भारत की कृषि व्यवस्था को जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आबादी और खाद्य एवं पोषण सुरक्षा जैसी चुनौतियों के लिए तैयार करने में Plant Genetic Resources (PGR) की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। पौधों की आनुवंशिक विविधता न केवल भविष्य की खेती के लिए नई संभावनाएं उपलब्ध कराती है, बल्कि देश की Food Security, Nutritional Security, Ecological Balance और Rural Livelihoods को भी मजबूत आधार प्रदान करती है।
इसी महत्वपूर्ण विषय पर दक्षिण भारत, विशेष रूप से प्रायद्वीपीय भारत की समृद्ध वनस्पति आनुवंशिक संपदा के संरक्षण और Sustainable Development में उसके उपयोग को लेकर बेंगलुरु में राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी आयोजित की जा रही है।
ICAR-Indian Institute of Horticultural Research (ICAR-IIHR), बेंगलुरु में 17 से 19 सितंबर 2026 तक आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय “Harnessing Plant Genetic Resources of Peninsular India – From Biodiversity Hotspot to Sustainable Bio-resource Hub” रखा गया है।
संगोष्ठी का उद्घाटन कर्नाटक के माननीय राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत ने किया। कार्यक्रम में देशभर से वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, किसानों, विद्यार्थियों और अन्य Stakeholders ने भाग लिया। इस राष्ट्रीय आयोजन में 300 से अधिक प्रतिभागियों की भागीदारी है।
भविष्य की Agriculture और Food Security की नींव हैं Plant Genetic Resources
उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए कर्नाटक के राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि Plant Genetic Resources भविष्य की Agriculture, Food Security और Nutritional Security की बुनियाद हैं।
उन्होंने कहा कि बदलते Climate, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव और कृषि क्षेत्र की नई चुनौतियों के बीच ऐसी पौध प्रजातियों और आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण जरूरी है, जो भविष्य की खेती को अधिक Resilient और Sustainable बना सकें।
उन्होंने Karnataka और पूरे Peninsular India की समृद्ध Plant Diversity का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में Landraces, Traditional Crops, Crop Wild Relatives, Medicinal Plants और Indigenous Knowledge उपलब्ध हैं।
ये संसाधन केवल जैव विविधता का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि इनके भीतर ऐसे Genetic Traits मौजूद हो सकते हैं, जो भविष्य की फसलों को सूखा, गर्मी, रोग, कीट और अन्य Environmental Stresses से निपटने में सक्षम बनाने में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
Karnataka और Peninsular India में जैव विविधता का खजाना
भारत की Peninsular Region को Plant Biodiversity की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। Karnataka सहित दक्षिण भारत के विभिन्न हिस्सों में सदियों से किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग Crop Varieties और Landraces को संरक्षित करते आए हैं।
इन Traditional Crops में स्थानीय जलवायु, मिट्टी और कृषि परिस्थितियों के अनुरूप विकसित कई महत्वपूर्ण गुण मौजूद हो सकते हैं।
इसी तरह Crop Wild Relatives यानी खेती की फसलों से संबंधित जंगली प्रजातियां भी Genetic Improvement के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं। वैज्ञानिक इन संसाधनों में मौजूद उपयोगी गुणों की पहचान करके भविष्य की फसल किस्मों में उनका उपयोग कर सकते हैं।
इसके अलावा Medicinal Plants और Indigenous Plant Species भी Bio-resource Economy के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती हैं।
राज्यपाल ने कहा कि इस पूरी Genetic Wealth को केवल संग्रहालयों या Gene Banks तक सीमित रखने के बजाय Research, Innovation और Sustainable Development से जोड़ना होगा।
Traditional Knowledge और Modern Science को जोड़ने की जरूरत
श्री थावरचंद गहलोत ने Traditional Knowledge और Modern Science के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण और आदिवासी समुदायों के पास पौधों, बीजों, खेती की पारंपरिक पद्धतियों और स्थानीय जैव संसाधनों से संबंधित लंबे समय का अनुभव है। इस ज्ञान को Scientific Research के साथ जोड़ने से नई कृषि तकनीकों और Innovation को बढ़ावा मिल सकता है।
उन्होंने Digital Technologies के उपयोग को भी महत्वपूर्ण बताया। आधुनिक Digital Tools की मदद से Genetic Resources की Documentation, Characterization और Mapping को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
Digital Database और Advanced Research Technologies के माध्यम से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी विशेष स्थानीय Crop या Plant Variety में कौन से उपयोगी Genetic Traits मौजूद हैं।
Conservation से Value Addition तक मजबूत हो पूरी Value Chain
राज्यपाल ने Plant Genetic Resources के संरक्षण को केवल Conservation Activity के रूप में देखने के बजाय एक पूरी Value Chain के रूप में विकसित करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि इस Value Chain में कई स्तर शामिल होने चाहिए—
