भारत की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए रूस में स्थापित होने जा रहा भारत-रूस संयुक्त उद्यम (JV) यूरिया परियोजना तेजी से आगे बढ़ रही है। भारत में रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने पुष्टि की है कि यह परियोजना तय समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ रही है और रूस भारत को उर्वरकों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
यह महत्वाकांक्षी परियोजना रूस के समारा क्षेत्र के तोग्लियाट्टी शहर में स्थापित की जाएगी। प्रस्तावित संयंत्र की वार्षिक उत्पादन क्षमता 20 लाख टन यूरिया होगी और इसका पूरा उत्पादन भारत को निर्यात किया जाएगा। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर उर्वरक आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीतिक तनावों से प्रभावित हो रही हैं, यह परियोजना भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इंडियन एक्सप्रेस के आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में बोलते हुए डेनिस अलीपोव ने कहा कि परियोजना का क्रियान्वयन सही दिशा में चल रहा है और रूस भविष्य में भी भारत की उर्वरक आवश्यकताओं को पूरा करने में सहयोग जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच उर्वरक व्यापार आर्थिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है।
परियोजना से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, सरकारी कंपनी प्रोजेक्ट्स एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड (PDI) द्वारा तैयार की गई प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है। वर्तमान में संयुक्त उद्यम के साझेदार इसका मूल्यांकन कर रहे हैं। अधिकारियों का मानना है कि परियोजना का निर्माण कार्य अक्टूबर 2026 से शुरू हो सकता है और अगले दो वर्षों के भीतर उत्पादन प्रारंभ होने की संभावना है।
करीब 20,000 करोड़ रुपये की इस परियोजना में रूस की प्रमुख उर्वरक कंपनी यूरालकेम तथा भारत की इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL), राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (RCF) और नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (NFL) साझेदार हैं।
निवेश संरचना के अनुसार यूरालकेम अमोनिया उत्पादन संयंत्र में लगभग 10,000 करोड़ रुपये का निवेश करेगी। वहीं भारतीय साझेदार कंपनियों में इंडियन पोटाश और आरसीएफ क्रमशः 4,500-4,500 करोड़ रुपये निवेश करेंगी, जबकि एनएफएल लगभग 1,000 करोड़ रुपये का योगदान देगा।
हाल ही में पीडीआई के नेतृत्व में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल रूस का दौरा कर चुका है। इस प्रतिनिधिमंडल में आईपीएल, आरसीएफ और एनएफएल के अधिकारी भी शामिल थे। इससे पहले इंडियन पोटाश के प्रबंध निदेशक पी.एस. गहलोत ने भी संकेत दिया था कि संयंत्र का निर्माण अगले दो वर्षों में पूरा किया जा सकता है।
इस परियोजना की नींव दिसंबर 2025 में रखी गई थी, जब भारत और रूस की कंपनियों ने रूस में एक बड़े यूरिया उत्पादन केंद्र की स्थापना के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता नई दिल्ली में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में हुआ था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना भारत की दीर्घकालिक उर्वरक सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। वर्तमान में भारत अपनी यूरिया जरूरतों का बड़ा हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा करता है, लेकिन मांग और आपूर्ति के अंतर को पूरा करने के लिए आयात पर भी निर्भर रहता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने सभी प्रकार के उर्वरकों का 20 मिलियन टन से अधिक आयात किया, जिसमें लगभग 10 मिलियन टन यूरिया शामिल था। देश में कुल यूरिया खपत करीब 40 मिलियन टन रही, जबकि लगभग 30 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन देश की 32 उत्पादन इकाइयों में हुआ।
इस बीच पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक यूरिया बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ईरान, सऊदी अरब, कतर और बहरीन जैसे प्रमुख उत्पादक देशों का वैश्विक यूरिया व्यापार में 30 से 40 प्रतिशत तक योगदान है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने से आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएं लगातार बनी हुई हैं।
ऐसे हालात में रूस स्थित यह संयुक्त उद्यम भारत के लिए एक दीर्घकालिक और भरोसेमंद आपूर्ति स्रोत बन सकता है। यह परियोजना न केवल आयात निर्भरता से जुड़े जोखिमों को कम करेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से भी भारत को काफी हद तक सुरक्षा प्रदान करेगी।
भारत और रूस के बीच यह सहयोग आने वाले वर्षों में वैश्विक उर्वरक बाजार में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है और देश की खाद सुरक्षा रणनीति को नई मजबूती दे सकता है।

