वेस्ट एशिया में ईरान से जुड़े संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव का असर अब केवल वैश्विक ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव कृषि क्षेत्र और रासायनिक उद्योग पर भी साफ दिखाई देने लगा है। निवेश एवं रिसर्च फर्म Capital 360 ONE की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में दोबारा तेजी आने से आने वाले महीनों में पेस्टिसाइड (कीटनाशक) और अन्य एग्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं। यदि कच्चे तेल में यह तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ेगा।
रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान से जुड़े नए हमलों के बाद वैश्विक तेल बाजार में फिर से तेजी देखने को मिल रही है। बुधवार को बाजार खुलने के बाद ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 50 सेंट यानी 0.55 प्रतिशत बढ़कर 91.51 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड 30 सेंट यानी 0.36 प्रतिशत बढ़कर 84.64 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। ऊर्जा कीमतों में यह बढ़ोतरी रसायन उद्योग की उत्पादन लागत बढ़ाने वाली मानी जा रही है, क्योंकि अधिकांश पेट्रोकेमिकल उत्पाद और कीटनाशकों के निर्माण में कच्चे तेल से बनने वाले रसायनों का उपयोग होता है।
पहली छमाही में केमिकल उत्पादन रहा कमजोर
Capital 360 ONE की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 की पहली छमाही (1HCY26) में अधिकांश प्रमुख रासायनिक उत्पादों का उत्पादन महीने-दर-महीने (MoM) आधार पर कमजोर रहा। हालांकि, पेस्टिसाइड उत्पादन इस अवधि का सबसे सकारात्मक पहलू रहा, जिसने साल-दर-साल (YoY) आधार पर 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की।
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक बाजार में विशेष रूप से चीन से जेनेरिक एग्रोकेमिकल उत्पादों की अधिक आपूर्ति होने के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है। यही कारण है कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद कंपनियों को बेहतर मूल्य नहीं मिल पा रहा है।
सोडा ऐश और कॉस्टिक सोडा पर मांग की कमी का असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि सोडा ऐश का उत्पादन साल-दर-साल 3 प्रतिशत और महीने-दर-महीने भी 3 प्रतिशत घटा। हालांकि पहली छमाही का कुल उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 3 प्रतिशत अधिक रहा। इसके बावजूद बाजार में मांग कमजोर बनी हुई है और चीन में सोडा ऐश की कीमतें सीमित दायरे में कारोबार कर रही हैं।
इसी प्रकार कॉस्टिक सोडा का उत्पादन भी YoY आधार पर 2 प्रतिशत और MoM आधार पर 3 प्रतिशत घट गया। हालांकि पहली छमाही का कुल उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 5 प्रतिशत अधिक रहा। विश्लेषकों का कहना है कि उद्योगों की मांग अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचने से इन रसायनों की कीमतों में उल्लेखनीय सुधार नहीं हो सका।
फॉस्फेट ओर उत्पादन में गिरावट
रिपोर्ट के अनुसार, फॉस्फेट ओर (Phosphate Ore) का उत्पादन भी दबाव में रहा। जून महीने में उत्पादन साल-दर-साल 10 प्रतिशत और महीने-दर-महीने 3 प्रतिशत कम रहा। इसके चलते पहली छमाही की कुल वृद्धि घटकर केवल 4 प्रतिशत रह गई, जबकि पिछले कुछ वर्षों में यह वृद्धि लगातार 10 प्रतिशत से अधिक रही थी।
फॉस्फेट ओर उर्वरक उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसके उत्पादन में कमी आने से फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की लागत पर भी दबाव बढ़ सकता है।
सल्फर संकट ने बढ़ाई उद्योग की चिंता
रिपोर्ट में सबसे बड़ी चिंता सल्फ्यूरिक एसिड के उत्पादन में आई तेज गिरावट को लेकर जताई गई है। वेस्ट एशिया में जारी संघर्ष के कारण सल्फर की उपलब्धता प्रभावित हुई है, जिससे सल्फ्यूरिक एसिड उत्पादन पर असर पड़ा।
