प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और कृषि शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की दिशा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत और रसायन-मुक्त कृषि के विजन को साकार करने की दिशा में विश्वविद्यालय ने ऐसा मॉडल विकसित किया है, जो देशभर के कृषि संस्थानों के लिए प्रेरणा बन गया है। विश्वविद्यालय के बी.एससी. (ऑनर्स) एग्रीकल्चर इन नेचुरल फार्मिंग पाठ्यक्रम के पहले बैच के सभी 15 छात्रों को ₹15,000 प्रतिमाह तक की सवेतन इंटर्नशिप के साथ-साथ प्रतिष्ठित संस्थानों से स्थायी नौकरी के प्रस्ताव भी प्राप्त हुए हैं।
यह उपलब्धि न केवल प्राकृतिक खेती की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि आधुनिक कृषि शिक्षा को उद्योगों की आवश्यकताओं से जोड़कर युवाओं के लिए नए रोजगार अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
प्राकृतिक खेती की शिक्षा में देश का अग्रणी संस्थान बना पूसा
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने प्राकृतिक खेती को केवल एक वैकल्पिक कृषि पद्धति के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की टिकाऊ कृषि व्यवस्था के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया। इसी सोच के तहत विश्वविद्यालय ने बी.एससी. (ऑनर्स) एग्रीकल्चर इन नेचुरल फार्मिंग नामक अभिनव डिग्री कार्यक्रम शुरू किया।
इस कार्यक्रम की शुरुआत सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, इम्फाल, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरएलबीसीएयू), झांसी और आरपीसीएयू, पूसा द्वारा संयुक्त रूप से की गई थी। उस समय इस नए पाठ्यक्रम को लेकर कई तरह की आशंकाएं थीं, विशेष रूप से रोजगार के अवसरों को लेकर। लेकिन कुछ ही वर्षों में यह धारणा पूरी तरह बदल गई।
प्रधानमंत्री मोदी के विजन से बढ़ी प्राकृतिक खेती की मांग
देशभर में प्राकृतिक खेती को लगातार बढ़ावा देने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल का सकारात्मक प्रभाव अब रोजगार बाजार में भी दिखाई देने लगा है। सरकार द्वारा रसायन-मुक्त खेती, जैविक उत्पादन, जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि को प्रोत्साहित किए जाने से निजी क्षेत्र और कृषि उद्योगों में प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ी है।
ग्रीन एनर्जी, कृषि प्रौद्योगिकी, जैविक उत्पाद, ग्रामीण विकास और एग्री-बिजनेस से जुड़ी अनेक कंपनियां अब ऐसे प्रशिक्षित युवाओं की तलाश कर रही हैं, जो प्राकृतिक खेती की वैज्ञानिक समझ रखते हों और किसानों के साथ जमीनी स्तर पर काम करने में सक्षम हों।
वैज्ञानिक और उद्योग आधारित पाठ्यक्रम बना सफलता की कुंजी
इस उपलब्धि के पीछे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा तैयार किया गया आधुनिक और वैज्ञानिक पाठ्यक्रम भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पाठ्यक्रम को उद्योगों की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
विश्वविद्यालय ने विद्यार्थियों को केवल कक्षा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें खेतों में व्यावहारिक प्रशिक्षण, प्राकृतिक खेती के मॉडल, जैविक इनपुट तैयार करने, किसानों के साथ संवाद, बाजार विश्लेषण और ग्रामीण विकास परियोजनाओं से भी जोड़ा। परिणामस्वरूप विद्यार्थी पढ़ाई पूरी होने से पहले ही उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप पूरी तरह प्रशिक्षित हो गए।
पहले बैच के सभी 15 छात्रों को मिला प्लेसमेंट
16 जून को आयोजित “खेत बचाओ अभियान” कार्यक्रम के दौरान वर्ष 2023–2027 बैच के सभी 15 छात्रों को ₹15,000 प्रतिमाह तक की सवेतन इंटर्नशिप तथा प्लेसमेंट ऑफर लेटर प्रदान किए गए।
ये ऑफर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर द्वारा विद्यार्थियों को सौंपे गए। कार्यक्रम में कृषि, ग्रीन एनर्जी, ग्रामीण विकास और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से जुड़ी कई प्रतिष्ठित संस्थाओं ने भाग लिया और छात्रों की प्रतिभा की सराहना की।
यह पहली बार है जब प्राकृतिक खेती के किसी स्नातक बैच के सभी विद्यार्थियों को एक साथ उद्योगों से रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं।
ग्रीन एनर्जी और कृषि कंपनियों ने दिखाई विशेष रुचि