Conservation → Research → Innovation → Value Addition → Entrepreneurship → Farmer Benefits
इसका अर्थ है कि किसी Plant Genetic Resource को संरक्षित करने के बाद उसके वैज्ञानिक अध्ययन, Genetic Characterization और उपयोगी Traits की पहचान की जाए। इसके बाद Research को Innovation और Commercial Applications से जोड़ा जाए।
इसके आधार पर Value-added Products, नई Crop Varieties, Processing Technologies और अन्य कृषि आधारित उद्यम विकसित किए जा सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया का लाभ अंततः Farmers और Local Communities तक पहुंचना चाहिए।
“Lab to Land” और “Land to Lab” दोनों जरूरी
राज्यपाल ने Universities और Research Institutions से “Lab to Land” और “Land to Lab” approaches को मजबूत करने का आह्वान किया।
Lab to Land का उद्देश्य वैज्ञानिक Research और Technologies को किसानों के खेतों तक पहुंचाना है। वहीं Land to Lab approach के तहत किसानों के अनुभव, स्थानीय ज्ञान और खेतों में मौजूद वास्तविक समस्याओं को वैज्ञानिक Research का हिस्सा बनाया जाता है।
कृषि क्षेत्र में दोनों approaches के बीच बेहतर संबंध बनाने से Research अधिक Practical और Farmer-Centric बन सकती है।
उदाहरण के लिए किसान किसी स्थानीय Crop Variety के बारे में यह जानते हो सकते हैं कि वह कम पानी में बेहतर उत्पादन देती है या किसी विशेष रोग के प्रति अधिक सहनशील है। ऐसे Traditional Observations को वैज्ञानिक परीक्षणों के माध्यम से Validate किया जा सकता है।
इससे Indigenous Knowledge और Modern Science के बीच एक मजबूत Research Bridge तैयार हो सकता है।
Genetic Resources मानवता की विरासत: डॉ. आर.एस. परोदा
कार्यक्रम में Padma Bhushan डॉ. आर. एस. परोदा, President, Indian Society of Plant Genetic Resources (ISPGR) और Chairman, TAAS ने Plant Genetic Resources को मानवता की विरासत बताया।
उन्होंने कहा कि Genetic Resources का संरक्षण केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी आवश्यक है।
उन्होंने Genetic Resources की अधिक Exploration और Scientific Understanding की आवश्यकता पर जोर दिया। विशेष रूप से उन्होंने इन संसाधनों की Genetic Potential को Decode करने की दिशा में Research बढ़ाने की बात कही।
किसी Plant Genetic Resource की वास्तविक उपयोगिता को समझने के लिए केवल उसका संरक्षण पर्याप्त नहीं है। उसके Genetic Characteristics, Adaptability और उपयोगी Traits की वैज्ञानिक पहचान करना भी आवश्यक है।
Farmers और Local Communities हैं Biodiversity के Custodians
डॉ. आर. एस. परोदा ने Farmers और Local Communities की भूमिका को भी विशेष महत्व दिया।
उन्होंने कहा कि स्थानीय किसान और समुदाय लंबे समय से Biodiversity के Custodians की भूमिका निभाते आए हैं। उन्होंने स्थानीय Crop Varieties, Traditional Seeds और Indigenous Plants को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित किया है।
ऐसे में Biodiversity Conservation के प्रयासों में इन समुदायों को सक्रिय Stakeholders के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने राज्यों में State-Level Missions स्थापित करने की वकालत की, ताकि स्थानीय Genetic Resources की Conservation और Documentation को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।
इस तरह के Missions स्थानीय स्तर पर उपलब्ध Crop Diversity की पहचान, Documentation, Conservation और Sustainable Utilization में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
Conserved Genetic Resources का ज्यादा उपयोग जरूरी
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR के Deputy Director General (Crop Sciences) डॉ. डी.के. यादव ने Conserved Genetic Resources के अधिक से अधिक उपयोग पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि केवल Genetic Resources को सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है। उनका वैज्ञानिक और कृषि सुधार में प्रभावी Utilization भी होना चाहिए।
उन्होंने Novel Breeding Strategies के माध्यम से इन Genetic Resources का उपयोग Crop Improvement में करने की आवश्यकता बताई।
नई Breeding Technologies की मदद से ऐसे Crop Varieties विकसित किए जा सकते हैं, जिनमें बेहतर Yield, Disease Resistance, Stress Tolerance, Nutritional Quality और Climate Adaptability जैसे गुण हों।
उन्होंने Plant Genetic Resources के Conservation में ICAR-NBPGR और National Gene Bank की महत्वपूर्ण भूमिका की भी सराहना की।
National Gene Bank में सुरक्षित हो रही Genetic Diversity
Plant Genetic Resources के Conservation के लिए National Gene Bank की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभिन्न फसलों और उनके Genetic Resources को सुरक्षित रखकर आने वाली पीढ़ियों के लिए Genetic Diversity का संरक्षण किया जा सकता है।
यह Genetic Diversity भविष्य में Crop Breeding और Agricultural Research के लिए एक महत्वपूर्ण Resource बन सकती है।
