वैश्विक उर्वरक बाजार में लगातार बदलते हालात के बीच भारत में NPK खाद की आपूर्ति को बनाए रखने के लिए नाइट्रोफॉस्फेट आधारित उर्वरकों पर जोर बढ़ रहा है। सल्फर की बढ़ती लागत, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और चीन से फॉस्फेट उर्वरकों के निर्यात को लेकर बनी अनिश्चितता ने भारतीय उर्वरक कंपनियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में कंपनियां DAP पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग पोषक तत्वों और उत्पादन प्रक्रियाओं के विकल्पों पर ध्यान दे रही हैं।
भारत में NPK खाद किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश तीनों प्रमुख पोषक तत्व एक साथ मिलते हैं। फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार अलग-अलग ग्रेड के NPK उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है। सरकार भी संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देती रही है, ताकि किसान केवल यूरिया पर निर्भर न रहें और मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बना रहे।
चीन के निर्यात प्रतिबंध का असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन की भूमिका फॉस्फेट उर्वरकों के मामले में काफी महत्वपूर्ण है। चीन से DAP और MAP के निर्यात को लेकर 2026 में लगातार अनिश्चितता बनी हुई है। S&P Global की 2 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चीन से DAP और MAP के निर्यात पर प्रतिबंध आगे भी बढ़ सकता है और बाजार में यह स्पष्टता नहीं थी कि निर्यात सामान्य रूप से कब शुरू होगा। रिपोर्ट में सल्फर की लागत और घरेलू भंडारण जरूरतों को भी निर्यात में देरी की वजहों में शामिल किया गया है।
इस स्थिति का असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर पड़ता है। भारत को अपनी घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए फॉस्फेट उर्वरकों और उनके कच्चे माल का आयात करना पड़ता है। यदि किसी बड़े निर्यातक देश से आपूर्ति सीमित होती है, तो कंपनियों को दूसरे देशों से खरीद बढ़ानी पड़ती है या वैकल्पिक उत्पादन व्यवस्था अपनानी पड़ती है।
यही कारण है कि NPK उत्पादन के लिए नाइट्रोफॉस्फेट सहित दूसरे विकल्पों पर चर्चा और रुचि बढ़ रही है।
महंगे सल्फर ने बढ़ाई चुनौती
फॉस्फेट उर्वरक उत्पादन में सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सल्फर की कीमत बढ़ने से फॉस्फोरिक एसिड और उससे जुड़े उर्वरकों की उत्पादन लागत पर दबाव आता है। भारत में उर्वरक उद्योग को कच्चे माल की वैश्विक कीमतों के साथ-साथ समुद्री परिवहन और बीमा लागत में बदलाव का भी सामना करना पड़ रहा है।
भारत सरकार ने जुलाई 2026 में बताया था कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण उर्वरक और कच्चे माल की वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई। इससे माल ढुलाई और बीमा लागत बढ़ी, शिपमेंट में देरी हुई और कीमतों में अस्थिरता आई। सरकार के अनुसार अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर की आयात व्यवस्था भी प्रभावित हुई थी।
ऐसे माहौल में कंपनियों के लिए ऐसी उत्पादन तकनीक और कच्चे माल के संयोजन तलाशना जरूरी हो जाता है, जिससे NPK की उपलब्धता बनी रहे और लागत को नियंत्रित किया जा सके।
क्या है नाइट्रोफॉस्फेट?
नाइट्रोफॉस्फेट एक प्रकार का जटिल उर्वरक है, जिसमें नाइट्रोजन और फास्फोरस को एक ही उर्वरक में उपलब्ध कराया जाता है। इसमें पोटाश को भी शामिल करके NPK ग्रेड तैयार किए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य किसानों को एक ही उत्पाद के माध्यम से एक से अधिक प्रमुख पोषक तत्व उपलब्ध कराना है।
भारत में अलग-अलग फसलों और क्षेत्रों की जरूरत के अनुसार NPK के कई ग्रेड इस्तेमाल किए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर 10-26-26, 12-32-16, 14-35-14, 14-28-14, 15-15-15 और 19-19-19 जैसे NPK ग्रेड बाजार में पाए जाते हैं। सरकारी निर्यात नीति में भी नाइट्रोफॉस्फेट विद पोटाश सहित कई NPK कॉम्प्लेक्स उर्वरक ग्रेड सूचीबद्ध हैं।
इसलिए नाइट्रोफॉस्फेट आधारित उत्पादन व्यवस्था को केवल DAP के विकल्प के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसका महत्व व्यापक NPK सप्लाई चेन में है, जहां कंपनियां अलग-अलग पोषक तत्वों को मिलाकर किसानों की जरूरत के मुताबिक ग्रेड तैयार कर सकती हैं।
भारत में NPK की उपलब्धता फिलहाल मजबूत
वैश्विक बाजार में चुनौतियों के बावजूद भारत में NPK की उपलब्धता को लेकर सरकार ने पर्याप्त स्थिति बताई है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार 19 जुलाई 2026 तक खरीफ सीजन में NPKS की आवश्यकता 48.48 लाख टन थी, जबकि उपलब्धता 84.57 लाख टन रही। इस अवधि में 39.36 लाख टन NPKS की बिक्री हुई और 45.21 लाख टन का स्टॉक बचा था।
इससे पता चलता है कि फिलहाल देश में NPK की आपूर्ति को लेकर बड़ा संकट नहीं है। हालांकि वैश्विक बाजार में कच्चे माल और परिवहन की स्थिति लगातार बदल रही है, इसलिए कंपनियां आगे की जरूरत को देखते हुए वैकल्पिक सप्लाई और उत्पादन रणनीति पर काम कर रही हैं।
