भारत ने वैश्विक बाजार से DAP यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट की खरीद बढ़ाने की दिशा में अपनी रणनीति तेज कर दी है। 10 सितंबर के आसपास सामने आई उद्योग जगत की रिपोर्टों के मुताबिक, वैश्विक फॉस्फेट उर्वरक बाजार में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ने के बीच भारत अपनी जरूरतों को सुरक्षित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में सक्रिय बना हुआ है। चीन से फॉस्फेट उर्वरकों के निर्यात को लेकर बनी अनिश्चितता और सल्फर तथा सल्फ्यूरिक एसिड की ऊंची लागत ने DAP और NPK की वैश्विक सप्लाई को और जटिल बना दिया है।
भारत के लिए यह मुद्दा केवल आयात और कीमत का नहीं है। DAP देश की कृषि व्यवस्था में महत्वपूर्ण फॉस्फोरस उर्वरक है और इसकी उपलब्धता रबी तथा खरीफ दोनों मौसमों में किसानों की फसल लागत और उत्पादन पर असर डालती है। इसलिए सरकार और उर्वरक कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों को पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध कराई जाए और घरेलू खुदरा कीमतों पर इसका सीधा बोझ न पड़े।
वैश्विक बाजार में इस समय कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं। एक तरफ चीन के फॉस्फेट उर्वरक निर्यात पर प्रतिबंध और अनिश्चितता है, दूसरी तरफ सल्फर की कीमतों तथा उपलब्धता पर दबाव है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव ने समुद्री परिवहन और कच्चे माल की सप्लाई को भी प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में भारत के लिए केवल एक या दो देशों पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
भारत पहले ही रूस, मोरक्को और अन्य देशों के साथ उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने के लिए बातचीत कर चुका है। मार्च 2026 में Reuters ने रिपोर्ट किया था कि भारत ने रूस, बेलारूस, मोरक्को और संभावित रूप से इंडोनेशिया से उर्वरक आयात बढ़ाने के विकल्पों पर बातचीत की थी। उस समय सरकार का उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति में संभावित कमी से पहले घरेलू स्टॉक को सुरक्षित करना था। (Reuters)
अब सितंबर में DAP की वैश्विक खरीद को लेकर भारत की सक्रियता इस व्यापक रणनीति का अगला चरण मानी जा सकती है।
DAP भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
DAP का पूरा नाम डाय-अमोनियम फॉस्फेट है। इसका सामान्य ग्रेड 18:46:0 होता है। इसका अर्थ है कि इसमें 18 प्रतिशत नाइट्रोजन और 46 प्रतिशत फॉस्फोरस पेंटाऑक्साइड के बराबर पोषक तत्व होता है। पोटाश इसमें नहीं होता।
फॉस्फोरस पौधों की जड़ विकास, शुरुआती वृद्धि, ऊर्जा हस्तांतरण और फूल तथा दाना बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि गेहूं, धान, मक्का, दलहन, तिलहन और कई अन्य फसलों में DAP की मांग बनी रहती है।
भारत में किसानों की DAP पर निर्भरता का एक बड़ा कारण इसकी पोषक संरचना है। एक ही खाद से नाइट्रोजन और फॉस्फोरस दोनों की आपूर्ति हो जाती है। हालांकि कृषि विशेषज्ञ लगातार संतुलित पोषण और मिट्टी परीक्षण आधारित उर्वरक उपयोग पर जोर देते हैं, फिर भी DAP भारतीय बाजार में एक प्रमुख फॉस्फेट उर्वरक बना हुआ है।
यही वजह है कि DAP की अंतरराष्ट्रीय कीमत या उपलब्धता में किसी भी बड़े बदलाव का असर भारतीय कृषि बाजार पर पड़ सकता है।
भारत घरेलू स्तर पर कुछ फॉस्फेट उर्वरक बनाता है, लेकिन इसके लिए कई महत्वपूर्ण कच्चे माल और इंटरमीडिएट उत्पादों की विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता रहती है। फॉस्फेट रॉक, फॉस्फोरिक एसिड, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड जैसे इनपुट की वैश्विक उपलब्धता इसलिए भारत की खाद सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
चीन की भूमिका ने बाजार को क्यों प्रभावित किया?
