केंद्र सरकार देश की तीन प्रमुख यूरिया उत्पादन इकाइयों की फिक्स्ड कॉस्ट की समीक्षा करने पर विचार कर रही है। इसका उद्देश्य इन संयंत्रों को अन्य यूरिया उत्पादक इकाइयों के बराबर लाना और लंबे समय से चली आ रही लागत संबंधी असमानता को दूर करना है। जिन तीन इकाइयों की लागत की समीक्षा की जा सकती है, उनमें नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) की विजयपुर इकाई, राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (RCF) का महाराष्ट्र स्थित थल संयंत्र और कृभको (KRIBHCO) का गुजरात स्थित हजीरा संयंत्र शामिल हैं।
उर्वरक उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इन संयंत्रों को वर्तमान में मिलने वाली फिक्स्ड कॉस्ट की दर कुछ अन्य यूरिया इकाइयों की तुलना में काफी कम है। कुछ संयंत्रों के लिए यह दर 1,285 से 1,635 रुपये प्रति टन के बीच बताई गई है। वहीं, पहले अधिकांश यूरिया इकाइयों के लिए न्यूनतम 2,300 रुपये प्रति टन की फिक्स्ड कॉस्ट का प्रावधान था। हालांकि, सरकार ने मार्च 2020 में इस न्यूनतम लागत से संबंधित प्रावधान को हटाने की मंजूरी दे दी थी।
ऐसे में सरकार की संभावित समीक्षा को यूरिया उद्योग की लंबे समय से चली आ रही लागत संबंधी मांगों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि फिक्स्ड कॉस्ट में संशोधन होता है, तो संबंधित संयंत्रों को अपने परिचालन खर्च की भरपाई में राहत मिल सकती है।
क्या होती है यूरिया उत्पादन की फिक्स्ड कॉस्ट?
यूरिया उत्पादन करने वाली इकाइयों को केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित व्यवस्था के तहत उत्पादन से संबंधित लागत की भरपाई की जाती है। इसमें फिक्स्ड कॉस्ट एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका उद्देश्य संयंत्रों के उन नियमित खर्चों को पूरा करने में सहायता देना है, जो यूरिया के उत्पादन और इकाई के संचालन के लिए जरूरी होते हैं।
फिक्स्ड कॉस्ट में कर्मचारियों के वेतन और मजदूरी, मशीनों की मरम्मत, रखरखाव, बिक्री से जुड़े खर्च और ठेका श्रमिकों पर होने वाला व्यय शामिल होता है। किसी यूरिया संयंत्र को लंबे समय तक सुरक्षित और सुचारु रूप से चलाने के लिए इन खर्चों को पूरा करना जरूरी होता है।
यदि किसी संयंत्र को निर्धारित व्यवस्था के तहत मिलने वाली राशि उसके वास्तविक परिचालन खर्च की तुलना में कम पड़ती है, तो कंपनी को लागत की पूरी भरपाई नहीं हो पाती। उद्योग जगत का कहना है कि कई यूरिया उत्पादक इकाइयां वर्षों से ऐसी स्थिति का सामना कर रही हैं।
पुरानी लागत के आधार पर तय हुई थीं दरें
उर्वरक उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार, फिक्स्ड कॉस्ट की मौजूदा व्यवस्था में एक बड़ी समस्या यह रही है कि इसकी गणना के लिए पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। न्यू प्राइसिंग स्कीम यानी नई मूल्य निर्धारण योजना के पहले और दूसरे चरण (NPS-I और NPS-II) में वर्ष 1999-2000 के लागत आंकड़ों को आधार बनाया गया था। वहीं, NPS-III के लिए वर्ष 2002-03 को आधार वर्ष माना गया।
इसके बाद समय के साथ कर्मचारियों के वेतन, मरम्मत, रखरखाव और अन्य परिचालन खर्चों में बढ़ोतरी हुई। इसके अलावा, संयंत्रों में किए गए नए निवेश और तकनीकी बदलावों से जुड़ी लागत भी बढ़ी। लेकिन उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि फिक्स्ड कॉस्ट तय करने वाली व्यवस्था इन बढ़ते खर्चों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं कर सकी।
उद्योग की ओर से सरकार के सामने कई बार यह मुद्दा उठाया गया कि पुरानी लागत के आधार पर निर्धारित दरों से वर्तमान परिचालन खर्चों की भरपाई करना मुश्किल हो रहा है। इसके बावजूद संबंधित मूल्य निर्धारण योजनाओं के दौरान फिक्स्ड कॉस्ट में व्यापक संशोधन नहीं हुआ।
वर्ष 2014 में सरकार ने दिया था अतिरिक्त लाभ
फिक्स्ड कॉस्ट से जुड़ी समस्याओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2 अप्रैल 2014 को संशोधित NPS-III को अधिसूचित किया था। इसके तहत सभी यूरिया उत्पादक इकाइयों को बढ़े हुए परिचालन खर्चों की भरपाई के लिए 350 रुपये प्रति टन की अतिरिक्त फिक्स्ड कॉस्ट देने का प्रावधान किया गया।
इसके साथ ही न्यूनतम 2,300 रुपये प्रति टन या वर्ष 2012-13 में लागू वास्तविक फिक्स्ड कॉस्ट, दोनों में से जो कम हो, उसके आधार पर भुगतान की व्यवस्था की गई थी। इसमें अतिरिक्त राशि को भी ध्यान में रखा गया था।
इसके अतिरिक्त, 30 वर्ष का संचालन पूरा कर चुकी 11 यूरिया इकाइयों को 150 रुपये प्रति टन का विशेष मुआवजा देने का प्रावधान भी किया गया था। इस व्यवस्था का उद्देश्य पुरानी इकाइयों पर पड़ने वाले अतिरिक्त परिचालन खर्च के बोझ को कुछ हद तक कम करना था।
हालांकि, मार्च 2020 में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने 2,300 रुपये प्रति टन की न्यूनतम फिक्स्ड कॉस्ट से संबंधित प्रावधान को हटाने की मंजूरी दे दी। इससे इस मामले में पहले लागू न्यूनतम दर की व्यवस्था समाप्त हो गई।
तीन संयंत्रों की लागत में अंतर क्यों बना मुद्दा?
