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Home कृषि समाचार

जलवायु परिवर्तन के युग में बीजों की महत्ता

The importance of seeds in the era of climate change

Emran Khan by Emran Khan
September 19, 2026
in कृषि समाचार, लेख
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The importance of seeds in the era of climate change

The importance of seeds in the era of climate change

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जलवायु परिवर्तन के युग में बीजों की महत्ता

अभिषेक कुमार1, एस. के. सिंह1 ,शाम्भवी कुमारी1, साहिल कुमार2,  एस. के. सिंह2,  सरिता कुमारी3 और एम. के. सिंह1

1आनुवंशिकी और पादप प्रजनन विभाग; 2बीज विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग; 3कृषि जैवप्रौद्योगिकी एवं आणविक विज्ञान विभाग

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर, बिहार

 

परिचय: वर्तमान युग जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। वैश्विक तापमान में निरंतर वृद्धि अनियमित एवं अत्यधिक वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ मौसम के असंतुलन तथा भूमि की उर्वरता में गिरावट जैसी समस्याएँ सीधे तौर पर कृषि और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रही हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए हमारी पारंपरिक व आधुनिक कृषि प्रणालियों में पुनर्विचार एवं नवाचार की आवश्यकता है। इस परिप्रेक्ष्य में बीजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। बीज किसी भी फसल उत्पादन की नींव होते हैं। उच्च गुणवत्तायुक्त और जलवायु सहिष्णु बीज न केवल उत्पादन को बढ़ाता है अपितु बदलते पर्यावरणीय दबावों यथा अधिक तापमान, जल की कमी या रोगों के प्रति संवेदनशीलता आदि से लड़ने में भी सक्षम होता है। इसके अतिरिक्त बीज केवल एक कृषि उत्पाद नहीं है बल्कि सांस्कृतिक विरासत, जैव विविधता का संवाहक और खाद्य संप्रभुता का आधार भी है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हमें न केवल उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का विकास करना होगा बल्कि देशी बीजों और स्थानीय किस्मों के संरक्षण की दिशा में भी ठोस कदम उठाने होंगे क्योंकि ये किस्में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं और जलवायु प्रतिरोधक क्षमता रखती हैं। इस प्रकार बीजों की पहचान, संरक्षण, विकास और वितरण न केवल कृषि उत्पादन को सशक्त बनाते हैं बल्कि वे सतत विकास पर्यावरणीय संतुलन और आर्थिक सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य हो जाते हैं। अतः जलवायु परिवर्तन के इस युग में बीजों की महत्ता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

जलवायु परिवर्तन और इसकी चुनौतियाँ: जलवायु परिवर्तन का कृषि पर गहरा असर पड़ रहा है। जहाँ एक ओर वर्षा की असमानता, सूखा और बर्फबारी में बदलाव जैसे प्रभाव बढ़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बाढ़ और आँधियाँ समस्या उत्पन्न कर रही हैं। इस प्रकार के अनिश्चित मौसम से फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है एवं कृषि भूमि की गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही है जिससे भोजन की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।

बीजों की महत्ता: बीजों को कृषि की आत्मा और आधार कहा जाता है क्योंकि यही वह स्रोत हैं जिससे जीवन का चक्र, कृषि उत्पादन, भोजन की आपूर्ति और ग्रामीण जीवन का पोषण शुरू होता है। जलवायु परिवर्तन के वर्तमान परिदृश्य में बीजों की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। सूखा-सहिष्णु, लवण-सहिष्णु ,बाढ़-सहनशील और रोग-प्रतिरोधी बीजों का विकास और उपयोग अब एक आवश्यक रणनीति बन चुका है। ये बीज न केवल उपज को स्थिर बनाए रखते हैं बल्कि फसल की विफलता की संभावना को भी कम करते हैं।

बीजों के माध्यम से ही कृषि जैव विविधता को संरक्षित किया जा सकता है। भारत जैसे देश में जहाँ विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में पारंपरिक किस्में उगाई जाती थीं वहाँ इन किस्मों का संरक्षण बहुत जरूरी है। जैव विविधता हमें विभिन्न प्रकार की फसलों और उनकी उप-प्रजातियों का भंडार प्रदान करती है जिनमें जलवायु परिवर्तन से लड़ने की स्वाभाविक क्षमता होती है। बीज बैंक, सामुदायिक बीज भंडार और किसानों द्वारा पीढ़ियों से संजोए गए देसी बीज आज भी नई फसल सुधार परियोजनाओं के लिए एक अमूल्य स्रोत हैं। एक ही बीज या फसल को बार-बार उगाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है और कीट-रोगों की संख्या बढ़ जाती है। इसके विपरीत यदि किसानों को विभिन्न किस्मों और फसलों के बीज सुलभ हों तो वे फसल चक्र और मिश्रित खेती जैसे टिकाऊ खेती के तरीकों को अपना सकते हैं। ये पद्धतियाँ मिट्टी की संरचना और पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में सहायक होती हैं। साथ ही यह कृषि-पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में भी सहायक होती हैं।