चीन दुनिया के बड़े फॉस्फेट उर्वरक उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है। इसलिए जब चीन अपने निर्यात को सीमित करता है या निर्यात नीति को कड़ा करता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध माल की मात्रा पर असर पड़ता है।
सितंबर की शुरुआत में S&P Global ने भी रिपोर्ट किया था कि चीन से DAP और MAP निर्यात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। रिपोर्ट में निर्यात प्रतिबंध बढ़ने की संभावना, सल्फर लागत और घरेलू विंटर स्टोरेज की जरूरत जैसे कारकों को बाजार की चिंता बताया गया था। (S&P Global)
इसका मतलब यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खरीदारों को उपलब्ध माल के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा करनी पड़ सकती है।
भारत के लिए समस्या इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि वह दुनिया के बड़े उर्वरक आयातकों में शामिल है। यदि चीन से निर्यात कम रहता है, तो भारत को दूसरे देशों से अधिक मात्रा में माल खरीदना पड़ सकता है।
यही कारण है कि भारत की आयात रणनीति में विविधता बढ़ाना महत्वपूर्ण हो गया है।
भारत केवल चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहता
भारत की उर्वरक आयात नीति पिछले कुछ समय से एक ही दिशा में आगे बढ़ रही है—आपूर्ति के स्रोतों में विविधता।
मार्च में सामने आई जानकारी के अनुसार भारत रूस, बेलारूस, मोरक्को और संभावित रूप से इंडोनेशिया जैसे देशों से उर्वरक खरीद के विकल्प तलाश रहा था। Reuters के मुताबिक भारत का उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति में संभावित व्यवधानों के बीच अतिरिक्त स्रोत तैयार करना था। (Reuters)
यह रणनीति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि DAP बाजार में कुछ प्रमुख उत्पादक देशों की भूमिका बहुत बड़ी है।
यदि किसी एक देश से निर्यात कम होता है तो दूसरे देशों से खरीद बढ़ाना जरूरी हो जाता है। लेकिन अचानक बड़ी मात्रा में खरीद करने पर कीमत भी बढ़ सकती है।
इसलिए भारत के लिए चुनौती दोहरी है।
पहली चुनौती है पर्याप्त मात्रा में DAP खरीदना।
दूसरी चुनौती है इसे ऐसी कीमत पर खरीदना जिससे सरकार के सब्सिडी बजट पर अत्यधिक दबाव न पड़े।
सल्फर की कीमत क्यों बन रही है बड़ी चिंता?
DAP की कहानी केवल फॉस्फेट रॉक तक सीमित नहीं है। इसमें सल्फर की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है।
फॉस्फेट उर्वरक उत्पादन में सल्फ्यूरिक एसिड का उपयोग होता है और सल्फ्यूरिक एसिड उत्पादन के लिए सल्फर एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसलिए जब सल्फर की उपलब्धता घटती है या इसकी कीमत बढ़ती है तो फॉस्फेट उर्वरक उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है।
2026 में चीन द्वारा सल्फ्यूरिक एसिड के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने इस बाजार को और जटिल बनाया है। उद्योग रिपोर्टों के अनुसार चीन के कदम से वैश्विक सल्फ्यूरिक एसिड बाजार में दबाव बढ़ा है। ECHEMI की रिपोर्ट में कहा गया कि चीन से सल्फ्यूरिक एसिड निर्यात पर मई 2026 से व्यापक प्रतिबंध की खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी। रिपोर्ट में फॉस्फेट उर्वरक उत्पादन को सल्फ्यूरिक एसिड की बड़ी मांग वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है। (ECHEMI)
इसका सीधा मतलब यह है कि DAP की कीमत केवल DAP के बाजार से तय नहीं होती। इसके पीछे कच्चे माल की पूरी वैश्विक श्रृंखला काम करती है।
पश्चिम एशिया का संकट और उर्वरक बाजार
2026 में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव ने उर्वरक बाजार के सामने एक और चुनौती पैदा कर दी।
सल्फर और दूसरे औद्योगिक कच्चे माल की वैश्विक सप्लाई में खाड़ी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। Hormuz Strait के आसपास किसी भी लंबे समय तक चलने वाले व्यवधान से समुद्री परिवहन लागत बढ़ सकती है और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।
भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम एशिया उसके उर्वरक आयात का प्रमुख स्रोत है।
Reuters की मार्च की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य पूर्व भारत के DAP और यूरिया आयात का लगभग आधा हिस्सा उपलब्ध कराता है और सऊदी अरब भारत के प्रमुख DAP आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। (Reuters)
इसलिए पश्चिम एशिया में कोई भी बड़ा परिवहन व्यवधान भारत के लिए सिर्फ ऊर्जा आयात की समस्या नहीं है। इसका असर खाद की सप्लाई पर भी पड़ सकता है।
सऊदी अरब का महत्व
भारत के DAP आयात में सऊदी अरब की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सऊदी अरब में बड़े पैमाने पर फॉस्फेट और उर्वरक उद्योग विकसित हुआ है। वहां से भारत को DAP और अन्य उर्वरक उत्पादों की आपूर्ति होती रही है।
इस वजह से भारत की वैश्विक खरीद रणनीति में खाड़ी क्षेत्र की भूमिका बनी रहेगी।
हालांकि केवल एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है। यही कारण है कि भारत मोरक्को, रूस और अन्य संभावित आपूर्तिकर्ताओं से भी संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
मोरक्को क्यों महत्वपूर्ण है?
