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Watermelon Farming से बढ़ेगी किसानों की कमाई: सही समय, लागत, सरकारी सहायता और मुनाफे की पूरी जानकारी

Watermelon Farming to Boost Farmers' Income: Complete Details on Timing, Costs, Government Support, and Profits

Fiza by Fiza
August 5, 2026
in योजना
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Watermelon Farming

Watermelon Farming

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देश के किसान अब गेहूं, धान और अन्य परंपरागत फसलों के साथ कम समय में तैयार होने वाली बागवानी फसलों की ओर भी तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसी ही एक फसल तरबूज है, जिसकी गर्मियों के मौसम में बाजार में भारी मांग रहती है। उचित तकनीक, सही समय पर बुआई और बेहतर बाजार व्यवस्था के साथ Watermelon Farming किसानों के लिए अच्छी आमदनी का साधन बन सकती है।

तरबूज की फसल सामान्यतः 80 से 100 दिनों में तैयार हो जाती है। इस कारण किसान एक ही कृषि वर्ष में अन्य फसलों के साथ इसका उत्पादन कर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। कम अवधि, बाजार में लगातार मांग और अच्छा उत्पादन मिलने के कारण तरबूज की खेती को Profitable Farming के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, तरबूज की खेती से होने वाला लाभ कई बातों पर निर्भर करता है। इनमें बीज की गुणवत्ता, मौसम, मिट्टी, सिंचाई, फसल प्रबंधन, उत्पादन लागत, स्थानीय बाजार भाव और परिवहन खर्च प्रमुख हैं। इसलिए किसानों को खेती शुरू करने से पहले तकनीकी जानकारी और बाजार की स्थिति को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

तरबूज की खेती किन राज्यों में होती है?

भारत के कई राज्यों में तरबूज की व्यावसायिक खेती की जाती है। गर्म और शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में इसकी पैदावार बेहतर मानी जाती है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, बिहार, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के किसान बड़े पैमाने पर तरबूज का उत्पादन करते हैं।

नदियों के किनारे स्थित रेतीली जमीन में भी तरबूज की खेती सफलतापूर्वक की जाती है। कई क्षेत्रों में किसान नदी का जलस्तर कम होने के बाद खाली पड़ी रेतीली भूमि पर तरबूज उगाते हैं। ऐसी जमीन में जल निकासी अच्छी रहती है, जो इस फसल के लिए लाभदायक होती है।

राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में गर्म वातावरण के कारण तरबूज की फसल अच्छी होती है। वहीं दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में अनुकूल तापमान होने के कारण इसकी खेती अलग-अलग मौसम में भी की जा सकती है।

तरबूज की खेती के लिए कैसी जलवायु चाहिए?

तरबूज गर्म मौसम की फसल है। इसके पौधों के विकास और फलों की मिठास के लिए पर्याप्त धूप जरूरी होती है। फसल के लिए लगभग 22 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। बीजों के अच्छे अंकुरण के लिए 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर रहता है।

अधिक वर्षा और खेत में पानी का ठहराव तरबूज की फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। जलभराव होने से पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं और फफूंद से संबंधित रोग फैलने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए किसानों को ऐसी जमीन का चयन करना चाहिए, जहां अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल सके। फलों के विकास के दौरान गर्म और सूखा मौसम उनकी गुणवत्ता और मिठास बढ़ाने में सहायक होता है। लगातार बादल रहने या अधिक नमी होने से रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है।

कौन-सी मिट्टी है सबसे बेहतर?

तरबूज की खेती के लिए बलुई दोमट, रेतीली दोमट और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ होने चाहिए। खेत में पानी रुकने की समस्या नहीं होनी चाहिए।

मिट्टी का पीएच मान सामान्यतः 6.0 से 7.5 के बीच बेहतर माना जाता है। बुआई से पहले मिट्टी की जांच कराने से किसानों को पोषक तत्वों की वास्तविक स्थिति की जानकारी मिल सकती है। इसके आधार पर खाद और उर्वरकों की सही मात्रा तय की जा सकती है।

मिट्टी परीक्षण से अनावश्यक उर्वरक खर्च कम होता है और पौधों को संतुलित पोषण मिलता है। यह तरीका उत्पादन बढ़ाने के साथ लागत कम करने में भी मदद करता है।

तरबूज की बुआई का सही समय क्या है?