जब किसान अपने बीजों का उत्पादन और संरक्षण स्वयं करते हैं तो वे बाहरी बाजार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बीज आपूर्ति पर निर्भर नहीं रहते। यह उन्हें बीज की कीमत, गुणवत्ता और उपलब्धता पर नियंत्रण देता है। इस आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय स्तर पर बीज उत्पादन, वितरण और विनिमय की व्यवस्था को प्रोत्साहित करना आवश्यक है। इसके साथ ही एक मजबूत बीज नीति जो देशी किस्मों को प्राथमिकता दे, किसानों के अधिकारों की रक्षा करे और बीजों के पेटेंट एवं निजीकरण पर संतुलित दृष्टिकोण रखे वह कृषि को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान कर सकती है।

बीज प्राकृतिक आपदाओं के बाद कृषि पुनर्निर्माण का पहला आधार होते हैं। सूखा, बाढ़, लवणीय भूमि या चरम तापमान जैसी स्थितियों में खेती को पुनः शुरू करने के लिए ऐसी किस्मों के बीजों की आवश्यकता होती है जो विशेष रूप से इन परिस्थितियों के अनुरूप विकसित किए गए हों।
उदाहरण के लिए सी.एस.आर-30 जैसे लवण सहनशील धान या अल्पकालिक किस्में जो छोटी अवधि में तैयार हो जाती हैं, संकट की घड़ी में किसानों की सहायता कर सकती हैं। बीज राहत कार्यक्रमों के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में त्वरित कृषि पुनःस्थापन संभव होता है।

जब किसान अपने बीजों को सहेजते, साझा करते और स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, तो यह एक स्थानीय बीज-आधारित अर्थव्यवस्था को जन्म देता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार, स्वावलंबन और सामाजिक सहयोग की भावना विकसित होती है। महिला किसान जो बीज संरक्षण में विशेष भूमिका निभाती हैं उन्हें इससे सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त होने का अवसर मिलता है।
यह प्रक्रिया किसानों को बीज उद्योग के एक उपभोक्ता के बजाय एक निर्माता और नवाचारकर्ता बनने की दिशा में ले जाती है।

बीज संरक्षण की चुनौतियाँ: बीज केवल फसल उत्पादन की शुरुआत नहीं करते बल्कि वे भविष्य की खाद्य सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और जैव विविधता के संरक्षण के भी आधार हैं। विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के दौर में बीजों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो गया है। लेकिन इस दिशा में कई प्रकार की चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। आधुनिक कृषि के साथ-साथ बीजों का व्यापार भी अत्यधिक व्यावसायिक और केंद्रीकृत हो गया है। कुछ चुनिंदा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर बीज व्यापार पर अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। ये कंपनियाँ प्रायः हाइब्रिड और जीएम बीजों का प्रचार करती हैं जिनका जीवन चक्र सीमित होता है और जिनसे किसान हर वर्ष नया बीज खरीदने को मजबूर होता है। ये बीज अक्सर एकल आनुवंशिक किस्मों पर आधारित होते हैं जिससे जैव विविधता घटती है। इनका उत्पादन और उपयोग रासायनिक उर्वरकों कीटनाशकों और सिंचाई पर अत्यधिक निर्भर होता है। इसके कारण किसान देसी बीजों से दूर हो जाते हैं जो पारिस्थितिक रूप से अधिक अनुकूल और कम लागत वाले होते हैं। इस व्यावसायीकरण ने पारंपरिक बीज संरक्षण प्रणालियों को कमजोर किया है और बीज आत्मनिर्भरता को खतरे में डाल दिया है।

जलवायु परिवर्तन का बीज गुणवत्ता पर प्रभाव: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं हैं यह बीजों की गुणवत्ता जीवनकाल और अंकुरण क्षमता को भी प्रभावित करता है। अत्यधिक गर्मी, असमय वर्षा, बर्फबारी या लंबे समय तक सूखा जैसी चरम मौसमीय परिस्थितियाँ बीजों के विकास, परिपक्वता और संग्रहण को सीधे प्रभावित करती हैं। इसके कारण बीजों का अंकुरण प्रतिशत घट सकता है। बदलते मौसम में फसल की फूल आने की अवधि और बीज पकने की प्रक्रिया भी बाधित होती है जिससे उत्पादन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए जलवायु-सहिष्णु बीजों की खोज और उन्हें सुरक्षित रखने की प्रक्रिया अब कहीं अधिक जटिल हो गई है।

