास परियोजनाओं के माध्यम से आ रहा है। वर्ष 2017 से 2023 के बीच आवास निर्माण के नए प्रवाह का लगभग 15 प्रतिशत पुनर्विकास के जरिए पूरा हो रहा है। यह केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं बल्कि, उन अन्य शहरों में भी किया जा रहा है जहां जमीन की कीमतें बढ़ रही हैं।,
हालांकि, सेजल पटेल के आवास योजना जैसे विचारों में शिशिर गेमावत अपनी बात से संतुलन पेश करते हैं। शिशिर गेमावत मध्य प्रदेश में एडिशनल कमिश्नर के पद पर हैं। वे कहते हैं कि, ‘पीएमएवाई (प्रधानमंत्री आवास योजना) के तहत सब्सिडी या मकान देते समय दस्तावेज़ों की जाँच में कई कठिनाईयां आती हैं। कई लोगों के पास जमीन या घर के स्वामित्व के पक्के कागज़ नहीं होते, जिससे योजना का लाभ देने में दिक्कत आती है।,
इसके आगे वह कहते हैं कि, ‘मध्यप्रदेश में स्वामित्व के प्रमाण के रूप में बिजली बिल, पानी का बिल आदि जैसे अलग–अलग दस्तावेज़ों को भी स्वीकार किया गया। इससे यह समझ आता है कि आवास योजनाओं, खासकर पीएमएवाई के बीएलसी (Beneficiary Led Construction2) घटक में, भूमि स्वामित्व एक बड़ी चुनौती बन सकता है।,
गणेश अहीर HCP में अर्बन प्लानर के रूप में पहचाने जाते हैं। इस संवाद में वे अपनी बात 2013 की एक विकास योजना से शुरू करते हैं। वे बतलाते हैं कि, भारतीय संदर्भ में किसी भी प्रकार की शहरी योजना को लागू करने के लिए हमें इन कुछ पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए:
- हमें संपत्ति के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक भूखंड के लिए कई भूमि–मालिक होते हैं।
- योजना उस डेवलपर के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य होनी चाहिए जो उस क्षेत्र में वाणिज्यिक/आवासीय परियोजनाएँ बनाता है।
- जिस क्षेत्र में सरकारी विकास प्राधिकरण बुनियादी ढाँचा बना रहा है, उसके लिए एक टिकाऊ राजस्व मॉडल होना चाहिए।
- योजना कानूनी रूप से लागू की जा सकने योग्य होनी चाहिए।
- योजना से शहर उन सामान्य लोगों के लिए अधिक रहने योग्य और उत्पादक बनना चाहिए जो उस क्षेत्र में रहते हैं या वहाँ आने–जाने (आवागमन) करते हैं।
गणेश अहीर आगे उल्लेख करते हैं कि ‘यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि शहरी नियोजन अतीत की गलतियों को सुधारने के लिए जबरदस्ती लागू न किया जाए। वे अपने विभाग के प्रयासों का एक उदाहरण साझा करते हैं, जहाँ अहमदाबाद के एक पुराने क्षेत्र के विकास में कई सड़कें पैदल चलने योग्य नहीं थीं क्योंकि फुटपाथ के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी। यहाँ उन्होंने एक सजग और संवेदनशील नियामक दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें भविष्य के पुनर्विकास के लिए उच्च FSI के साथ अनुमति उन डेवलपर्स को दी गई जिन्होंने पैदल चलने योग्य सड़कों के लिए पर्याप्त स्थान छोड़ने का पालन किया। यद्यपि यह योजना अभी प्रगति पर है, लेकिन इससे धीरे–धीरे उस मोहल्ले में सार्वजनिक सड़कों का कुल क्षेत्रफल बढ़ सकता है।‘
