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Home कृषि समाचार

गोवा के रामसर स्थल नंदा झील में वेटलैंड संरक्षण पर कार्यशाला, 110 हितधारकों ने लिया हिस्सा

Workshop on wetland conservation in Goa's Ramsar site Nanda Lake, 110 stakeholders participated

Emran Khan by Emran Khan
August 10, 2026
in कृषि समाचार, पशुपालन
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कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण पहल

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण पहल

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गोवा के महत्वपूर्ण रामसर स्थल नंदा झील में आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स के पारिस्थितिकी तंत्र और उनसे मिलने वाली सेवाओं को लेकर एक दिवसीय फील्ड-लेवल कार्यशाला का आयोजन किया गया। गोवा स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी (GSWA) ने आईसीएआर–सेंट्रल कोस्टल एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (ICAR-CCARI), गोवा के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, वैज्ञानिकों, स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों को आर्द्रभूमियों के पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व के बारे में जागरूक करना था।

कार्यशाला में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल जैव विविधता बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कृषि, मत्स्य पालन, जल संसाधन, स्थानीय आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी सीधे जुड़ा हुआ है। कार्यक्रम के दौरान नंदा झील के संरक्षण और इसके संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के लिए समुदाय आधारित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई।

जनप्रतिनिधियों और वैज्ञानिकों ने लिया हिस्सा

कार्यक्रम में कर्चोरेम विधानसभा क्षेत्र के विधायक निलेश काबराल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। आईसीएआर-सीसीएआरआई के निदेशक डॉ. परवीन कुमार ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भाग लिया, जबकि पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किसान संजय अनंत पाटिल विशेष अतिथि रहे।

गोवा स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी के सदस्य सचिव डॉ. प्रदीप सरमोकरदम भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। इसके अलावा वार्ड पार्षद विश्वास सावंत देसाई, शेल्डेम की सरपंच कविता गौंस देसाई और कर्चोरेम-काकोरा नगर परिषद के प्रशासक सहित कई स्थानीय प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में भाग लिया।

इस व्यापक भागीदारी ने यह संदेश दिया कि आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें स्थानीय प्रशासन, किसान, मछुआरे, विद्यार्थी, शिक्षक, वैज्ञानिक और स्थानीय समुदाय सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

रामसर स्थलों के संरक्षण पर जोर

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विधायक निलेश काबराल ने आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वेटलैंड्स जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं।

रामसर स्थल अंतरराष्ट्रीय महत्व वाली आर्द्रभूमियां होती हैं। इन क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के जलीय जीव, पक्षी, वनस्पतियां और अन्य जैविक संसाधन पाए जाते हैं। इसके अलावा ये क्षेत्र जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, मत्स्य पालन और स्थानीय समुदायों की आजीविका में भी योगदान देते हैं।

नंदा झील को रामसर स्थल का दर्जा प्राप्त होने के कारण इसका संरक्षण न केवल गोवा बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में झील के संरक्षण और इसके संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के लिए स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

छात्रों और किसानों को जोड़ने की अपील

आईसीएआर-सीसीएआरआई के निदेशक डॉ. परवीन कुमार ने रामसर कन्वेंशन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए विद्यार्थियों, शिक्षकों, किसानों और स्थानीय समुदायों से नंदा झील के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि आर्द्रभूमियों को केवल जल निकाय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, जहां जल, मिट्टी, वनस्पति, मछली, पक्षी और मानव गतिविधियां एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।

यदि इन क्षेत्रों का उपयोग वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीके से किया जाए तो इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए आय और रोजगार के अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं।

कार्यशाला में विद्यार्थियों और शिक्षकों की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि युवाओं को आर्द्रभूमि संरक्षण के बारे में जागरूक करने से भविष्य में इन प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए मजबूत सामुदायिक आधार तैयार किया जा सकता है।