मोरक्को दुनिया के प्रमुख फॉस्फेट संसाधन वाले देशों में है। उसके पास फॉस्फेट रॉक का बड़ा आधार है और उसने फॉस्फेट आधारित उर्वरक उद्योग में मजबूत वैश्विक स्थिति बनाई है।
भारत और मोरक्को के बीच उर्वरक क्षेत्र में पहले से व्यापारिक संबंध हैं।
भारत के लिए मोरक्को से DAP और फॉस्फेट आधारित उत्पादों की खरीद का एक फायदा यह है कि इससे आपूर्ति स्रोतों में विविधता आती है।
अगर चीन से सप्लाई सीमित रहती है और खाड़ी क्षेत्र में लॉजिस्टिक समस्या बनी रहती है, तो मोरक्को जैसे उत्पादक देशों की भूमिका और बढ़ सकती है।
रूस भी संभावित आपूर्तिकर्ता
भारत ने रूस से भी उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने के विकल्पों पर विचार किया है।
Reuters के अनुसार मार्च में भारत रूस और बेलारूस से उर्वरक आयात बढ़ाने के लिए बातचीत कर रहा था। (Reuters)
रूस पहले से ही वैश्विक उर्वरक बाजार का बड़ा खिलाड़ी है। हालांकि विभिन्न उर्वरकों की आपूर्ति, व्यापार मार्ग, प्रतिबंध और भुगतान व्यवस्था अलग-अलग होती है, फिर भी भारत के लिए रूस एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक स्रोत बना हुआ है।
भारत की मौजूदा रणनीति में यही विविधता सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है।
भारत की खरीद बढ़ने का वैश्विक बाजार पर क्या असर?
जब भारत जैसा बड़ा खरीदार अंतरराष्ट्रीय बाजार में खरीद बढ़ाता है तो इसका असर केवल भारत तक सीमित नहीं रहता।
भारत की बड़ी खरीद से वैश्विक DAP उपलब्धता पर दबाव पड़ सकता है। यदि उसी समय चीन से निर्यात कम हो और दूसरे देशों की मांग भी बढ़ रही हो तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है।
IFPRI के विश्लेषण में भी DAP बाजार पर निर्यात प्रतिबंधों के प्रभाव को लेकर विभिन्न परिदृश्यों का आकलन किया गया है। उसके अनुसार चीन से DAP निर्यात में कमी वैश्विक कीमतों को बढ़ा सकती है; एक गंभीर प्रतिबंध वाले परिदृश्य में DAP कीमतों पर उल्लेखनीय बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया था। (IFPRI)
इसका मतलब यह है कि भारत की खरीद रणनीति बाजार को स्थिर करने में मदद कर सकती है, लेकिन बड़ी मात्रा में खरीद अंतरराष्ट्रीय कीमतों को ऊपर भी ले जा सकती है।
भारत के लिए खरीद का सही समय क्यों महत्वपूर्ण है?
उर्वरक बाजार में समय बहुत महत्वपूर्ण होता है।
यदि किसी देश को पता है कि आगे चलकर आपूर्ति कम हो सकती है तो वह पहले ही खरीद शुरू कर देता है।
इसे स्टॉक बिल्डिंग कहा जा सकता है।
भारत भी इसी तरह की रणनीति पर काम करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत या उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता होती है तो सरकार और कंपनियां पहले से माल सुरक्षित करने की कोशिश करती हैं।
इससे दो फायदे होते हैं।
पहला, घरेलू बाजार में अचानक कमी की संभावना घटती है।
दूसरा, भविष्य में कीमत बहुत अधिक बढ़ने पर भी पहले खरीदा गया माल कुछ सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
भारत में DAP की कीमत और किसानों पर असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP महंगा होने का मतलब यह नहीं है कि किसान को उसी अनुपात में महंगा DAP मिलेगा।
भारत में उर्वरक क्षेत्र पर सरकार की मजबूत भूमिका है। DAP समेत फॉस्फेट उर्वरकों के मामले में सरकार सब्सिडी के जरिए किसानों पर कीमत का असर सीमित करने की कोशिश करती है।
अप्रैल 2026 में सरकार ने बढ़ती वैश्विक उर्वरक कीमतों के बीच Nutrient-Based Subsidy बढ़ाई थी। Reuters के अनुसार उस समय सरकार ने 50 किलोग्राम DAP बैग की कीमत 1,350 रुपये के आसपास बनाए रखने का लक्ष्य रखा था। (Reuters)
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय DAP कीमत और भारतीय किसान द्वारा चुकाई जाने वाली खुदरा कीमत में सीधा संबंध नहीं होता।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने का असर सरकार के सब्सिडी खर्च पर पड़ सकता है।
सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है
अगर आयातित DAP महंगा हो जाता है और सरकार किसान के लिए खुदरा कीमत नियंत्रित रखना चाहती है तो अंतर को किसी न किसी तरीके से पूरा करना पड़ता है।
यहां सब्सिडी की भूमिका आती है।
अगर वैश्विक कीमत लगातार ऊंची रहती है तो सरकार को अधिक सब्सिडी देनी पड़ सकती है।
अप्रैल में सरकार ने फॉस्फेट और अन्य पोषक तत्व आधारित उर्वरकों के लिए 415.34 अरब रुपये के NBS पैकेज को मंजूरी दी थी। Reuters ने इसे पिछले साल की तुलना में 11.6 प्रतिशत अधिक बताया था। (Reuters)
इससे स्पष्ट है कि वैश्विक कीमतों का असर अंततः सरकारी वित्त पर भी पड़ता है।
NPK बाजार पर भी पड़ेगा असर
DAP के साथ NPK उर्वरकों पर भी इस संकट का असर पड़ सकता है।
NPK यानी नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरक हैं। इनमें फॉस्फोरस घटक की कीमत बढ़ने पर उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा सल्फर और फॉस्फोरिक एसिड की लागत बढ़ने से फॉस्फेट आधारित कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की लागत पर भी दबाव आ सकता है।
भारत में किसान अलग-अलग फसलों के लिए DAP के साथ 10:26:26, 12:32:16 और दूसरे NPK ग्रेड का उपयोग करते हैं।
इसलिए DAP की वैश्विक कीमत में बदलाव केवल एक उत्पाद की कीमत का मामला नहीं है। इसका असर पूरे फॉस्फेट और कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर बाजार पर पड़ सकता है।
भारत की घरेलू उत्पादन क्षमता कितनी मदद करेगी?