तरबूज की बुआई का समय क्षेत्र की जलवायु और तापमान पर निर्भर करता है। उत्तर भारत में सामान्यतः जनवरी से मार्च के बीच इसकी बुआई की जाती है। मध्य भारत में दिसंबर से फरवरी और दक्षिण भारत में नवंबर से जनवरी के बीच बुआई की जा सकती है।

नदी किनारे की रेतीली जमीन पर खेती करने वाले किसान आमतौर पर दिसंबर से फरवरी के दौरान बीज लगाते हैं। कुछ क्षेत्रों में किसान पौध तैयार करके रोपाई भी करते हैं, जिससे फसल जल्दी तैयार हो सकती है।

बहुत अधिक ठंड में बीजों का अंकुरण प्रभावित हो सकता है। इसी तरह अत्यधिक गर्मी शुरू होने के बाद देर से बुआई करने पर पौधों और फलों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है। किसानों को स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या उद्यान विभाग से अपने जिले के अनुसार बुआई का सही समय पता करना चाहिए।

खेत की तैयारी कैसे करें?

तरबूज की बेहतर फसल के लिए खेत को अच्छी तरह तैयार करना जरूरी है। सबसे पहले खेत की दो से तीन बार जुताई करनी चाहिए। इसके बाद मिट्टी को भुरभुरा बनाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए।

खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ लगभग 8 से 10 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाई जा सकती है। इससे मिट्टी की उर्वरता, जल धारण क्षमता और जैविक गतिविधियां बेहतर होती हैं।

तरबूज की बुआई सामान्यतः उठी हुई क्यारियों या मेड़ों पर की जाती है। इससे जड़ों के आसपास पानी जमा नहीं होता। ड्रिप सिंचाई और प्लास्टिक मल्चिंग लगाने की योजना हो तो पाइप और मल्च की व्यवस्था बुआई से पहले करनी चाहिए।

बीज का चयन और बीज दर

अच्छे उत्पादन के लिए प्रमाणित, रोगमुक्त और क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल बीज का चयन करना चाहिए। बाजार में सामान्य और हाइब्रिड दोनों प्रकार की किस्में उपलब्ध हैं। हाइब्रिड किस्में कई बार अधिक उत्पादन और एक समान आकार के फल दे सकती हैं, लेकिन इनके बीज अपेक्षाकृत महंगे होते हैं।

एक एकड़ खेत के लिए लगभग 800 ग्राम से 1.2 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ सकती है। वास्तविक बीज दर किस्म, अंकुरण क्षमता और बुआई की दूरी पर निर्भर करती है।

बुआई से पहले बीज उपचार करने से शुरुआती रोगों से सुरक्षा मिल सकती है। इसके लिए कृषि विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित जैविक या फफूंदनाशी उपचार अपनाना चाहिए। किसी भी रासायनिक उत्पाद का उपयोग लेबल और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।

बुआई की सही विधि

तरबूज की बुआई मेड़ों या उठी हुई क्यारियों पर की जाती है। सामान्यतः कतार से कतार के बीच 2.5 से 3 मीटर और पौधे से पौधे के बीच 60 से 90 सेंटीमीटर की दूरी रखी जा सकती है।

बीजों को लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए। बहुत अधिक गहराई पर बीज लगाने से अंकुरण में समस्या हो सकती है। एक स्थान पर दो से तीन बीज लगाने के बाद स्वस्थ पौधा छोड़कर कमजोर पौधों को हटाया जा सकता है।

