उर्वरक और खाद्य सुरक्षा के तहत दुनिया में बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना आज कृषि क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। खाद्य उत्पादन बढ़ाने में अच्छी मिट्टी, पर्याप्त पानी, बेहतर बीज और आधुनिक कृषि तकनीक के साथ उर्वरकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक उर्वरक बाजार कई तरह के दबावों से गुजर रहा है। भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव, निर्यात प्रतिबंध और सप्लाई चेन में आने वाली बाधाओं ने उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों को प्रभावित किया है।
भारत जैसे बड़े कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है। देश में यूरिया का बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर तैयार होता है, लेकिन फॉस्फेटिक और पोटाश आधारित उर्वरकों के लिए भारत अभी भी काफी हद तक आयात पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी भी बड़े बदलाव का असर भारत की कृषि लागत और किसानों तक उर्वरक की उपलब्धता पर पड़ सकता है।
खाद्य सुरक्षा में उर्वरकों की भूमिका
फसल उत्पादन के लिए पौधों को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और कई सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। यूरिया नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत है, जबकि DAP और अन्य कॉम्प्लेक्स उर्वरक फसल को फॉस्फोरस और अन्य पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं।
यदि किसानों को फसल की जरूरत के अनुसार समय पर उर्वरक नहीं मिलता है, तो पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और उत्पादन में कमी आ सकती है। बड़े स्तर पर ऐसा होने पर इसका असर देश की कुल खाद्यान्न उपलब्धता पर पड़ सकता है। इसलिए उर्वरक की पर्याप्त उपलब्धता को खाद्य सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि ज्यादा उर्वरक डालना ही ज्यादा उत्पादन की गारंटी है। मिट्टी और फसल की जरूरत के अनुसार संतुलित पोषक तत्व देना अधिक महत्वपूर्ण है।
वैश्विक संकट के प्रमुख कारण
अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार कई कारणों से प्रभावित होता है। नाइट्रोजन उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब गैस की कीमत बढ़ती है तो यूरिया और दूसरे नाइट्रोजन उर्वरकों की उत्पादन लागत भी बढ़ सकती है।
इसी तरह फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए रॉक फॉस्फेट और अन्य कच्चे माल की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। पोटाश के बाजार में भी कुछ प्रमुख देशों की बड़ी भूमिका है। इसलिए किसी बड़े उत्पादक देश में उत्पादन या निर्यात प्रभावित होने पर वैश्विक बाजार में कीमत और आपूर्ति दोनों पर असर पड़ सकता है।
युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव इस समस्या को और बढ़ा सकते हैं। समुद्री परिवहन, बीमा, बंदरगाहों और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में आने वाली बाधाएं भी उर्वरकों की लागत बढ़ा सकती हैं।
भारत के लिए आयात स्रोतों में विविधता जरूरी
भारत की उर्वरक सुरक्षा के लिए आयात स्रोतों में विविधता एक महत्वपूर्ण रणनीति है। यदि किसी एक देश से आपूर्ति प्रभावित होती है तो दूसरे देशों से आयात बढ़ाने की क्षमता होनी चाहिए।
यह रणनीति खासकर DAP, MOP और अन्य आयात-निर्भर उर्वरकों के मामले में महत्वपूर्ण है। अलग-अलग देशों के साथ दीर्घकालीन समझौते करने से अचानक पैदा होने वाली कमी के जोखिम को कम किया जा सकता है।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार पर लगातार नजर रखना भी जरूरी है, ताकि कीमतों में तेजी या आपूर्ति में संभावित कमी का पहले से अनुमान लगाया जा सके।
घरेलू उत्पादन बढ़ाना जरूरी
आयात के विकल्प बढ़ाने के साथ भारत के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है। देश में यूरिया उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी हुई है और सरकार घरेलू उत्पादन को मजबूत करने पर लगातार जोर दे रही है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे वैश्विक कीमतों में अचानक बढ़ोतरी होने पर किसानों को राहत देने में मदद मिलती है।
