सतत कृषि और बेहतर उत्पादन के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए भाकृअनुप-भारतीय मक्का अनुसंधान संस्थान (IIMR), लुधियाना ने संतुलित उर्वरक उपयोग पर एक दिवसीय प्रशिक्षण-सह-परस्पर संवादात्मक कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यक्रम भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के संदेश “कम उर्वरक, वैज्ञानिक उपयोग, बेहतर कल” के अनुरूप आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच पोषक तत्व प्रबंधन के प्रति जागरूकता को मजबूत करना रहा।
कार्यशाला में देशभर से आए वैज्ञानिकों, परियोजना कर्मियों और कृषि विशेषज्ञों को संतुलित उर्वरीकरण एवं समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के सिद्धांतों, अवधारणाओं और व्यावहारिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि यदि वैज्ञानिक तरीके से उर्वरकों का उपयोग किया जाए, तो कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सकता है, साथ ही मृदा स्वास्थ्य भी सुधरता है।
संस्थान के निदेशक डॉ. हनुमान सहाय जाट ने अपने संबोधन में कहा कि मृदा स्वास्थ्य सुधारना और उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि आगामी खरीफ सीजन से पहले “संतुलित उर्वरक उपयोग पर सघन अभियान” चलाया जाएगा, जिसे देश के 100 से अधिक जिलों में लागू किया जाएगा। इस अभियान का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक तरीके से पोषक तत्वों के उपयोग के लिए प्रेरित करना और उनकी आय में वृद्धि करना है।
पंजाब राज्य में यह अभियान विशेष रूप से मोगा, संगरूर, पटियाला, लुधियाना और तरन-तारन जिलों में लागू किया जाएगा। इसके अलावा “मेरा गांव मेरा गौरव” कार्यक्रम के तहत गोद लिए गए गांवों में भी इस पहल को विस्तार दिया जाएगा, जिससे किसानों के साथ सीधा संवाद स्थापित कर उनकी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
कार्यशाला में बताया गया कि समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (INM) अपनाने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है। इसके अंतर्गत मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग, जैव उर्वरकों और कार्बनिक स्रोतों का प्रयोग, हरी खाद को बढ़ावा, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण और अप्रयुक्त पोषक भंडार का उपयोग जैसे उपाय शामिल हैं।
विशेषज्ञों ने किसानों को आधुनिक तकनीकों और उपकरणों के उपयोग के लिए भी प्रेरित किया। इसमें लीफ कलर चार्ट (LCC), ग्रीन सीकर, साइट-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन (SSNM) और निर्णय सहायता प्रणाली जैसे उपयोगकर्ता-अनुकूल टूल्स को अपनाने पर जोर दिया गया। इन तकनीकों के माध्यम से किसान अपनी फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार उर्वरकों का सही मात्रा में उपयोग कर सकते हैं, जिससे उत्पादन लागत घटती है और पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहता है।
कार्यक्रम के दौरान डॉ. जगदीप सिंह और डॉ. मनप्रीत ने विभिन्न विषयों पर व्याख्यान दिए। उन्होंने मृदा परीक्षण की आवश्यकता, पोषक तत्वों की कमी की पहचान, फसल-विशिष्ट उर्वरक अनुशंसाएं और किसानों तक प्रभावी संचार रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार वैज्ञानिक जानकारी को सरल भाषा में किसानों तक पहुंचाकर उन्हें आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
इस कार्यशाला में 90 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें संस्थान के वैज्ञानिक, अखिल भारतीय समन्वित मक्का अनुसंधान परियोजना (AICRP) से जुड़े कर्मचारी तथा “एथेनॉल उद्योगों के कैचमेंट क्षेत्रों में मक्का उत्पादन संवर्धन” परियोजना से जुड़े देशभर के कार्मिक शामिल थे।
कार्यक्रम के अंत में विशेषज्ञों ने यह निष्कर्ष निकाला कि संतुलित उर्वरक उपयोग और समेकित पोषक तत्व प्रबंधन को अपनाकर न केवल कृषि उत्पादन में स्थिरता लाई जा सकती है, बल्कि किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। यह पहल देश में टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