भारत ने पिछले वर्षों में घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं।
यूरिया में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए नए संयंत्र और क्षमता विस्तार किए गए हैं। लेकिन DAP और फॉस्फेट उर्वरकों का मामला अलग है।
फॉस्फेट उर्वरक उत्पादन के लिए पर्याप्त मात्रा में फॉस्फेट रॉक और दूसरे कच्चे माल की जरूरत होती है। भारत के पास घरेलू संसाधन सीमित होने के कारण आयात आवश्यक बना रहता है।
यही वजह है कि भारत ने विदेशों में संयुक्त उपक्रम और दीर्घकालिक समझौतों की दिशा में भी काम किया है।
भारत की दीर्घकालिक रणनीति
भारत के लिए केवल स्पॉट मार्केट से DAP खरीदना पर्याप्त समाधान नहीं है।
दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए कई स्तरों पर काम करना जरूरी है।
पहला है अलग-अलग देशों से आयात।
दूसरा है दीर्घकालिक समझौते।
तीसरा है विदेशों में संयुक्त निवेश।
चौथा है घरेलू उत्पादन और कच्चे माल की सुरक्षा।
पांचवां है किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रोत्साहित करना।
जुलाई 2026 में सामने आई रिपोर्ट के अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत ने 32 लाख टन से अधिक प्रमुख उर्वरकों का आयात किया था। सरकार दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय समझौतों के जरिए आपूर्ति स्रोतों को मजबूत करने पर भी काम कर रही है। (The Times of India)
इससे साफ है कि आयात भारत की उर्वरक रणनीति का अस्थायी नहीं बल्कि महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
सिर्फ ज्यादा DAP खरीदना समाधान नहीं
भारत के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या केवल DAP की खरीद बढ़ाने से समस्या हल हो जाएगी?
जवाब है—पूरी तरह नहीं।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP महंगा है, तो बड़ी मात्रा में खरीद करने पर भारत का आयात बिल बढ़ेगा।
यदि भारत खरीद कम करता है तो घरेलू उपलब्धता पर खतरा हो सकता है।
इसलिए सरकार को कीमत और मात्रा के बीच संतुलन बनाना होगा।
यही वजह है कि अलग-अलग देशों से खरीद, लंबी अवधि के अनुबंध और समय पर स्टॉक बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
यूरिया और DAP की स्थिति अलग है
भारत में उर्वरक चर्चा अक्सर यूरिया और DAP को एक साथ लेकर की जाती है, लेकिन दोनों की वैश्विक बाजार संरचना अलग है।
यूरिया के लिए प्राकृतिक गैस सबसे महत्वपूर्ण लागत कारकों में से एक है।
DAP के लिए फॉस्फेट रॉक, सल्फर, सल्फ्यूरिक एसिड और अमोनिया जैसे कच्चे माल महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए पश्चिम एशिया में गैस संकट यूरिया को ज्यादा प्रभावित कर सकता है, जबकि सल्फर और फॉस्फेट आपूर्ति का संकट DAP को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि दोनों बाजार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं क्योंकि अमोनिया और ऊर्जा लागत दोनों में भूमिका निभाते हैं।
भारत के लिए सल्फर सप्लाई सुरक्षित करना जरूरी
DAP की खरीद बढ़ाने के साथ भारत को सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड की उपलब्धता पर भी नजर रखनी होगी।
अगर DAP उत्पादन के लिए पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध नहीं होगा तो केवल फॉस्फेट रॉक खरीदना पर्याप्त नहीं होगा।
इसलिए भारत की उर्वरक सुरक्षा रणनीति को अब केवल तैयार खाद की खरीद तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
कच्चे माल की पूरी श्रृंखला को सुरक्षित करना होगा।
इसमें सल्फर, फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया और फॉस्फेट रॉक शामिल हैं।
चीन के निर्यात प्रतिबंध से भारत को क्या सीख मिलती है?