जून में सल्फ्यूरिक एसिड का उत्पादन साल-दर-साल 14 प्रतिशत और महीने-दर-महीने 5 प्रतिशत घट गया। इसके चलते पहली छमाही का कुल उत्पादन भी पिछले वर्ष की तुलना में 2 प्रतिशत कम रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि सल्फ्यूरिक एसिड उर्वरक और कई औद्योगिक रसायनों के निर्माण का एक प्रमुख कच्चा माल है। यदि सल्फर की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो फॉस्फेट उर्वरकों, औद्योगिक रसायनों और कई कृषि उत्पादों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
सिंथेटिक फाइबर क्षेत्र भी दबाव में
रिपोर्ट के अनुसार, सिंथेटिक फाइबर उत्पादन भी कमजोर रहा। जून में इसका उत्पादन YoY आधार पर 8 प्रतिशत और MoM आधार पर 10 प्रतिशत घट गया। हालांकि पहली छमाही के कुल उत्पादन में केवल 1 प्रतिशत की मामूली गिरावट दर्ज की गई।
विश्लेषकों का मानना है कि कमजोर वैश्विक मांग और ऊंची लागत के कारण सिंथेटिक फाइबर उद्योग पर दबाव बना हुआ है।
पेस्टिसाइड उत्पादन मजबूत, लेकिन कीमतों पर दबाव
एग्रोकेमिकल सेक्टर में सबसे बेहतर प्रदर्शन पेस्टिसाइड उत्पादन का रहा। जून में उत्पादन साल-दर-साल 4 प्रतिशत बढ़ा, हालांकि महीने-दर-महीने इसमें 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। इसके बावजूद पहली छमाही का कुल उत्पादन पिछले वर्ष की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक रहा।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन में जेनेरिक पेस्टिसाइड की बढ़ती आपूर्ति के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें नियंत्रित बनी हुई हैं। हालांकि कंपनियों की इनपुट लागत में वृद्धि का कुछ हिस्सा धीरे-धीरे बाजार कीमतों में दिखाई देने लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो पेस्टिसाइड उद्योग के लिए उत्पादन लागत और बढ़ेगी। ऐसे में कंपनियां धीरे-धीरे इस अतिरिक्त लागत को उत्पादों की कीमतों में शामिल कर सकती हैं।
किसानों पर क्या पड़ेगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि बाजारों में से एक है, जहां खरीफ और रबी दोनों सीजन में कीटनाशकों की भारी मांग रहती है। यदि कच्चे तेल और अन्य कच्चे माल की कीमतों में तेजी जारी रहती है, तो इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि पेस्टिसाइड निर्माण में कई पेट्रोकेमिकल आधारित इंटरमीडिएट्स का उपयोग होता है। इसके अलावा सल्फर, सल्फ्यूरिक एसिड और अन्य रसायनों की कीमतें बढ़ने से एग्रोकेमिकल कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है। यदि कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक पहुंचाती हैं, तो किसानों को अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
आगे क्या रह सकता है बाजार का रुख?
Capital 3602 ONE का कहना है कि जून के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में कुछ नरमी देखने को मिली थी, जिससे लागत दबाव थोड़ा कम हुआ था। हालांकि दूसरी तिमाही (2QCY26) की औसत कीमतें अभी भी पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रहीं।
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि हाल के सप्ताहों में ईरान से जुड़े नए हमलों के कारण कच्चे तेल की कीमतें फिर से मजबूत होने लगी हैं। यदि यह रुझान जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में पेस्टिसाइड और अन्य एग्रोकेमिकल उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव अब कृषि क्षेत्र पर भी असर डालने लगा है। एक ओर चीन से जेनेरिक उत्पादों की अधिक आपूर्ति कीमतों को नियंत्रित रख रही है, वहीं दूसरी ओर कच्चे तेल, सल्फर और अन्य कच्चे माल की बढ़ती लागत उद्योग के लिए नई चुनौती बन रही है। यदि वेस्ट एशिया में तनाव कम नहीं हुआ और कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहीं, तो भारत सहित वैश्विक कृषि बाजार में पेस्टिसाइड, एग्रोकेमिकल और कुछ उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इससे किसानों की लागत बढ़ने के साथ-साथ कृषि उत्पादन की अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