जैव विविधता का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण जरूरी

गोवा स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी के सदस्य सचिव डॉ. प्रदीप सरमोकरदम ने आर्द्रभूमियों की जैव विविधता और उनसे मिलने वाली पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि किसी भी वेटलैंड के प्रभावी प्रबंधन के लिए यह समझना जरूरी है कि वहां कौन-कौन से जैविक संसाधन मौजूद हैं और स्थानीय समुदायों को उनसे किस प्रकार की पारिस्थितिकी एवं आर्थिक सेवाएं मिल रही हैं।

वेटलैंड्स में मौजूद वनस्पतियों, मछलियों, पक्षियों और अन्य जीवों का वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार करने से संरक्षण की प्राथमिकताएं तय करने में मदद मिल सकती है।

इसी तरह जल उपलब्धता, मत्स्य संसाधन, कृषि से जुड़ी गतिविधियां और स्थानीय आजीविका पर आर्द्रभूमि के प्रभाव का अध्ययन करके एकीकृत वेटलैंड प्रबंधन योजना तैयार की जा सकती है।

पौधारोपण के साथ शुरू हुआ तकनीकी कार्यक्रम

कार्यशाला के तकनीकी सत्र की शुरुआत पौधारोपण गतिविधि से हुई। इसका उद्देश्य प्रतिभागियों को पर्यावरण संरक्षण से सीधे जोड़ना और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देना था।

इसके बाद आईसीएआर-सीसीएआरआई द्वारा विकसित विभिन्न तकनीकों और नवाचारों की प्रदर्शनी लगाई गई। प्रदर्शनी में कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन से संबंधित तकनीकों एवं उत्पादों को प्रदर्शित किया गया।

गोवा स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड द्वारा विकसित उत्पादों को भी प्रदर्शनी में शामिल किया गया।

इस प्रदर्शनी के माध्यम से किसानों और अन्य हितधारकों को वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों की जानकारी दी गई और उन्हें स्थानीय परिस्थितियों में अपनाने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।

किसानों और हितधारकों के साथ संवाद

कार्यशाला में किसानों और अन्य हितधारकों के साथ संवादात्मक सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में सतत कृषि, मत्स्य पालन विकास, आर्द्रभूमि संरक्षण और आजीविका संवर्धन जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

किसानों को इस बात की जानकारी दी गई कि आर्द्रभूमि और उसके आसपास की कृषि गतिविधियों को किस तरह इस प्रकार संचालित किया जा सकता है कि उत्पादन के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी बना रहे।

वहीं मत्स्य पालन से जुड़े हितधारकों के साथ झील में मछली संसाधनों की उपलब्धता और मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के वैज्ञानिक तरीकों पर भी चर्चा की गई।

इस तरह के संवाद स्थानीय समुदायों के अनुभव और वैज्ञानिक ज्ञान के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद करते हैं।

नंदा झील में फिश रैंचिंग का प्रदर्शन

कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण नंदा झील में फिश रैंचिंग गतिविधि रही। इसके माध्यम से अंतर्देशीय मत्स्य संसाधनों को मजबूत करने और मछली स्टॉक बढ़ाने की संभावनाओं का प्रदर्शन किया गया।

फिश रैंचिंग का उद्देश्य उपयुक्त मछली प्रजातियों के स्टॉक को बढ़ाकर मत्स्य उत्पादन को मजबूत करना है। यदि इसे वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो यह स्थानीय मछुआरों की आजीविका को बेहतर बनाने के साथ-साथ जलीय जैव विविधता और आर्द्रभूमि की उत्पादकता को भी समर्थन दे सकता है।

हालांकि, आर्द्रभूमियों में मछली स्टॉक बढ़ाने के लिए स्थानीय पारिस्थितिकी, उपलब्ध प्रजातियों और जल की गुणवत्ता को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसी कारण वैज्ञानिक मार्गदर्शन और नियमित निगरानी महत्वपूर्ण है।

नंदा झील में किया गया यह प्रदर्शन स्थानीय हितधारकों के लिए मत्स्य संसाधन प्रबंधन की संभावनाओं को समझने का व्यावहारिक माध्यम बना।

कृषि और मत्स्य पालन के बीच संतुलन जरूरी

आर्द्रभूमि क्षेत्रों में कृषि और मत्स्य पालन दोनों स्थानीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं। लेकिन इन गतिविधियों को पर्यावरणीय संतुलन के साथ संचालित करना जरूरी है।