आधुनिकीकरण और शहरीकरण की तेज़ गति के कारण कृषि योग्य भूमि का क्षेत्र तेजी से घट रहा है। औद्योगिक विकास, आवासीय निर्माण और सड़कों के लिए भूमि अधिग्रहण के कारण खेती के लिए जमीन कम हो रही है। इससे न केवल बीज उत्पादन की संभावनाएँ घटती हैं बल्कि बीज संरक्षण के लिए आवश्यक खेत-जैसे पुनरुत्पादन प्लॉट या स्थानीय बीज बैंक फॉर्म आदि का विकास भी रुक जाता है। भूमि की कमी के साथ-साथ जैविक संसाधनों की क्षति और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के विघटन से परंपरागत बीज किस्में विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं।

बीजों को दीर्घकाल तक संरक्षित रखने के लिए नियंत्रित तापमान, आर्द्रता, और प्रकाश रहित वातावरण की आवश्यकता होती है। लेकिन अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के पास कोल्ड स्टोरेज, सीलिंग पैकेजिंग या संवेदनशील स्टोरेज सिस्टम जैसी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होतीं। परिणामस्वरूप, बीज जल्दी नमी खींच लेते हैं और फफूंदी या कीटों से ग्रसित हो जाते हैं जिससे अंकुरण क्षमता में गिरावट आ जाती है। इसके साथ ही यदि बीजों को ठीक से सूखा या प्रसंस्कृत न किया जाए तो वे संग्रहण के दौरान बर्बाद हो सकते हैं। स्थानीय बीज भंडारण के लिए सरकार और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा सहयोग एवं प्रशिक्षण की अत्यधिक आवश्यकता है।

पारंपरिक बीज संरक्षण की विधियाँ जो कभी किसानों की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा थीं अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। वैज्ञानिक भंडारण की विधियों, बीज परीक्षण, अंकुरण परीक्षण और बीज उपचार तकनीकों की जानकारी की कमी से किसान स्वयं बीजों को संरक्षित नहीं कर पाते। गाँवों में बीज संरक्षण के लिए जागरूकता शिविर, प्रशिक्षण कार्यशालाएँ और तकनीकी सहायता की अनुपलब्धता एक बड़ी बाधा है। इसके साथ ही युवा पीढ़ी का खेती और पारंपरिक ज्ञान से दूरी बढ़ रही है जिससे पीढ़ियों से चले आ रहे बीज संरक्षण के अनुभव लुप्त हो रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि बीज संरक्षण सतत और सामुदायिक स्तर पर हो तो स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ना अनिवार्य है।

स्वदेशी बीज हजारों वर्षों से स्थानीय परिस्थितियों में ढलते आए हैं। ये जलवायु के उतार-चढ़ाव को बेहतर सहन करते हैं। रसायनों पर निर्भरता कम करते हैं और जैव विविधता को बनाए रखते हैं। इनका संरक्षण कृषक समुदायों की आत्मनिर्भरता, परंपरागत ज्ञान और स्थानीय खाद्य संस्कृति को भी सुरक्षित रखता है। इसके लिए ग्राम स्तरीय बीज बैंक की स्थापना, पारंपरिक बीज संग्रह और दस्तावेजीकरण एवं स्वदेशी बीज उपयोग के लिए सब्सिडी योजनाओं की आवश्यकता हैI जलवायु-अनुकूल खेती पद्धतियाँ जैसे जैविक खेती, शून्य बजट प्राकृतिक खेती और कृषि वानिकी बीजों की भूमिका को सशक्त बनाती हैं। ये पद्धतियाँ मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने के साथ साथ कार्बन उत्सर्जन कम करती हैं और मौसम की चरम घटनाओं के प्रति फसल को सहनशील बनाती हैं I

उन्नत जैव प्रौद्योगिकियों और जीन-संपादन तकनीकों का प्रयोग: क्रिस्पर कैस जैसी उन्नत तकनीकों की मदद से ऐसे बीज विकसित किए जा सकते हैं जो जलवायु चुनौतियों को सहन कर सकें। कुछ फसलों में ऐसी तकनीकों का प्रयोग करके विभिन्न प्रकार के गुण वाले प्रभेदों का विकास किया गया जो निम्न हैं I

