बिहार के खगड़िया जिले का केला कभी यहां के किसानों के लिए “पीला सोना” माना जाता था, लेकिन अब यह पहचान धीरे-धीरे कमजोर पड़ती नजर आ रही है। प्रधानमंत्री की ‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना के तहत शामिल खगड़िया का केला आज गंभीर संकट से गुजर रहा है। पनामा विल्ट यानी गलुआ रोग ने केले की खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसके कारण किसान अब इससे दूरी बनाकर मक्का की खेती की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं।
जिले के गोगरी और परबत्ता प्रखंड लंबे समय से केले की खेती के प्रमुख केंद्र रहे हैं। खासकर परबत्ता प्रखंड के कुल्हड़िया पंचायत में कभी बड़े पैमाने पर केला उगाया जाता था। पहले यहां करीब 200 एकड़ में केले की खेती होती थी, लेकिन अब यह रकबा घटकर लगभग 100 एकड़ रह गया है। यह गिरावट साफ तौर पर बताती है कि किसान किस तरह इस फसल से निराश हो रहे हैं।
कुल्हड़िया के किसान मुरारी तिवारी इसका उदाहरण हैं। वे पहले छह एकड़ में केले की खेती करते थे, लेकिन गलुआ रोग के बढ़ते प्रकोप ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। अब वे केवल दो एकड़ में ही केला उगा रहे हैं, जबकि बाकी जमीन पर मक्का की खेती कर रहे हैं। उनके अनुसार, मक्का अब उनके लिए स्थिर और भरोसेमंद विकल्प बन गया है।
अगर केले और मक्का की खेती के अर्थशास्त्र को समझें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। एक एकड़ केले की खेती में, विशेषकर रविष्टा प्रजाति में, 75 हजार से लेकर एक लाख रुपये तक की लागत आती है और शुद्ध मुनाफा करीब दो लाख रुपये तक हो सकता है। वहीं जी-नाइन प्रजाति में लागत बढ़कर करीब डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच जाती है, लेकिन मुनाफा भी तीन लाख रुपये के आसपास मिल सकता है। हालांकि, यह लाभ तभी संभव है जब फसल रोग से सुरक्षित रहे।
इसके विपरीत मक्का की खेती कम लागत और कम जोखिम वाला विकल्प बनकर उभरी है। एक एकड़ में मक्का उगाने की लागत 17 हजार से 30 हजार रुपये के बीच होती है और शुद्ध मुनाफा लगभग 50 हजार रुपये तक मिलता है। यदि बाजार भाव अच्छा रहा तो यह मुनाफा 70 हजार रुपये तक भी पहुंच सकता है। भले ही मक्का में केले जितना बड़ा लाभ नहीं है, लेकिन इसमें जोखिम कम है और यही वजह है कि किसान इसे प्राथमिकता दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पनामा विल्ट जैसी बीमारियों से निपटने के लिए ठोस उपाय और जागरूकता की जरूरत है। अगर समय रहते रोग नियंत्रण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो खगड़िया का केला सिर्फ पहचान बनकर रह जाएगा। फिलहाल, बदलते हालात में मक्का किसानों के लिए सहारा बनकर उभरा है, लेकिन केले की खोती पहचान चिंता का विषय बनी हुई है।