बुआई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए। खेत में नमी बनी रहनी चाहिए, लेकिन पानी जमा नहीं होना चाहिए।

सिंचाई प्रबंधन

तरबूज की खेती में सिंचाई का विशेष महत्व है। पौधों की शुरुआती अवस्था, फूल आने और फल बनने के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। पानी की कमी होने पर फूल और छोटे फल गिर सकते हैं।

अत्यधिक सिंचाई भी नुकसानदायक हो सकती है। इससे फलों के फटने, रोग बढ़ने और गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा रहता है। सिंचाई का अंतर मिट्टी के प्रकार, तापमान और पौधों की अवस्था के अनुसार तय किया जाना चाहिए।

ड्रिप सिंचाई से पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है। इससे पानी की बचत होती है और खेत में अनावश्यक नमी नहीं बढ़ती। ड्रिप के माध्यम से घुलनशील उर्वरक भी दिए जा सकते हैं। आधुनिक Watermelon Farming में ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग का उपयोग उत्पादन तथा गुणवत्ता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

फसल की कटाई से कुछ दिन पहले सिंचाई कम करने से कई परिस्थितियों में फलों की मिठास और भंडारण क्षमता बेहतर हो सकती है। हालांकि इसका निर्णय मिट्टी की नमी और स्थानीय मौसम को देखकर करना चाहिए।

खाद और उर्वरक प्रबंधन

तरबूज की फसल को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश सहित कई सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। खाद और उर्वरक की मात्रा मिट्टी परीक्षण के आधार पर तय करना सबसे बेहतर है।

नाइट्रोजन पौधों की बढ़वार में मदद करती है, जबकि फास्फोरस जड़ों और फूलों के विकास के लिए जरूरी होता है। पोटाश फलों की गुणवत्ता, आकार और मिठास बेहतर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अधिक मात्रा में नाइट्रोजन देने से बेलों की बढ़वार तो तेज हो सकती है, लेकिन फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए संतुलित पोषण जरूरी है। किसान गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, नीम खली और अनुशंसित रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग कर सकते हैं।

मल्चिंग से क्या लाभ होता है?

तरबूज की खेती में प्लास्टिक या जैविक मल्च का उपयोग लाभकारी हो सकता है। मल्च लगाने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं।

मल्च फलों को सीधे मिट्टी के संपर्क में आने से भी बचाता है। इससे फलों के सड़ने, दाग लगने और कुछ रोगों का खतरा कम हो सकता है। तापमान नियंत्रण और पानी की बचत के कारण मल्चिंग को Profitable Farming की महत्वपूर्ण तकनीक माना जाता है।

प्लास्टिक मल्च का उपयोग करते समय उसके उचित निपटान की व्यवस्था करना भी जरूरी है, ताकि खेत और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे।

प्रमुख कीट और रोग

तरबूज की फसल में फल मक्खी, माहू, सफेद मक्खी और लाल कद्दू भृंग जैसे कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। फल मक्खी फलों की गुणवत्ता खराब कर सकती है, जबकि रस चूसने वाले कीट पौधों को कमजोर करने के साथ वायरस रोग फैलाने का कारण बन सकते हैं।

कीट नियंत्रण के लिए खेत की नियमित निगरानी करनी चाहिए। प्रभावित फल और पौधों के हिस्सों को खेत से हटाना चाहिए। पीले चिपचिपे ट्रैप, फेरोमोन ट्रैप और अन्य जैविक उपायों का उपयोग किया जा सकता है।

पाउडरी मिल्ड्यू, डाउनी मिल्ड्यू और जड़ सड़न जैसे रोग भी तरबूज की फसल को प्रभावित कर सकते हैं। उचित दूरी, संतुलित सिंचाई, जल निकासी और फसल चक्र अपनाकर रोगों का खतरा कम किया जा सकता है।कीटनाशक या फफूंदनाशक का उपयोग केवल आवश्यकता होने पर और कृषि विशेषज्ञ की सलाह से करना चाहिए। फसल कटाई से पहले निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का पालन करना आवश्यक है।

तरबूज की कटाई कब करें?

