बुंदेलखंड क्षेत्र में खेती और ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से प्रशिक्षित 408 कृषि सखियां खेती और पशुपालन के तौर-तरीकों में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं। इन महिलाओं को विभाग द्वारा फार्म आजीविका सखी के रूप में नामित किया गया है, जो किसानों को आधुनिक और प्राकृतिक खेती के तरीके अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
ये कृषि सखियां गांव-गांव जाकर किसानों को प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और जैविक कीटनाशकों के उपयोग के बारे में प्रशिक्षण दे रही हैं। मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए वे धनजीव अमृत और बीज अमृत जैसे जैविक घोल तैयार कर किसानों को उनके उपयोग की जानकारी दे रही हैं। इन उपायों से फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में सुधार देखने को मिल रहा है।
कृषि सखियां ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि पाठशाला और पशु पाठशाला का आयोजन भी करती हैं। इन कार्यक्रमों में किसानों को प्राकृतिक खेती के सिद्धांत, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के तरीके और कम लागत में खेती करने के उपाय सिखाए जाते हैं। इसके साथ ही पशुपालन से जुड़े विषयों—जैसे पशुओं की साफ-सफाई, समय पर टीकाकरण और हर्बल उपचार—के बारे में भी जागरूक किया जाता है।
जिला मिशन प्रबंधक सुनील कुमार के अनुसार, कृषि सखियां पूरे समर्पण के साथ किसानों के बीच काम कर रही हैं। इन्हें गांवों में किचन गार्डन या पोषण वाटिका विकसित कराने के लिए प्रोत्साहन राशि के रूप में 500 रुपये का भुगतान किया जाता है, जिससे उन्हें आर्थिक सहायता भी मिलती है।
इन महिलाओं के प्रयासों से ग्रामीण परिवारों में पोषण वाटिकाओं का विस्तार हो रहा है। कृषि सखियां घर-घर जाकर लोगों को सब्जियां और पोषक फसलें उगाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। इससे न केवल परिवारों को ताजा और पौष्टिक भोजन मिल रहा है, बल्कि अतिरिक्त उत्पादन से आय के अवसर भी बन रहे हैं।
बड़ोखर खुर्द की सरिता द्विवेदी, रीगा की सरिता शर्मा, महुआ क्षेत्र की ऋतु, बिसंडा की राधा और नरैनी की श्रीदेवी जैसी कई महिलाएं इस पहल में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। इनकी मेहनत और समर्पण से अब अन्य महिला किसान भी खेती और पशुपालन में नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हो रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि सखियों की यह पहल बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में कृषि को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। साथ ही, इससे ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाने में भी मदद मिल रही है।

