महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले में ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए भाकृअनुप–केन्द्रीय तटीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने ‘वैज्ञानिक बकरी पालन’ पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम मालवन क्षेत्र के किरलोस गांव में आयोजित हुआ, जिसमें अनुसूचित जाति के किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम संस्थान की अनुसूचित जाति उप-योजना (SCSP) के अंतर्गत आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और संसाधन-सीमित परिवारों को बकरी पालन के माध्यम से स्थायी आय के अवसर प्रदान करना है। इस पहल में भाकृअनुप–कृषि विज्ञान केन्द्र, किरलोस का भी सहयोग रहा, जिससे स्थानीय स्तर पर किसानों तक तकनीकी जानकारी प्रभावी ढंग से पहुंचाई जा सकी।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बकरी पालन के विभिन्न पहलुओं पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। इसमें बकरी के बच्चों (किड्स), गर्भित बकरियों और दुग्ध उत्पादन करने वाली बकरियों के वैज्ञानिक प्रबंधन पर विस्तार से जानकारी दी गई। किसानों को बेहतर आवास व्यवस्था, संतुलित पोषण और नियमित देखभाल की आधुनिक पद्धतियों से अवगत कराया गया, ताकि वे अपनी उत्पादकता और आय में वृद्धि कर सकें।
प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा स्वास्थ्य प्रबंधन रहा, जिसमें बकरियों में होने वाले सामान्य रोगों की पहचान, समय पर टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं का उपयोग और स्वच्छता के उपायों पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि इन उपायों को अपनाकर बकरियों की मृत्यु दर को कम किया जा सकता है और उनकी जीवित रहने की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।
इसके साथ ही, किसानों को ‘कोंकण कन्याल’ जैसी उन्नत बकरी नस्ल के बारे में जानकारी दी गई, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल है और बेहतर उत्पादन क्षमता रखती है। चारा एवं आहार प्रबंधन पर भी विशेष सत्र आयोजित किए गए, ताकि किसान कम लागत में अधिक लाभ प्राप्त कर सकें। रिकॉर्ड संधारण और जैव-सुरक्षा उपायों को भी प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया गया, जिससे किसानों को अपने व्यवसाय को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने में मदद मिले।
कार्यक्रम के अंतर्गत इनपुट सहायता के रूप में 29 लाभार्थी किसानों के बीच 15 बकरियों का वितरण किया गया। यह कदम किसानों को प्रशिक्षण के साथ-साथ व्यावहारिक शुरुआत का अवसर प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे गांव स्तर पर बकरी आधारित आजीविका प्रणाली को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
कार्यक्रम का समापन एक संवादात्मक सत्र के साथ हुआ, जिसमें किसानों ने अपने अनुभव साझा किए और विशेषज्ञों से अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त किया। इस प्रशिक्षण में कुल 29 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 13 महिलाएं और 16 पुरुष शामिल थे। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने यह संकेत दिया कि बकरी पालन ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का भी एक प्रभावी माध्यम बन सकता है।
कुल मिलाकर, यह पहल न केवल किसानों को वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ने में सफल रही, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुई है।

