हरियाणा के किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) ने सरसों की अपनी पहली हाइब्रिड किस्म RHS 2102 विकसित कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। यह नई किस्म खास तौर पर सिंचित क्षेत्रों के लिए तैयार की गई है और समय पर बुआई करने पर किसानों को अधिक पैदावार देने का वादा करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह किस्म देश के बढ़ते तेल आयात को कम करने में भी अहम भूमिका निभा सकती है।
विश्वविद्यालय के अनुसार RHS 2102 को हाल ही में गजट में अधिसूचित किया गया है। इसे अखिल भारतीय समन्वित सरसों एवं राई अनुसंधान प्रोजेक्ट के तहत तीन वर्षों तक गहन परीक्षण के बाद जारी किया गया है। यह किस्म हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, जम्मू और उत्तरी राजस्थान के सिंचित इलाकों में किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
इस नई हाइब्रिड किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी उच्च उत्पादकता है। RHS 2102 औसतन 28 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देने में सक्षम है। यह पुरानी किस्म RH 749 से 14.5 प्रतिशत, DMH-1 से 11 प्रतिशत और एक प्राइवेट हाइब्रिड 45546 से करीब 8 प्रतिशत अधिक पैदावार देती है। अधिक उपज के साथ-साथ इसमें तेल की मात्रा भी ज्यादा है, जिससे किसानों को बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
यह किस्म लगभग 142 दिनों में पककर तैयार हो जाती है, जो इसे एक संतुलित अवधि वाली फसल बनाती है। RHS 2102 में शाखाओं की संख्या अधिक होती है और हर फली में दानों की संख्या भी ज्यादा होती है। यही वजह है कि इसकी कुल उत्पादन क्षमता अन्य उन्नत किस्मों की तुलना में बेहतर मानी जा रही है। इसके दाने मध्यम आकार के होते हैं और इनमें करीब 40 प्रतिशत तक तेल पाया जाता है, जो इसे व्यावसायिक दृष्टि से बेहद लाभकारी बनाता है।
HAU के वैज्ञानिकों ने बताया कि यह किस्म न सिर्फ उत्पादन बढ़ाएगी बल्कि किसानों की आय में भी इजाफा करेगी। तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी से देश की खाद्य तेल पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिलेगी, जो सरकार के आत्मनिर्भर भारत मिशन के लिए अहम कदम माना जा रहा है।
विश्वविद्यालय की सरसों अनुसंधान टीम अब तक 25 उन्नत किस्में और एक हाइब्रिड विकसित कर चुकी है। इनमें RH 725, RH 1424 और RH 1975 जैसी किस्में पहले से ही किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हैं और अन्य राज्यों में भी इनके बीज की भारी मांग है। पिछले छह वर्षों में वैज्ञानिकों ने अलग-अलग परिस्थितियों के लिए पांच नई किस्में विकसित की हैं।
इस हाइब्रिड किस्म के विकास में डॉ. राम अवतार, डॉ. नीरज कुमार, डॉ. मंजीत सिंह, डॉ. अशोक कुमार और डॉ. सुभाष चंद्र का प्रमुख योगदान रहा। वहीं, डॉ. राकेश पूनिया, डॉ. दिलीप कुमार, डॉ. निशा कुमारी, डॉ. विनोद गोयल, डॉ. श्वेता, डॉ. महावीर बिश्नोई और डॉ. राजवीर सिंह ने भी महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
कुल मिलाकर, RHS 2102 सरसों उत्पादन में एक नई क्रांति का संकेत है, जो आने वाले समय में किसानों की आय और देश की तेल आत्मनिर्भरता दोनों को मजबूत कर सकती है।