चीन की निर्यात नीति में बदलाव ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है।
किसी भी देश की खाद सुरक्षा के लिए वैश्विक बाजार पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है।
यदि कोई बड़ा निर्यातक अपने घरेलू बाजार को प्राथमिकता देता है तो अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को अचानक दूसरे स्रोत तलाशने पड़ते हैं।
भारत ने इसी जोखिम को कम करने के लिए आयात स्रोतों में विविधता बढ़ाने की कोशिश की है।
मोरक्को, सऊदी अरब, रूस, जॉर्डन और अन्य उत्पादक देशों के साथ संबंध इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी
अगर चीन की DAP उपलब्धता सीमित रहती है तो भारत अकेला खरीदार नहीं होगा।
दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य कृषि अर्थव्यवस्थाएं भी फॉस्फेट उर्वरक खरीदती हैं।
इससे उपलब्ध कार्गो के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
भारत के पास एक फायदा है कि उसका बाजार बड़ा है और सरकार तथा उर्वरक कंपनियां बड़े पैमाने पर खरीद कर सकती हैं।
लेकिन यही बड़ी मांग कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर अतिरिक्त दबाव भी डाल सकती है।
किसानों के लिए क्या मायने रखता है?
आम किसान के लिए वैश्विक DAP बाजार की खबर का सबसे महत्वपूर्ण मतलब है—क्या खेत तक समय पर खाद पहुंचेगी और किस कीमत पर पहुंचेगी?
अगर सरकार समय रहते पर्याप्त DAP खरीद लेती है और घरेलू स्टॉक मजबूत रहता है तो किसान को वैश्विक बाजार की उथल-पुथल का सीधा असर कम महसूस होगा।
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक कमी रहती है तो वितरण स्तर पर दबाव बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में राज्यवार स्टॉक, जिला स्तर पर उपलब्धता और बिक्री व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।
कालाबाजारी पर नियंत्रण जरूरी
जब किसी उर्वरक की उपलब्धता को लेकर बाजार में चिंता बढ़ती है तो कालाबाजारी और जमाखोरी का खतरा भी बढ़ जाता है।
DAP जैसे महत्वपूर्ण उर्वरक की कमी की अफवाह भी बाजार को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए केवल आयात करना पर्याप्त नहीं है।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आयातित खाद वास्तविक किसानों तक पहुंचे।
इसके लिए स्टॉक निगरानी, बिक्री रिकॉर्ड, डिजिटल ट्रैकिंग और निरीक्षण व्यवस्था महत्वपूर्ण है।
डिजिटल सिस्टम की भूमिका
भारत में उर्वरक बिक्री और वितरण को डिजिटल बनाने की दिशा में पहले से काम हो रहा है।
PoS मशीनों के जरिए बिक्री रिकॉर्ड की जाती है। इससे सरकार को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि किस क्षेत्र में कितनी खाद जा रही है।
भविष्य में डिजिटल कृषि रिकॉर्ड और भूमि संबंधी डेटा के साथ उर्वरक वितरण को जोड़ने से लक्षित वितरण और बेहतर हो सकता है।
हालांकि इसके साथ किसानों के लिए व्यवस्था को सरल रखना भी जरूरी है।
DAP की जगह NPK का इस्तेमाल बढ़ सकता है?
