Punjab Agricultural University (पीएयू) के विस्तार शिक्षा निदेशालय ने Department of Plant Pathology के सहयोग से 28 अप्रैल 2026 को धान की बौनी बीमारी (राइस ड्वार्फ डिजीज) पर राज्यस्तरीय ऑनलाइन कार्यशाला-सह-प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में पीएयू तथा Department of Agriculture and Farmers Welfare Punjab के लगभग 350 विस्तार विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन और समन्वय डॉ. पी.एस. संधू, अतिरिक्त निदेशक (विस्तार शिक्षा) द्वारा किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत में विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. एम.एस. भुल्लर ने अपने उद्घाटन संबोधन में पंजाब में धान की बौनी बीमारी के बढ़ते खतरे पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम वैज्ञानिक ज्ञान को समय पर किसानों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अनुसंधान और खेत स्तर पर उसके उपयोग के बीच मजबूत संबंध स्थापित करना आज की आवश्यकता है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य फोकस साउदर्न राइस ब्लैक-स्ट्रीक्ड ड्वार्फ वायरस (SRBSDV) से होने वाली इस बीमारी की महामारी विज्ञान, प्रसार, संवेदनशील किस्मों और पंजाब की परिस्थितियों में इसके एकीकृत प्रबंधन पर केंद्रित रहा।
तकनीकी सत्र में प्रमुख पौध बैक्टीरियोलॉजिस्ट डॉ. मंदीप हुंजान ने वर्ष 2025 के दौरान पंजाब में इस बीमारी के प्रसार और वितरण पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वर्तमान में पंजाब में उगाई जा रही धान की किस्मों में इस वायरस के प्रति कोई प्रतिरोधक क्षमता नहीं पाई गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह रोग मुख्य रूप से व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर नामक कीट के माध्यम से फैलता है। इसलिए रोग की रोकथाम के लिए प्रारंभिक अवस्था में कीट नियंत्रण और स्वच्छ खेती (क्लीन कल्टीवेशन) सबसे प्रभावी उपाय हैं।
इस दौरान एंटोमोलॉजिस्ट डॉ. रूबलजोत कूनर ने इस कीट के जीवन चक्र और व्यवहार के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने खेत स्तर पर इसके नियंत्रण के व्यावहारिक उपाय सुझाए और कहा कि कीट की गतिविधियों के अनुसार समय पर और लक्षित हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी है, तभी इस बीमारी को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
डॉ. पी.एस. संधू ने अपने संबोधन में पंजाब में इस बीमारी के ऐतिहासिक विकास और इसके बढ़ते महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे वेबिनार वैज्ञानिकों और फील्ड अधिकारियों के बीच त्वरित संवाद स्थापित करने में सहायक हैं, जिससे तकनीक का तेजी से प्रसार संभव हो पाता है।
कार्यक्रम में प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए डॉ. नरिंदरपाल सिंह बेनीपाल ने पीएयू और कृषि विभाग के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने किसानों को धान की फसल की जल्दी रोपाई से बचने की सलाह दी, क्योंकि इससे कीटों की संख्या बढ़ सकती है और रोग का प्रसार तेज हो सकता है। उन्होंने विस्तार कर्मियों से आग्रह किया कि वे इस जानकारी को किसानों तक विभिन्न माध्यमों जैसे जागरूकता शिविरों, मीडिया और खेत स्तर के कार्यक्रमों के जरिए पहुंचाएं।
कार्यक्रम के अंत में एक इंटरैक्टिव सत्र आयोजित किया गया, जिसमें डॉ. जगजीत सिंह लोर, डॉ. अमरजीत सिंह और डॉ. मनमोहन ढकल सहित अन्य विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों के सवालों के जवाब दिए। इसमें रोग की पहचान, कीट निगरानी और प्रबंधन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की गईं।
अंत में डॉ. अमरजीत सिंह, प्रिंसिपल एक्सटेंशन साइंटिस्ट ने धन्यवाद ज्ञापन किया और सभी विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों के योगदान की सराहना की। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम पंजाब में धान की बौनी बीमारी जैसी उभरती चुनौती से निपटने के लिए ज्ञान प्रसार और समन्वित प्रयासों का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ।