NFL की विजयपुर इकाई, RCF के थल संयंत्र और कृभको के हजीरा संयंत्र की फिक्स्ड कॉस्ट अन्य इकाइयों की तुलना में कम होने का मुद्दा अब सरकार के विचाराधीन बताया जा रहा है। उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, इन इकाइयों के लिए लागू दरों और दूसरी इकाइयों को मिलने वाली राशि के बीच अंतर काफी अधिक है।
जहां कुछ संयंत्रों की फिक्स्ड कॉस्ट 1,285 से 1,635 रुपये प्रति टन के दायरे में बताई गई है, वहीं दूसरी इकाइयों के लिए 2,300 रुपये प्रति टन की दर का उल्लेख किया जाता रहा है। हालांकि, मार्च 2020 में न्यूनतम दर का प्रावधान हटाए जाने के कारण वर्तमान भुगतान की वास्तविक स्थिति संबंधित इकाई और लागू नियमों के अनुसार देखी जानी चाहिए।
सरकार की संभावित समीक्षा का प्रमुख उद्देश्य इस अंतर का आकलन करना और यह देखना हो सकता है कि संबंधित इकाइयों के परिचालन खर्चों की भरपाई के लिए मौजूदा दरें पर्याप्त हैं या नहीं। फिलहाल, उपलब्ध जानकारी के अनुसार समीक्षा पर विचार किए जाने की बात सामने आई है। अंतिम निर्णय, संशोधित दर और इसे लागू करने की समयसीमा के बारे में कोई पुष्टि नहीं दी गई है।
पुरानी मशीनें और सुरक्षा भी बड़ी चिंता
यूरिया संयंत्रों की लागत का मुद्दा केवल वेतन, मरम्मत और रखरखाव तक सीमित नहीं है। पुराने संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाली मशीनों और तकनीक को लेकर भी चिंता जताई गई है।
सांसद अजीत माधवराव गोपछड़े ने इस संबंध में विभिन्न सरकारी एजेंसियों को कई पत्र लिखे हैं। उन्होंने तर्क दिया है कि कई यूरिया उत्पादन इकाइयों में मशीनें काफी पुरानी हो चुकी हैं और पुरानी तकनीक के कारण गंभीर दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ सकती है।
गोपछड़े के अनुसार, आम तौर पर यूरिया उत्पादन संयंत्र की उपयोगी परिचालन अवधि लगभग 30 वर्ष मानी जाती है, लेकिन कुछ इकाइयां 50 वर्ष से अधिक समय से चल रही हैं। ऐसी इकाइयों में मशीनों और तकनीक को बदलने की तत्काल जरूरत हो सकती है।
पुराने संयंत्रों में समय पर मरम्मत और रखरखाव महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही मशीनों के आधुनिकीकरण, सुरक्षा व्यवस्था में सुधार और जरूरत के अनुसार उपकरणों को बदलने पर भी ध्यान देना आवश्यक है। हालांकि, इन कामों के लिए कितनी राशि की जरूरत होगी, इसका आकलन संबंधित संयंत्र की तकनीकी स्थिति और निवेश योजना के आधार पर ही किया जा सकता है।
यूरिया उत्पादन और उर्वरक क्षेत्र पर क्या पड़ सकता है असर?
यदि सरकार फिक्स्ड कॉस्ट की समीक्षा के बाद संबंधित तीन इकाइयों की दरों में संशोधन करती है, तो इससे उन्हें परिचालन खर्चों की भरपाई में मदद मिल सकती है। इससे वेतन, मरम्मत, रखरखाव और ठेका श्रमिकों पर होने वाले खर्च का प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जा सकेगा।
इसके अलावा, पुरानी मशीनों के रखरखाव और संयंत्रों की सुरक्षा से जुड़े खर्चों पर भी ध्यान देने की जरूरत बनी रहेगी। हालांकि, फिक्स्ड कॉस्ट में संशोधन होने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि सभी संयंत्रों का आधुनिकीकरण अपने आप हो जाएगा। इसके लिए अलग निवेश, तकनीकी आकलन और संबंधित निर्णयों की आवश्यकता हो सकती है।
किसानों के लिहाज से भी यह विषय महत्वपूर्ण है, क्योंकि यूरिया देश की प्रमुख नाइट्रोजन उर्वरक जरूरतों को पूरा करता है। उत्पादन इकाइयों का सुचारु संचालन घरेलू आपूर्ति व्यवस्था के लिए अहम है। फिर भी, फिक्स्ड कॉस्ट की समीक्षा का सीधा असर यूरिया की खुदरा कीमत पर पड़ेगा या नहीं, यह सरकार की भुगतान व्यवस्था और आगे लिए जाने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर, तीन यूरिया संयंत्रों की फिक्स्ड कॉस्ट की संभावित समीक्षा उद्योग की पुरानी मांगों, बढ़ते परिचालन खर्च और संयंत्रों की तकनीकी स्थिति से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार समीक्षा को लेकर क्या निर्णय लेती है और क्या इसके बाद संबंधित इकाइयों की लागत संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाता है।
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