तरबूज की फसल किस्म और मौसम के अनुसार लगभग 80 से 100 दिनों में तैयार हो सकती है। फल की परिपक्वता पहचानने के लिए कई संकेतों का उपयोग किया जाता है।

फल के पास वाली बेल या टेंड्रिल सूखने लगे, जमीन से लगा फल का भाग हल्के पीले रंग का हो जाए और फल की बाहरी चमक में बदलाव दिखाई दे, तो फल कटाई के लिए तैयार हो सकता है। फल को थपथपाने पर आने वाली आवाज से भी परिपक्वता का अनुमान लगाया जाता है, लेकिन केवल इसी संकेत पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

दूर की मंडी में भेजे जाने वाले फलों की कटाई स्थानीय बिक्री वाले फलों की तुलना में थोड़ा पहले की जा सकती है। कटाई के समय फल को गिराने या चोट पहुंचाने से बचाना चाहिए।

प्रति एकड़ कितना उत्पादन मिल सकता है?

तरबूज की उपज किस्म, मिट्टी, मौसम, सिंचाई और फसल प्रबंधन पर निर्भर करती है। उचित देखभाल और अनुकूल परिस्थितियों में एक एकड़ से लगभग 18 से 30 टन तक उत्पादन मिलने की संभावना हो सकती है।

हाइब्रिड किस्मों, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और संतुलित पोषण के माध्यम से कुछ किसान इससे अधिक उत्पादन भी प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि किसी निश्चित उत्पादन की गारंटी नहीं दी जा सकती, क्योंकि प्राकृतिक परिस्थितियां और रोग-कीट फसल पर प्रभाव डाल सकते हैं।

तरबूज की खेती में कितना मुनाफा हो सकता है?

तरबूज की खेती पर प्रति एकड़ लगभग 50,000 से 80,000 रुपये या इससे अधिक खर्च हो सकता है। लागत में बीज, खेत की तैयारी, खाद, उर्वरक, सिंचाई, मल्चिंग, श्रम, कीट प्रबंधन, कटाई और परिवहन शामिल होते हैं।

मान लीजिए किसान को एक एकड़ से 20 टन उत्पादन मिलता है और औसत बिक्री मूल्य 12 रुपये प्रति किलोग्राम रहता है। इस स्थिति में सकल आय लगभग 2.40 लाख रुपये हो सकती है। यदि कुल लागत 70,000 रुपये है, तो किसान को लगभग 1.70 लाख रुपये का अंतर प्राप्त हो सकता है।

लेकिन यह पूरा अंतर शुद्ध लाभ नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि मंडी शुल्क, खराब फल, छंटाई, पैकिंग, परिवहन और अन्य खर्च भी हो सकते हैं। इसी प्रकार बाजार मूल्य कम होने पर लाभ घट सकता है। अधिक मांग और बेहतर कीमत मिलने पर कमाई बढ़ सकती है।

इसलिए Profitable Farming के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। सही समय पर बाजार में फसल पहुंचाना, खरीदारों से पहले संपर्क करना और परिवहन लागत कम करना भी जरूरी है।

सरकारी सहायता के लिए किसान कैसे आवेदन करें?