कुछ परिस्थितियों में किसान DAP के विकल्प के रूप में अलग-अलग NPK ग्रेड का उपयोग कर सकते हैं।
लेकिन यह निर्णय फसल, मिट्टी और पोषक तत्वों की आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए।
यदि मिट्टी में पोटाश की आवश्यकता है तो NPK बेहतर विकल्प हो सकता है।
यदि फसल और मिट्टी के अनुसार मुख्य आवश्यकता फॉस्फोरस की है तो DAP या अन्य फॉस्फेट स्रोत का उपयोग किया जा सकता है।
इसलिए DAP की कमी की स्थिति में किसानों को बिना सलाह के किसी भी खाद को दूसरे की जगह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
संतुलित उर्वरक उपयोग की जरूरत
भारत में लंबे समय से संतुलित उर्वरक उपयोग की बात की जा रही है।
कई क्षेत्रों में किसान नाइट्रोजन आधारित यूरिया का अपेक्षाकृत अधिक उपयोग करते हैं।
वहीं फॉस्फोरस और पोटाश का उपयोग फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार होना चाहिए।
मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद देने से किसानों की लागत कम हो सकती है और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग हो सकता है।
DAP की वैश्विक कीमत बढ़ने की स्थिति में यह सलाह और महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत को दीर्घकालिक समझौतों पर जोर देना होगा
स्पॉट मार्केट में हर बार बड़ी मात्रा में DAP खरीदना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
लंबी अवधि के समझौते भारत को आपूर्ति सुरक्षा दे सकते हैं।
ऐसे समझौतों में कीमत, मात्रा, डिलीवरी समय और आपूर्ति की प्राथमिकता तय की जा सकती है।
भारत पहले से कई देशों के साथ उर्वरक क्षेत्र में दीर्घकालिक संबंधों पर काम कर रहा है।
आने वाले समय में इस दिशा में और तेजी देखी जा सकती है।
विदेशों में निवेश भी एक विकल्प
भारत की बड़ी उर्वरक कंपनियां पहले से कुछ विदेशी परियोजनाओं में भागीदारी रखती हैं।
इस मॉडल को आगे बढ़ाया जा सकता है।
अगर भारतीय कंपनियां फॉस्फेट रॉक, फॉस्फोरिक एसिड या उर्वरक उत्पादन परियोजनाओं में विदेशों में निवेश करती हैं तो भारत को लंबी अवधि में सप्लाई सुरक्षा मिल सकती है।
इससे केवल बाजार से माल खरीदने की जगह उत्पादन श्रृंखला में भागीदारी बढ़ती है।
रणनीतिक उर्वरक भंडार की चर्चा
तेल के क्षेत्र में रणनीतिक भंडार की तरह उर्वरक के लिए भी पर्याप्त बफर स्टॉक रखना महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि उर्वरक भंडारण की अपनी तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां हैं।
फिर भी ऐसे समय में जब वैश्विक बाजार में अचानक निर्यात प्रतिबंध लग सकते हैं, भारत के लिए पर्याप्त शुरुआती स्टॉक एक सुरक्षा कवच का काम करता है।
जुलाई में सरकार ने बताया था कि भारत में DAP का स्टॉक पिछले साल की तुलना में काफी मजबूत था। मार्च में Reuters ने सरकारी आंकड़ों के हवाले से बताया था कि DAP इन्वेंटरी सालाना आधार पर 105 प्रतिशत अधिक थी। (Reuters)
इससे पता चलता है कि पहले से स्टॉक बनाना सरकार की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
Hormuz संकट का अप्रत्यक्ष असर
यदि समुद्री मार्ग में व्यवधान बढ़ता है तो केवल खाद की कीमत नहीं बढ़ेगी।
जहाजों का बीमा महंगा हो सकता है।
फ्रेट बढ़ सकता है।
डिलीवरी समय बढ़ सकता है।
और कार्गो के लिए वैकल्पिक मार्गों की जरूरत पड़ सकती है।
इन सभी लागतों का असर आयातित DAP की अंतिम लागत पर पड़ सकता है।
जुलाई में भारत सरकार ने बताया था कि यूरिया, DAP और सल्फर ले जाने वाले 15 भारत-bound जहाज Hormuz से सुरक्षित होकर भारत की ओर आ रहे थे। (The Times of India)
यह दिखाता है कि समुद्री मार्ग भारत की उर्वरक सुरक्षा में कितना महत्वपूर्ण है।
वैश्विक तेल कीमतों का भी असर
सितंबर 2026 में ऊर्जा बाजार में भी अस्थिरता देखी गई है। Reuters के अनुसार 10 सितंबर को Brent crude 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया था और WTI भी 100 डॉलर से ऊपर पहुंच गया। (Reuters)
ऊर्जा की कीमत बढ़ने से उर्वरक उत्पादन और समुद्री परिवहन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि DAP की कीमत केवल तेल से निर्धारित नहीं होती, लेकिन पूरी सप्लाई चेन की लागत पर ऊर्जा बाजार का असर रहता है।
भारत की खरीद बढ़ने से कंपनियों पर क्या असर?
