भारत में उर्वरकों की कहानी सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और सरकारी खजाने से भी सीधे जुड़ी हुई है। यही वजह है कि केंद्र सरकार हर साल उर्वरक सब्सिडी पर भारी रकम खर्च करती है। लेकिन अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि सरकार का फर्टिलाइज़र सब्सिडी बिल 2026-27 में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है।
अनुमान है कि आगामी वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी का खर्च लगभग 3.4 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जबकि बजट में इसके लिए 1.70 लाख करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया है। यह राशि 2022-23 के उस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ सकती है, जब सरकार ने उर्वरक सब्सिडी पर 2.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए थे।
इसी बढ़ते वित्तीय दबाव के बीच सरकार उर्वरक क्षेत्र में एक बड़े सुधार पर विचार कर रही है। प्रस्ताव यह है कि कुछ श्रेणी के गैर-सब्सिडी वाले फर्टिलाइज़र को मंजूरी देने की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए, ताकि नई तकनीक वाले उत्पाद तेजी से किसानों तक पहुंच सकें।
लंबी और जटिल है मौजूदा मंजूरी प्रक्रिया
भारत में किसी भी नए उर्वरक को बाजार में उतारने से पहले उसे फर्टिलाइज़र (कंट्रोल) ऑर्डर, 1985 (FCO) के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। यह नियम सब्सिडी वाले और गैर-सब्सिडी वाले दोनों प्रकार के उत्पादों पर लागू होता है।
किसी कंपनी को नए उत्पाद के लिए आवेदन करते समय उसके रासायनिक संघटन, निर्माण प्रक्रिया, गुणवत्ता मानकों और सुरक्षा संबंधी विस्तृत दस्तावेज जमा करने पड़ते हैं। इसके बाद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों की निगरानी में कई स्थानों पर कम से कम दो फसल सीजन तक फील्ड ट्रायल किए जाते हैं।
इन परीक्षणों का उद्देश्य यह जांचना होता है कि नया उत्पाद फसल उत्पादन बढ़ाने, पौधों की तनाव सहनशीलता सुधारने और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में कितना प्रभावी है। सभी परीक्षण पूरे होने के बाद केंद्रीय उर्वरक समिति अंतिम निर्णय लेती है।
उद्योग जगत का मानना है कि यह पूरी प्रक्रिया अत्यधिक समय लेने वाली है। कई मामलों में किसी नए उत्पाद को मंजूरी मिलने में दो साल से अधिक समय लग जाता है।
दुनिया के मुकाबले भारत काफी पीछे
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में नए फर्टिलाइज़र के पंजीकरण में औसतन 800 से अधिक दिन लग जाते हैं। तुलना करें तो अमेरिका में यह प्रक्रिया लगभग 90 दिन, यूरोपीय संघ और जापान में करीब 30 दिन, ऑस्ट्रेलिया में 20 दिन तथा वियतनाम में मात्र 15 दिन में पूरी हो जाती है।
यही कारण है कि कई वैश्विक कंपनियां अपने नवीनतम उत्पाद भारत में लाने से पहले लंबा इंतजार करने को मजबूर होती हैं।
सरकार अब ऐसे उत्पादों को अनिवार्य फील्ड ट्रायल से छूट देने पर विचार कर रही है जो पहले से तय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को पूरा करते हों। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो कई आधुनिक पोषक तत्व उत्पादों को तेजी से मंजूरी मिल सकेगी।
क्यों जरूरी हैं नए जमाने के फर्टिलाइज़र?