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बागवानी, ड्रिप सिंचाई, सूक्ष्म सिंचाई, मल्चिंग, कृषि यंत्र और जल प्रबंधन से संबंधित विभिन्न योजनाएं चलाई जाती हैं। इन योजनाओं के अंतर्गत पात्र किसानों को Government Subsidy मिल सकती है।

सब्सिडी की राशि, पात्रता और आवेदन प्रक्रिया प्रत्येक राज्य में अलग हो सकती है। किसानों को अपने राज्य के कृषि विभाग, उद्यान विभाग या आधिकारिक कृषि पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी देखनी चाहिए।

आवेदन के लिए सामान्यतः आधार कार्ड, बैंक खाते की जानकारी, भूमि रिकॉर्ड, पासपोर्ट आकार का फोटो, मोबाइल नंबर और अन्य निर्धारित दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। कुछ योजनाओं में पहले ऑनलाइन पंजीकरण करना होता है, जबकि कुछ के लिए जिला उद्यान कार्यालय में आवेदन जमा किया जाता है।

किसानों को निम्न स्थानों से सहायता मिल सकती है:

  1. जिला कृषि या उद्यान विभाग कार्यालय
  2. नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र
  3. ब्लॉक स्तर का कृषि कार्यालय
  4. राज्य का आधिकारिक कृषि पोर्टल
  5. अधिकृत कॉमन सर्विस सेंटर

किसी एजेंट या अनधिकृत वेबसाइट को पैसे देने से पहले योजना की जानकारी सरकारी पोर्टल या विभागीय कार्यालय से सत्यापित करनी चाहिए। Government Subsidy का लाभ केवल पात्रता और उपलब्ध बजट के आधार पर मिलता है।

बाजार की तैयारी पहले से करें

तरबूज जल्दी खराब होने वाली फसल है। इसलिए बुआई से पहले बाजार की योजना बनाना जरूरी है। किसान स्थानीय मंडी, फल विक्रेता, होटल, जूस की दुकान, सुपरमार्केट और थोक व्यापारियों से संपर्क कर सकते हैं।

एक ही समय पर बड़ी मात्रा में तरबूज बाजार में आने से कीमतें गिर सकती हैं। किसान अलग-अलग तारीखों पर बुआई करके चरणबद्ध उत्पादन ले सकते हैं। इससे पूरी फसल एक साथ बाजार में नहीं आएगी।

फलों की ग्रेडिंग करके छोटे, मध्यम और बड़े आकार के फलों को अलग बेचना भी फायदेमंद हो सकता है। साफ और बिना चोट वाले फल खरीदारों को अधिक पसंद आते हैं।

सफल खेती के लिए जरूरी सावधानियां

किसानों को प्रमाणित बीज का उपयोग करना चाहिए और बुआई से पहले मिट्टी परीक्षण कराना चाहिए। खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। सिंचाई जरूरत के अनुसार करें और बेलों के आसपास पानी जमा न होने दें।

फसल की नियमित निगरानी से रोग और कीट का शुरुआती स्तर पर पता लगाया जा सकता है। इससे नियंत्रण की लागत कम होती है और नुकसान बढ़ने से रोका जा सकता है।

बाजार भाव की जानकारी लगातार लेते रहें। केवल एक व्यापारी पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग खरीदारों से संपर्क करना बेहतर हो सकता है।

निष्कर्ष

तरबूज की खेती किसानों के लिए कम अवधि में आमदनी देने वाली महत्वपूर्ण बागवानी फसल हो सकती है। गर्मियों में इसकी मांग अधिक रहने के कारण किसानों को बेहतर बाजार मिलने की संभावना रहती है।

सही समय पर बुआई, प्रमाणित बीज, संतुलित पोषण, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और प्रभावी रोग-कीट प्रबंधन के माध्यम से Watermelon Farming को सफल बनाया जा सकता है। बेहतर उत्पादन के साथ बाजार की सही योजना होने पर यह फसल Profitable Farming का मजबूत विकल्प बन सकती है।

सरकार की सूक्ष्म सिंचाई और बागवानी योजनाओं के तहत मिलने वाली Government Subsidy किसानों की शुरुआती लागत कम करने में मदद कर सकती है। हालांकि आवेदन से पहले योजना की पात्रता, नियम और अंतिम तारीख की जानकारी संबंधित राज्य के आधिकारिक कृषि या उद्यान विभाग से जरूर जांचनी चाहिए।

Tags: government subsidyprofitable farmingwatermelon farming
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