भारतीय उर्वरक कंपनियों के लिए मौजूदा बाजार एक चुनौती और अवसर दोनों है।
चुनौती इसलिए क्योंकि कच्चे माल और तैयार DAP की लागत बढ़ सकती है।
अवसर इसलिए क्योंकि बड़े बाजार में नियमित मांग बनी हुई है।
लेकिन चूंकि उर्वरक क्षेत्र सरकार की सब्सिडी और कीमत व्यवस्था से गहराई से जुड़ा है, कंपनियों को केवल बाजार कीमत के आधार पर खुदरा कीमत तय करने की स्वतंत्रता नहीं होती।
इसलिए कंपनियों के लिए लागत प्रबंधन और समय पर खरीद ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत में उत्पादन और आयात का संतुलन
भारत की रणनीति को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है।
पहला—घरेलू उत्पादन बढ़ाना।
दूसरा—विदेशों से कच्चा माल लाना।
तीसरा—तैयार DAP और अन्य फॉस्फेट उर्वरक का आयात करना।
इन तीनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है लेकिन कच्चा माल नहीं मिलता तो उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं होगा।
यदि कच्चा माल उपलब्ध है लेकिन तैयार उत्पाद की मांग अचानक बढ़ जाती है तो आयात की जरूरत पड़ सकती है।
इसीलिए भारत की मौजूदा रणनीति मिश्रित मॉडल पर आधारित है।
2025-26 में आयात बढ़ने का संकेत
भारत की उर्वरक आयात निर्भरता पहले ही बढ़ी है।
जनवरी 2026 में Economic Times ने Fertiliser Association of India के शुरुआती आंकड़ों के हवाले से बताया था कि वित्त वर्ष 2025-26 के पहले नौ महीनों में भारत का यूरिया आयात 85 प्रतिशत, DAP आयात 46 प्रतिशत और NPK उर्वरक आयात 122 प्रतिशत बढ़ा था। (The Economic Times)
यह आंकड़ा बताता है कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी बाजार की भूमिका पहले से बढ़ रही थी।
अब 2026 में वैश्विक सप्लाई में नई चुनौतियां आने से आयात रणनीति और महत्वपूर्ण हो गई है।
क्या DAP की कमी हो सकती है?
इस समय केवल वैश्विक खरीद बढ़ने या चीन की नीति के आधार पर भारत में DAP की निश्चित कमी की घोषणा करना उचित नहीं होगा।
कमी का वास्तविक आकलन राज्यवार स्टॉक, आयातित जहाजों, घरेलू उत्पादन, वितरण और किसानों की मांग के आधार पर होता है।
सरकार कई बार स्पष्ट कर चुकी है कि पर्याप्त स्टॉक और आपूर्ति व्यवस्था के जरिए कमी से बचने की कोशिश की जा रही है।
इसलिए मौजूदा स्थिति को “वैश्विक आपूर्ति जोखिम” के रूप में देखना ज्यादा सही है, न कि पूरे भारत में तत्काल DAP संकट के रूप में।
सबसे बड़ा जोखिम क्या है?
भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम अचानक और लंबे समय तक चलने वाला वैश्विक सप्लाई शॉक है।
यदि एक साथ तीन स्थितियां बनती हैं—
चीन का निर्यात सीमित रहे,
सल्फर महंगा और कम उपलब्ध रहे,
और पश्चिम एशिया से समुद्री आपूर्ति बाधित हो—
तो DAP की वैश्विक कीमत और उपलब्धता दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में भारत को पहले से तैयार स्टॉक और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना होगा।
भारत के लिए अवसर भी मौजूद
मौजूदा संकट भारत के लिए एक अवसर भी है।
भारत यदि दीर्घकालिक समझौतों को बढ़ाता है, विदेशी उर्वरक परियोजनाओं में निवेश करता है और घरेलू फॉस्फेट उत्पादन क्षमता बढ़ाता है तो भविष्य में आयात जोखिम कम किया जा सकता है।
इसके साथ ही मिट्टी परीक्षण और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने से DAP की अनावश्यक मांग को कम किया जा सकता है।
यह दीर्घकालिक खाद सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होगा।
सरकार के सामने पांच बड़ी प्राथमिकताएं
मौजूदा परिस्थितियों में सरकार के सामने पांच प्रमुख प्राथमिकताएं दिखाई देती हैं।
पहली प्राथमिकता है पर्याप्त DAP स्टॉक बनाए रखना।
दूसरी प्राथमिकता है मोरक्को, सऊदी अरब, रूस, जॉर्डन और अन्य उत्पादक देशों से आपूर्ति संबंध मजबूत करना।
तीसरी प्राथमिकता है सल्फर और फॉस्फोरिक एसिड जैसे कच्चे माल की उपलब्धता सुरक्षित करना।
चौथी प्राथमिकता है अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने पर किसानों को अचानक कीमत वृद्धि से बचाना।
पांचवीं प्राथमिकता है खाद की कालाबाजारी और जमाखोरी पर नियंत्रण रखना।
किसानों को क्या करना चाहिए?
किसानों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि घबराकर जरूरत से ज्यादा खाद खरीदने से बचें।
यदि क्षेत्र में DAP की पर्याप्त उपलब्धता है तो केवल भविष्य में कमी की अफवाह के कारण अतिरिक्त स्टॉक बनाना जरूरी नहीं है।
मिट्टी परीक्षण और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार खाद का इस्तेमाल करना बेहतर है।
DAP के साथ यूरिया या NPK का उपयोग भी फसल की जरूरत के अनुसार होना चाहिए।
किसान को यह भी देखना चाहिए कि खाद अधिकृत विक्रेता से खरीदी जा रही है और बिल लिया जा रहा है।
अफवाहों से बचना जरूरी
उर्वरक बाजार में अफवाहों का असर तेजी से फैल सकता है।
सोशल मीडिया पर “DAP खत्म”, “अगले महीने कीमत बढ़ेगी” या “सरकार ने DAP बंद कर दिया” जैसी खबरें किसानों को परेशान कर सकती हैं।
ऐसी स्थिति में किसानों को राज्य कृषि विभाग, अधिकृत विक्रेता और सरकारी सूचना स्रोतों से पुष्टि करनी चाहिए।
आगे क्या होगा?