प्लेसमेंट देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों ने कहा कि विद्यार्थियों में प्राकृतिक खेती, जैविक कृषि, सतत विकास और आधुनिक कृषि प्रबंधन की उत्कृष्ट समझ है। यही कारण है कि कॉर्पोरेट क्षेत्र अब ऐसे प्रशिक्षित युवाओं को अपनी परियोजनाओं में शामिल करना चाहता है।
विशेष रूप से ग्रीन एनर्जी, प्राकृतिक कृषि उत्पाद, कृषि-आधारित स्टार्टअप और ग्रामीण विकास क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों ने इस पाठ्यक्रम के छात्रों को भविष्य की आवश्यकता बताया।
किसानों के साथ करेंगे जमीनी स्तर पर काम
चयनित छात्र गोवर्धन पहल, वेस्ट-टू-एनर्जी सिस्टम, प्राकृतिक खेती के मॉडल, जैविक कृषि, ग्रामीण आजीविका और सतत विकास से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं में कार्य करेंगे।
इनका प्रमुख उद्देश्य किसानों को रसायन-मुक्त खेती अपनाने के लिए प्रेरित करना, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा टिकाऊ कृषि प्रणालियों को गांव-गांव तक पहुंचाना होगा।
इसके साथ ही छात्र प्राकृतिक कृषि उत्पादों के विपणन, ब्रांडिंग, मूल्य संवर्धन और व्यावसायीकरण का भी व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करेंगे। इससे भारतीय प्राकृतिक उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी।
इंटर्नशिप के बाद स्थायी रोजगार का अवसर
विश्वविद्यालय के अनुसार विद्यार्थियों की सवेतन इंटर्नशिप पूरी होने के बाद संबंधित संस्थानों में उन्हें स्थायी रोजगार मिलने की भी पूरी संभावना है। कई कंपनियों ने पहले से ही यह स्पष्ट कर दिया है कि सफल प्रदर्शन करने वाले छात्रों को नियमित नियुक्ति दी जाएगी।
प्राकृतिक खेती के विशेषज्ञों की बढ़ती मांग को देखते हुए उद्योग जगत इस पाठ्यक्रम को भविष्य की कृषि शिक्षा का महत्वपूर्ण मॉडल मान रहा है।
कृषि शिक्षा को मिला नया आयाम
यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि यदि कृषि शिक्षा को उद्योगों, अनुसंधान और व्यावहारिक प्रशिक्षण से जोड़ा जाए तो विद्यार्थी पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद रोजगार के लिए तैयार हो सकते हैं।
आरपीसीएयू, पूसा ने यह सिद्ध कर दिया है कि केवल पारंपरिक कृषि शिक्षा ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक खेती जैसे उभरते क्षेत्रों में भी उत्कृष्ट करियर बनाया जा सकता है। इससे युवाओं का कृषि शिक्षा के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा और वे इसे रोजगार एवं उद्यमिता के बेहतर विकल्प के रूप में देख सकेंगे।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूत कदम
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने कहा कि प्राकृतिक खेती आधारित ऐसी पहलें ग्रामीण भारत में कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देंगी और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षित युवा किसान, विज्ञान और उद्योग के बीच मजबूत सेतु बनेंगे तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देंगे।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों, किसानों, विद्यार्थियों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बिरौली द्वारा आयोजित इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि कृषि शिक्षा को यदि वैज्ञानिक शोध, फील्ड आधारित प्रशिक्षण और उद्योगों के सहयोग से जोड़ा जाए, तो वह न केवल रोजगारपरक बन सकती है, बल्कि देश की कृषि व्यवस्था में भी व्यापक परिवर्तन ला सकती है।
देश के लिए बना प्रेरणादायक मॉडल
प्राकृतिक खेती को लेकर आरपीसीएयू, पूसा की यह पहल अब देशभर के कृषि विश्वविद्यालयों के लिए एक आदर्श मॉडल बन चुकी है। पहले ही बैच के सभी विद्यार्थियों को सवेतन इंटर्नशिप और रोजगार के अवसर मिलना इस बात का प्रमाण है कि प्राकृतिक खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि युवाओं के लिए उभरता हुआ करियर विकल्प भी है।
आने वाले वर्षों में यदि अन्य कृषि विश्वविद्यालय भी इसी मॉडल को अपनाते हैं, तो भारत में प्राकृतिक खेती को व्यापक गति मिलेगी, किसानों की आय बढ़ेगी, रसायनों पर निर्भरता घटेगी और टिकाऊ कृषि प्रणाली को मजबूत आधार मिलेगा। यह पहल निश्चित रूप से विकसित, आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल कृषि व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।