इस कॉन्फ्रेंस का हिस्सा अश्विनी देशपांडे भी रहीं। वे नागर संस्था में कार्यरत हैं। अपने शब्दों के जरिए इस चर्चा में वे कहती हैं कि, ‘नागर संस्था कई तरह के कार्य कर रही है। इन कार्यों में शोध कार्य भी शामिल है। शोध कार्य के अंतर्गत हम यह समझने का प्रयास करते हैं कि, शहर के विभिन्न खुले स्थानों में क्या हो रहा है? इसका हम सर्वेक्षण कर डेटा हासिल करते हैं। हम शहरी विकास, खुले स्थानों से संबंधित मामलों को कोर्ट तक भी ले जाते हैं ताकि, उचित फैसले आ सकें।,
इसके बाद अश्विनी बतलाती हैं कि, ‘आज शहरों की अनौपचारिक बस्तियों में खुले स्थानों की अत्यंत कम संख्या है। करीब 20 वर्ष से जो विकास योजना की कल्पना की गयी है वह बातों से काफी अलग है। वास्तव में अनौपचारिक बस्तियां अत्यधिक घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अपने स्वयं के स्थान को विकसित करने का शहरी अधिकार कैसे प्राप्त करें? यह बढ़ा सवाल बना हुआ है।,
आगे अपने विचार पेश करते हैं रोहन शेठ। वे कोलोकेशन एण्ड डेटा सेंटर सर्विसेस से जुड़े हुए हैं। रोहन बताते हैं कि, ‘आज उद्योग और नौकरियां बढ़ रही हैं। जिससे पूरी अर्थव्यवस्था 5 अरब की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही है। इसमें डेटा सेक्टर, एआई का अहम योगदान हैं। हालांकि, इन सेक्टर में योजना बनाने और स्थान के नजरिए से कई चुनौतियाँ भी हैं। जब हम वैश्विक स्तर की तुलना में भारत के किसी छोटे शहर में विशाल कैंपस या डेटा सेंटर की योजना बनाते हैं। पर अस्तित्व में भारत के इन छोटे शहरों में और साथ ही साथबड़े शहरो में भी ,जैसे मुंबई, दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई, इन शहरो को भी बिजली, फाइबर, खुले स्थानों, नियमों जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।,
इसके बाद वे व्यक्त करते हैं कि, ‘आज शहरों में इमारतों को बनाना उतना कठिन नहीं हैं, जितना बिजली, खुले स्थानों, रास्तों का अधिकार प्राप्त करना हैं। इन अधिकारों के लिए लोग सालों का इंतजार करते हैं। ऐसा इसलिए भी होता है कि, बहुत सारी निर्माण गतिविधियां एक साथ चल रहीं होती हैं। जैसे, आवासीय, मेट्रो, झुग्गी–झोपड़ी पुनर्वास, सड़क कार्य।,
अपने विचारों को रोकने से पहले वे कहते हैं कि, ‘हमारे देश में प्रबंधन भी आधा–अधूरा है। जहां कोई अच्छे नियम नहीं हैं। हर चीज का राजनीतिकरण हो गया है। आज हमारे पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान किससे हो रहा है और सबसे ज्यादा फायदा किससे है? इस ज्ञान की देश में कमीं है। देश की स्थिति देखकर लगता है कि, हम 18 वीं सदी में जी रहे हैं। जबकि, दुनियां तेज गति से आगे बढ़ रही है।,
गौर फरमाने योग्य है कि, इन साझा संवाद सत्रों में
विचार–विमर्श से कई खास पहलू निकल कर सामने आए। जैसे की अर्बन प्लानिंग को न सिर्फ भविष्य के लिए बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर और टेन्योर राइट्स, दोनों के मामले में पिछली गलतियों के लिए भी प्लान बनाना होगा। हाउसिंग मिशन, ब्राउन फील्ड रीडेवलपमेंट, ओपन स्पेस बनाना, डेटा सेंटर पावर निर्मित करना यह सब नियोजन अकेले संभव नहीं हो सकता। जैसा कि, ध्रुव पटेल ने कहा कि, वर्ल्ड क्लास शहर बनाने के लिए सभी हितधारकों को एक–दूसरे से बात करनी होगी। एक–दूसरे से सीखना होगा। तभी वर्तमान और भविष्य की दृष्टि अच्छा नियोजन संभव हो पाएगा।
सतीश भारतीय