आने वाले महीनों में वैश्विक DAP बाजार पर तीन चीजों की सबसे ज्यादा नजर रहेगी।
पहली—चीन की निर्यात नीति।
दूसरी—सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड की कीमत।
तीसरी—पश्चिम एशिया और समुद्री व्यापार मार्गों की स्थिति।
यदि चीन से निर्यात में कुछ राहत मिलती है और सल्फर की कीमत नरम पड़ती है तो DAP बाजार में दबाव कम हो सकता है।
इसके विपरीत यदि चीन की आपूर्ति सीमित रहती है और सल्फर महंगा बना रहता है तो भारत समेत बड़े आयातकों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
वैश्विक DAP बाजार में भारत की बढ़ती भूमिका
भारत अब केवल एक बड़ा उर्वरक आयातक नहीं रह गया है।
उसकी खरीद की मात्रा इतनी महत्वपूर्ण है कि वैश्विक बाजार की मांग और कीमत पर भी असर पड़ सकता है।
जब भारत बड़े पैमाने पर खरीद करता है तो निर्यातक देशों को बड़े और स्थिर खरीदार का बाजार मिलता है।
लेकिन दूसरी ओर, भारत को अपनी खरीद को समय और कीमत के हिसाब से रणनीतिक बनाना पड़ता है।
यही कारण है कि सरकारी स्तर पर खरीद और कंपनियों की खरीद गतिविधियों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
भारत द्वारा वैश्विक बाजार में DAP की खरीद बढ़ाने की रणनीति मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में महत्वपूर्ण कदम है। चीन के फॉस्फेट उर्वरक निर्यात को लेकर अनिश्चितता, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड की बढ़ती लागत तथा पश्चिम एशिया में परिवहन संबंधी जोखिमों ने वैश्विक उर्वरक बाजार को पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील बना दिया है। सितंबर की शुरुआत में S&P Global ने भी चीन के DAP और MAP निर्यात को लेकर अनिश्चितता तथा सल्फर लागत को बाजार की प्रमुख चिंताओं में शामिल किया था। (S&P Global)
भारत के लिए चुनौती यह है कि उसे एक तरफ बड़ी मात्रा में DAP और NPK की उपलब्धता सुनिश्चित करनी है, वहीं दूसरी तरफ महंगे अंतरराष्ट्रीय बाजार का बोझ किसानों पर नहीं पड़ने देना है। सरकार ने पहले भी सब्सिडी बढ़ाकर वैश्विक कीमतों के असर को सीमित करने का प्रयास किया है। (Reuters)
आगे भारत की रणनीति केवल तैयार DAP खरीदने तक सीमित नहीं रह सकती। फॉस्फेट रॉक, सल्फर, फॉस्फोरिक एसिड और अन्य कच्चे माल की आपूर्ति सुरक्षित करना भी उतना ही जरूरी होगा। साथ ही मोरक्को, सऊदी अरब, रूस और अन्य उत्पादक देशों के साथ दीर्घकालिक समझौतों को मजबूत करना होगा।
भारत के लिए सबसे बेहतर रास्ता एक विविध और बहु-स्रोत वाली उर्वरक आपूर्ति व्यवस्था है। इससे किसी एक देश के निर्यात प्रतिबंध या किसी एक समुद्री मार्ग में व्यवधान का असर कम किया जा सकेगा।
दूसरी तरफ किसानों के स्तर पर संतुलित उर्वरक उपयोग और मिट्टी परीक्षण को बढ़ावा देना भी जरूरी है। इससे DAP और अन्य फॉस्फेट उर्वरकों की मांग को वैज्ञानिक जरूरत के अनुसार रखा जा सकेगा।
कुल मिलाकर, 10 सितंबर के आसपास सामने आई DAP बाजार की स्थिति भारत के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। देश को आने वाले रबी सीजन और आगे की कृषि जरूरतों के लिए अभी से आपूर्ति सुरक्षित करने की रणनीति पर काम करना होगा। यदि भारत समय पर खरीद, विविध आयात स्रोत, पर्याप्त बफर स्टॉक और प्रभावी वितरण व्यवस्था बनाए रखता है, तो वैश्विक बाजार की अस्थिरता के बावजूद किसानों के लिए खाद की उपलब्धता को काफी हद तक स्थिर रखा जा सकता है।
लेकिन यदि चीन की निर्यात पाबंदियां लंबी चलती हैं, सल्फर की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और समुद्री व्यापार मार्गों में व्यवधान जारी रहता है, तो DAP और NPK की वैश्विक लागत पर दबाव बना रह सकता है। ऐसी स्थिति में भारत की समय पर की गई खरीद और दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच साबित होंगे।