भारतीय खेती लंबे समय से मुख्य रूप से यूरिया और डीएपी जैसे पारंपरिक उर्वरकों पर निर्भर रही है। हालांकि इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन इनकी अपनी सीमाएं भी हैं।
यूरिया में 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है, लेकिन फसल इसका केवल 30-40 प्रतिशत ही उपयोग कर पाती है। बाकी नाइट्रोजन का बड़ा हिस्सा अमोनिया गैस के रूप में उड़ जाता है या पानी के साथ बहकर भूजल में पहुंच जाता है।
डीएपी की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है। इसमें मौजूद फॉस्फोरस का बड़ा हिस्सा मिट्टी में रासायनिक रूप से बंध जाता है और पौधों के लिए अनुपलब्ध हो जाता है। इस कारण इसकी वास्तविक उपयोग क्षमता कई बार 15-25 प्रतिशत तक ही सीमित रह जाती है।
यही वजह है कि दुनिया भर में ऐसे उत्पादों की मांग बढ़ रही है जो पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित कर सकें।
पानी में घुलने वाले उर्वरकों की बढ़ती लोकप्रियता
हाल के वर्षों में वॉटर सॉल्युबल फर्टिलाइज़र (WSF) भारतीय किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। ये पूरी तरह पानी में घुल जाते हैं और ड्रिप सिंचाई या पत्तियों पर स्प्रे के माध्यम से सीधे पौधों तक पहुंचाए जा सकते हैं।
इन उत्पादों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसान फसल की जरूरत के अनुसार सटीक मात्रा में पोषक तत्व दे सकते हैं। इससे उर्वरक की बर्बादी कम होती है और पौधों को तुरंत पोषण मिलता है।
यारा, डीसीएम श्रीराम और कई अन्य कंपनियां अलग-अलग फसलों और विकास अवस्थाओं के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए WSF उत्पाद बाजार में ला रही हैं।
अंगूर, अनार, टमाटर, मिर्च, खीरा और अन्य बागवानी फसलों में इनका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। फसल की वृद्धि, फूल आने, फल बनने और पकने की अवस्थाओं के अनुसार अलग-अलग पोषक तत्व संयोजन उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
ड्रिप सिंचाई के साथ बढ़ रही मांग
भारत में सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों, विशेषकर ड्रिप इरिगेशन, का विस्तार भी WSF बाजार को बढ़ावा दे रहा है।
ड्रिप प्रणाली के माध्यम से पोषक तत्व सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचते हैं। इससे पानी की बचत होती है और उर्वरक की दक्षता भी बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जहां पारंपरिक उर्वरकों की न्यूट्रिएंट यूज एफिशिएंसी (NUE) काफी कम होती है, वहीं वॉटर सॉल्युबल और लिक्विड फर्टिलाइज़र में यह 80 से 95 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का बढ़ता महत्व
आज खेती केवल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश तक सीमित नहीं रह गई है। जिंक, बोरॉन, आयरन, मैंगनीज, कॉपर और मोलिब्डेनम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी अच्छी पैदावार के लिए जरूरी हो गए हैं।
देश के कई हिस्सों में मिट्टी परीक्षणों से जिंक और बोरॉन की कमी सामने आई है। ऐसे में माइक्रोन्यूट्रिएंट आधारित उर्वरकों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है।
कई कंपनियां जिंक युक्त यूरिया, बोरॉन युक्त डीएपी और कीलेटेड माइक्रोन्यूट्रिएंट्स जैसे उत्पाद पेश कर रही हैं, जिनसे पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर होती है।
भविष्य की तकनीक: नैनो और कंट्रोल्ड-रिलीज़ फर्टिलाइज़र
उर्वरक उद्योग अब नैनो टेक्नोलॉजी और कंट्रोल्ड-रिलीज़ तकनीकों की ओर बढ़ रहा है।
इन उत्पादों में पोषक तत्व धीरे-धीरे निकलते हैं और फसल की मांग के अनुसार उपलब्ध होते रहते हैं। इससे पोषक तत्वों की हानि कम होती है और उनकी उपयोग क्षमता बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कंट्रोल्ड-रिलीज़ फर्टिलाइज़र की न्यूट्रिएंट यूज एफिशिएंसी 60-70 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जो पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में काफी अधिक है।
बायो-स्टिमुलेंट्स भी बन रहे हैं लोकप्रिय
हाल के वर्षों में बायो-स्टिमुलेंट्स की मांग भी तेजी से बढ़ी है। इनमें सीधे पोषक तत्व नहीं होते, लेकिन ये पौधों की वृद्धि, जड़ विकास, पोषक तत्व अवशोषण और तनाव सहनशीलता को बेहतर बनाते हैं।
समुद्री शैवाल, ह्यूमिक एसिड, फुल्विक एसिड, लाभकारी बैक्टीरिया और फफूंद से बने उत्पाद किसानों के बीच लोकप्रिय हो रहे हैं।
ये उत्पाद उर्वरकों की प्रभावशीलता बढ़ाकर कम मात्रा में अधिक उत्पादन हासिल करने में मदद कर सकते हैं।
किसानों और उद्योग दोनों को होगा फायदा
यदि सरकार प्रस्तावित सुधार लागू करती है तो गैर-सब्सिडी वाले आधुनिक उर्वरकों की मंजूरी प्रक्रिया काफी तेज हो सकती है। इससे कंपनियों को नई तकनीक वाले उत्पाद तेजी से बाजार में लाने का अवसर मिलेगा।
दूसरी ओर किसानों को भी अधिक विकल्प मिलेंगे और वे अपनी फसल, मिट्टी और सिंचाई व्यवस्था के अनुसार बेहतर उत्पाद चुन सकेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की खेती केवल अधिक उर्वरक डालने पर नहीं, बल्कि हर यूनिट पोषक तत्व से अधिक उत्पादन प्राप्त करने पर आधारित होगी। बढ़ती वैश्विक कीमतों, पर्यावरणीय चुनौतियों और सरकारी सब्सिडी बोझ को देखते हुए भारत के लिए यही रास्ता सबसे व्यावहारिक और टिकाऊ माना जा रहा है।
नई नीति यदि सही तरीके से लागू होती है तो यह भारतीय उर्वरक उद्योग में एक बड़े बदलाव की शुरुआत साबित हो सकती है, जहां फोकस केवल सब्सिडी पर नहीं बल्कि दक्षता, नवाचार और टिकाऊ कृषि पर होगा।