जुलाई की एक अन्य सरकारी जानकारी के अनुसार अप्रैल से जून 2026 के बीच देश में NPK का घरेलू उत्पादन 20.77 लाख टन रहा। इसी अवधि में SSP का उत्पादन 13.50 लाख टन रहा।
DAP पर निर्भरता घटाने की कोशिश
भारत में DAP की मांग काफी अधिक है। लेकिन वैश्विक बाजार में DAP की कीमत और उपलब्धता कई बाहरी कारकों पर निर्भर करती है। चीन के निर्यात प्रतिबंध, पश्चिम एशिया में तनाव, सल्फर की कीमत और समुद्री परिवहन की स्थिति जैसे कारक DAP की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई को प्रभावित कर सकते हैं।
ऐसे में NPK उत्पादन को मजबूत करना कंपनियों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि किसान की फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार उपयुक्त NPK ग्रेड उपलब्ध कराया जाता है, तो हर स्थिति में DAP पर निर्भरता कम की जा सकती है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि DAP की जगह हर स्थिति में NPK इस्तेमाल किया जा सकता है। दोनों उर्वरकों में पोषक तत्वों की मात्रा और अनुपात अलग-अलग होते हैं। किसानों को फसल और मिट्टी की जांच के आधार पर ही उर्वरक का चयन करना चाहिए।
सरकार का जोर संतुलित उर्वरक उपयोग पर
भारत सरकार लंबे समय से संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा दे रही है। इसका एक कारण यह है कि कई क्षेत्रों में नाइट्रोजन वाले उर्वरकों, खासकर यूरिया, का इस्तेमाल जरूरत से अधिक किया जाता है। दूसरी तरफ फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्वों की जरूरत भी फसल के अनुसार बनी रहती है।
NPK उर्वरक इसी संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प है। अलग-अलग अनुपात वाले NPK ग्रेड के जरिए फसल की जरूरत के मुताबिक पोषक तत्व उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
P&K उर्वरकों पर सरकार Nutrient Based Subsidy यानी NBS व्यवस्था लागू करती है। इसके तहत कंपनियों को बाजार की जरूरत और कारोबारी परिस्थितियों के अनुसार आयात तथा उत्पादन करने की सुविधा मिलती है। सरकार ने जुलाई 2026 में भी कहा था कि P&K उर्वरकों को Open General License व्यवस्था के तहत रखा गया है, जिससे कंपनियां अपनी जरूरत के अनुसार आयात और उत्पादन कर सकती हैं।
आगे बढ़ सकती है वैकल्पिक खरीद
भारत के लिए आने वाले समय में केवल एक देश या एक उर्वरक पर निर्भर रहना जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए सरकार और कंपनियां आपूर्ति स्रोतों में विविधता लाने पर ध्यान दे रही हैं।
सरकार ने भारत की उर्वरक आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए लंबे समय के समझौते भी किए हैं। मार्च 2026 में सरकार ने बताया था कि भारतीय कंपनियों और सऊदी अरब की Ma’aden के बीच पांच साल के लिए हर साल 31 लाख टन DAP/NPK की आपूर्ति का दीर्घकालिक समझौता किया गया है। यह व्यवस्था 2025-26 से 2029-30 तक के लिए है।
ऐसे समझौते भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक आने वाले संकट से बचाने में मदद कर सकते हैं। साथ ही अलग-अलग देशों से खरीद बढ़ाने से किसी एक स्रोत पर निर्भरता भी कम होती है।
किसानों के लिए क्या मायने रखता है?
नाइट्रोफॉस्फेट और NPK उत्पादन पर बढ़ता जोर अंततः किसानों के लिए उर्वरक की उपलब्धता बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है। यदि वैश्विक स्तर पर DAP की सप्लाई प्रभावित होती है, तो कंपनियां NPK के अलग-अलग ग्रेड की उपलब्धता बढ़ाकर किसानों की जरूरत पूरी करने की कोशिश कर सकती हैं।
लेकिन किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी उर्वरक को केवल बाजार में उपलब्धता के आधार पर न चुना जाए। मिट्टी की जांच, फसल की जरूरत और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही NPK, DAP, SSP या अन्य उर्वरक का इस्तेमाल करना अधिक प्रभावी रहेगा।
निष्कर्ष
वैश्विक उर्वरक बाजार में चीन के फॉस्फेट उर्वरक निर्यात को लेकर अनिश्चितता और सल्फर की ऊंची लागत ने भारत के लिए सप्लाई रणनीति को और महत्वपूर्ण बना दिया है। ऐसे समय में NPK उत्पादन के लिए नाइट्रोफॉस्फेट आधारित विकल्पों पर ध्यान बढ़ना उर्वरक उद्योग की बदलती रणनीति का संकेत है।
भारत फिलहाल NPK की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने में सफल रहा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कच्चे माल और समुद्री परिवहन की स्थिति पर नजर रखना जरूरी है। आगे चलकर DAP, NPK, SSP और दूसरे फॉस्फेट उर्वरकों के बीच संतुलित आपूर्ति व्यवस्था भारत की खाद सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होगी।
कुल मिलाकर, नाइट्रोफॉस्फेट पर बढ़ता जोर केवल एक उत्पादन विकल्प नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक उर्वरक बाजार में भारत की सप्लाई को अधिक लचीला बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