Climate Change के दौर में इसका महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि भविष्य में किसानों को ऐसी फसल किस्मों की आवश्यकता हो सकती है, जो अधिक गर्मी, कम पानी, नई बीमारियों और बदलते मौसम के प्रति अधिक सहनशील हों।
ऐसे Traits की तलाश और उनका उपयोग तभी संभव है, जब देश की Genetic Diversity सुरक्षित रहे।
Climate-Resilient Agriculture के लिए महत्वपूर्ण कदम
आज Agriculture Sector के सामने Climate Change एक बड़ी चुनौती है। अनियमित वर्षा, तापमान में वृद्धि, सूखा, बाढ़ और नए Pest-Disease Pressure जैसी समस्याएं Crop Productivity को प्रभावित कर सकती हैं।
ऐसे समय में Plant Genetic Resources Climate-Resilient Agriculture के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
स्थानीय और पारंपरिक Crop Varieties में कई बार ऐसी विशेषताएं मौजूद होती हैं, जो उन्हें किसी खास क्षेत्र की Climate और Soil Conditions के अनुरूप बनाती हैं।
Scientific Research के माध्यम से इन गुणों की पहचान करके Modern Crop Breeding Programmes में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इससे ऐसी नई Crop Varieties विकसित करने की संभावना बढ़ेगी, जो बदलती जलवायु परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
Bio-resource Hub के रूप में विकसित हो सकता है Peninsular India
राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य Peninsular India को केवल Biodiversity Hotspot के रूप में देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एक Sustainable Bio-resource Hub के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ना है।
इसके लिए Conservation और Research के साथ-साथ Entrepreneurship और Value Addition को भी जोड़ना होगा।
Medicinal Plants, Traditional Crops, Ornamental Plants, Horticultural Resources और अन्य Indigenous Plant Species के आधार पर नए Products और Rural Enterprises विकसित किए जा सकते हैं।
इससे स्थानीय स्तर पर Employment और Income Opportunities पैदा हो सकती हैं।
विशेष रूप से Farmers Producer Organisations (FPOs), Start-ups, Rural Entrepreneurs और Small Processing Units को इस Genetic Wealth से जोड़ा जा सकता है।
किसानों तक पहुंचेगा Genetic Resources का लाभ
Plant Genetic Resources पर Research का अंतिम उद्देश्य किसानों और समाज के लिए उपयोगी परिणाम तैयार करना होना चाहिए।
नई Crop Varieties, बेहतर Seed Material, Climate-Resilient Crops, Nutritionally Improved Crops और Value-added Products के रूप में इसका लाभ किसानों तक पहुंचाया जा सकता है।
इसके लिए Research Institutions और Farmers के बीच मजबूत Linkage जरूरी है।
संगोष्ठी में इसी प्रकार के Science–Farmer–Industry Linkages को मजबूत करने की दिशा में विचार-विमर्श किया जा रहा है।
300 से अधिक Stakeholders की भागीदारी
17 से 19 सितंबर 2026 तक चल रही इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में 300 से अधिक Scientists, Researchers, Policymakers, Students, Farmers और अन्य Stakeholders भाग ले रहे हैं।
तीन दिवसीय आयोजन में Plant Genetic Resources के Conservation, Characterization, Utilization और Sustainable Management से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
इस दौरान वैज्ञानिक Research को Farmer Needs और Sustainable Development Goals से जोड़ने की दिशा में भी चर्चा हो रही है।
Genetic Diversity से Sustainable Future की ओर
Peninsular India की Plant Genetic Wealth केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि भारत के कृषि और ग्रामीण भविष्य के लिए एक Strategic Resource है। Landraces, Traditional Crops, Crop Wild Relatives, Medicinal Plants और Indigenous Knowledge में छिपी संभावनाओं को वैज्ञानिक तरीके से पहचानना और उनका Sustainable Utilization करना आने वाले समय की महत्वपूर्ण जरूरत है।
बेंगलुरु में आयोजित यह राष्ट्रीय संगोष्ठी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में सामने आई है। इसमें Conservation को Research से, Research को Innovation से और Innovation को Farmers तथा Entrepreneurship से जोड़ने पर जोर दिया गया है।
यदि Traditional Knowledge, Modern Science और Digital Technology को एक साथ जोड़कर काम किया जाता है, तो भारत अपनी Plant Genetic Wealth को सुरक्षित रखने के साथ-साथ इसे Sustainable Agriculture, Food Security, Climate Resilience और Rural Development का मजबूत आधार बना सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया में किसानों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी सबसे महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि यही समुदाय पीढ़ियों से देश की Biodiversity के वास्तविक Custodians रहे हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि उनके अनुभव और ज्ञान को Scientific Research के साथ जोड़ा जाए और Genetic Resources से बनने वाले नए अवसरों का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंचे।
यही “Lab to Land” और “Land to Lab” का उद्देश्य है और यही दृष्टिकोण भारत की Plant Genetic Wealth को भविष्य की Sustainable Bio-resource Economy में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