अत्यधिक रासायनिक इनपुट, जल प्रदूषण, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव जैसी गतिविधियां आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।

इसके विपरीत, टिकाऊ कृषि पद्धतियों, जल संरक्षण, जैव विविधता अनुकूल प्रबंधन और वैज्ञानिक मत्स्य पालन को बढ़ावा देकर स्थानीय उत्पादन एवं आजीविका को बनाए रखते हुए प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की जा सकती है।

कार्यशाला में इसी संतुलित दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

महिलाओं की भी महत्वपूर्ण भागीदारी

कार्यशाला में कुल 110 हितधारकों ने भाग लिया। इनमें 60 महिलाएं और 50 पुरुष शामिल थे।

प्रतिभागियों में किसान, विद्यार्थी, शिक्षक, वैज्ञानिक, सरकारी अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि और अन्य हितधारक शामिल रहे।

महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी यह दर्शाती है कि प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय आजीविका से जुड़े संरक्षण कार्यक्रमों में महिलाओं को सक्रिय भागीदार बनाया जाना जरूरी है। ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था में महिलाएं कृषि, मत्स्य पालन, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

इसलिए आर्द्रभूमि संरक्षण की योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से संरक्षण के साथ-साथ परिवार और समुदाय की आजीविका पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

पौधों के वितरण से दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश

कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों के बीच पौधों का वितरण किया गया। इसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण की गतिविधियों से जोड़ना और स्थानीय स्तर पर हरित आवरण बढ़ाने के प्रति जागरूक करना था।

पौधों का वितरण केवल प्रतीकात्मक गतिविधि नहीं रहा, बल्कि इसे समुदाय आधारित पर्यावरण संरक्षण के संदेश से जोड़ा गया। स्थानीय लोगों की भागीदारी से संरक्षण गतिविधियों को लंबे समय तक जारी रखने में मदद मिल सकती है।

समुदाय आधारित संरक्षण से ही होगा स्थायी प्रबंधन

नंदा झील में आयोजित इस कार्यशाला ने स्पष्ट किया कि आर्द्रभूमियों का संरक्षण केवल सरकारी नियमों और योजनाओं के जरिए संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदायों को संरक्षण प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनाना जरूरी है।

किसान, मछुआरे, विद्यार्थी, शिक्षक, वैज्ञानिक, पंचायत एवं स्थानीय निकाय, सरकारी विभाग और गैर-सरकारी संस्थाएं मिलकर काम करें तो आर्द्रभूमियों के संरक्षण के साथ उनसे मिलने वाली आर्थिक एवं सामाजिक सेवाओं को भी लंबे समय तक बनाए रखा जा सकता है।

नंदा झील जैसे रामसर स्थल जैव विविधता के महत्वपूर्ण केंद्र होने के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की आजीविका और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए भी अहम हैं।

इस कार्यशाला ने वैज्ञानिक ज्ञान, स्थानीय अनुभव और प्रशासनिक प्रयासों को एक मंच पर लाकर यही संदेश दिया कि आर्द्रभूमियों का संरक्षण तभी प्रभावी और स्थायी हो सकता है, जब समुदाय स्वयं इसके केंद्र में हों।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण पहल

नंदा झील में आयोजित कार्यक्रम का महत्व केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। टिकाऊ कृषि, मत्स्य पालन, जैव विविधता संरक्षण और आजीविका संवर्धन को एक साथ जोड़ने का प्रयास ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी उपयोगी हो सकता है।

यदि आर्द्रभूमि संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाता है, तो स्थानीय समुदायों को मछली पालन, कृषि, पौध उत्पादन, प्रकृति आधारित पर्यटन और अन्य गतिविधियों से आय के नए अवसर मिल सकते हैं। इस लिहाज से नंदा झील में आयोजित फील्ड-लेवल कार्यशाला को पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सामुदायिक पहल के रूप में देखा जा सकता है।

 

Tags: AgricultureFarmingIndian Agriculture
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