लक्ष्य        फसल तकनीक और परिणाम
सूखा सहिष्णुता मक्का (AREB1 जीन) गहरी जड़ प्रणाली, 20–30% अधिक उपज
बाढ़ प्रतिरोध धान (SUB1A जीन, स्वर्णा-सब1) बाढ़ में जीवित रहने की क्षमता, स्थिर उपज
लवणीयता सहिष्णुता गेहूँ (HKT1 जीन) खारी मिट्टी में 25% अधिक उत्पादन
रोग प्रतिरोध आलू (GBSS जीन, लेट ब्लाइट) रोग प्रतिरोधकता बढ़ी, कीटनाशक उपयोग घटा
ताप सहिष्णुता टमाटर (HSP जीन) 40°C पर भी फूल और फल संभव
पोषण संवर्धन केला (LCYε जीन) विटामिन-A वृद्धि, कुपोषण नियंत्रण

 

भविष्य में पारंपरिक, स्वदेशी और जलवायु-अनुकूल बीजों के प्रयोग को नीतिगत प्राथमिकता दिए जाने की आवश्यकता है I बीज पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकार के प्रावधानों को इस तरह संतुलित किये जाने की जरुरत है जिससे किसानों की बीज सहेजने और साझा करने की स्वतंत्रता बनी रहे I इसी प्रकार मूल्य नियंत्रण, प्रमाणन प्रणाली और वितरण तंत्र पारदर्शी बनाए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है I बीज बैंक बीजों की दीर्घकालिक सुरक्षा और आपदा स्थिति में आपूर्ति के लिए जरूरी हैं। पंचायत या ब्लॉक स्तर पर सामुदायिक बीज बैंक, किसान समूहों द्वारा बीज संरक्षण आदि की व्यवस्था से स्थिति बेहतर होगी I ग्रामीण क्षेत्रों में बीज उत्सव, बीज हाट या मेले आयोजित किए जाने से किसान आपस में बीज साझा कर सकते हैं जिससे बीज विविधता का प्रचार होता है I ऐसे कार्यक्रमों में पारंपरिक ज्ञान, नए शोध और उन्नत किस्मों के प्रदर्शन के साथ किसानों को यह भी सिखाना चाहिए कि कैसे वे बीज की शुद्धता और अंकुरण की पहचान करें, संवेदनशील बीजों का भंडारण करें तथा जलवायु के अनुसार उपयुक्त बीजों का चयन करें I महिलाएँ परंपरागत रूप से बीज संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाती रही हैं। उन्हें संगठित रूप से बीज उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन में जोड़ने तथा महिला स्वयं सहायता समूह के माध्यम से बीज बैंक संचालन से महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ सामाजिक भागीदारी भी बढ़ेगी I

डिजिटल बीज डेटाबेस और ट्रैकिंग प्रणाली: साथी पोर्टल जैसी केंद्रीकृत डिजिटल बीज पोर्टल से बीज की किस्म, क्षेत्रीय उपयुक्तता, जलवायु सहनशीलता, पोषण मूल्य आदि की जानकारी संभव हो सकी है I किसान कोड या मोबाइल एप से बीज की शुद्धता व स्रोत को ट्रैक करने के लिए ब्लॉक चेन टेक्नोलॉजी आदि का उपयोग किया जा रहा है I

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अनुसंधान: जलवायु-सहिष्णु बीजों पर वैश्विक स्तर पर साझा अनुसंधान किये जा रहे हैं जिसमें भारतीय कृषि शोध जगत सी.जी.आई.ए.आर, आई.आर.आर.आई, सी.आई.एम्.एम्.वाई.टी आदि जैसे संस्थानों के साथ मिलकर बीज विविधता, संरक्षण तकनीक और डेटा साझाकरण पर कार्य कर रहा है I

निष्कर्ष: बीज केवल खेती का आरंभ नहीं, बल्कि हमारे भविष्य का बीज हैं। जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए हमें पारंपरिक ज्ञान, आधुनिक विज्ञान,और नीतिगत समर्थन को एक साथ मिलाकर चलना होगा। जब प्रौद्योगिकी, समुदाय और नीति साथ मिलकर बीजों को बचाएंगे तभी हम खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता को सुनिश्चित कर पाएंगे।

चित्र : अनाज, तिलहन और दलहनी फसल के स्वस्थ बीज अंकुरण का चित्रांकन

Tags: AgricultureArticleFarmingNews
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