लेकिन केवल तैयार उर्वरक का घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं है। उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस, फॉस्फेट, पोटाश और अन्य कच्चे माल की जरूरत होती है। इसलिए भारत को तैयार उर्वरक के साथ-साथ कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति पर भी ध्यान देना होगा।
सब्सिडी का महत्व
भारत में किसानों को उचित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने में सरकारी सब्सिडी की महत्वपूर्ण भूमिका है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमत बढ़ने पर सरकार की सब्सिडी व्यवस्था किसानों पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को कम करने में मदद करती है।
इस व्यवस्था का फायदा यह है कि वैश्विक बाजार में बड़े उतार-चढ़ाव के बावजूद किसानों को उर्वरक अपेक्षाकृत स्थिर कीमत पर मिल सकता है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने पर सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च पर दबाव बढ़ता है। इसलिए भविष्य की उर्वरक नीति में किसान हित, सरकारी वित्त और उर्वरक कंपनियों की आर्थिक स्थिति के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा।
संतुलित उर्वरक इस्तेमाल से कम होगा दबाव
उर्वरक संकट से निपटने का एक रास्ता यह भी है कि उपलब्ध उर्वरकों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जाए। भारत के कई हिस्सों में यूरिया का इस्तेमाल जरूरत से अधिक करने की समस्या सामने आती रही है, जबकि फॉस्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों का इस्तेमाल क्षेत्र और फसल की जरूरत के अनुसार नहीं हो पाता।
इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा हो सकता है। लंबे समय में इसका असर मिट्टी की सेहत और कृषि उत्पादकता पर पड़ सकता है।
मिट्टी की जांच और Soil Health Card के आधार पर उर्वरक इस्तेमाल करने से किसान अपनी फसल की वास्तविक जरूरत को समझ सकते हैं। इससे अनावश्यक खर्च कम करने के साथ मिट्टी की सेहत को भी बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
नई तकनीक से बढ़ सकती है उर्वरक दक्षता
कृषि में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने से उर्वरकों की दक्षता सुधारने के अवसर भी बढ़े हैं। नैनो उर्वरक, पानी में घुलनशील उर्वरक, फर्टिगेशन और सटीक कृषि जैसी तकनीकों पर लगातार काम हो रहा है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सिंचाई तकनीकों के साथ उर्वरक देने से पानी और पोषक तत्वों का अधिक कुशल इस्तेमाल किया जा सकता है। सटीक कृषि तकनीक के जरिए खेत के अलग-अलग हिस्सों की जरूरत के अनुसार इनपुट का इस्तेमाल करना संभव हो रहा है।
हालांकि नई तकनीकों को अपनाने से पहले उनके वैज्ञानिक परिणाम, लागत और अलग-अलग फसलों में उपयोगिता को ध्यान में रखना जरूरी है।
जैविक और प्राकृतिक विकल्प भी महत्वपूर्ण
रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने के बीच जैविक खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और जैव उर्वरकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। ये विकल्प रासायनिक उर्वरकों को पूरी तरह बदलने में सक्षम हों, ऐसा जरूरी नहीं है, लेकिन मिट्टी में जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों की उपलब्धता सुधारने में इनका योगदान हो सकता है।
फसल अवशेषों को खेत में मिलाना, दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करना और जैविक पदार्थ बढ़ाना मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकता है।
सप्लाई चेन मजबूत करना जरूरी
उर्वरक की उपलब्धता केवल उत्पादन और आयात पर निर्भर नहीं करती। बंदरगाह से लेकर रेलवे, गोदाम, राज्य भंडार और खुदरा दुकानों तक पूरी सप्लाई चेन का मजबूत होना जरूरी है।
किसी राज्य में पर्याप्त उर्वरक मौजूद होने के बावजूद यदि वह समय पर जिले और गांव तक नहीं पहुंचता, तो किसानों के लिए उस स्टॉक का कोई फायदा नहीं होगा।
इसलिए डिजिटल स्टॉक मॉनिटरिंग, बेहतर परिवहन व्यवस्था, समय पर राज्यों को आपूर्ति और खुदरा स्तर पर उपलब्धता की निगरानी जरूरी है।
आगे की रणनीति क्या होनी चाहिए?
भारत को उर्वरक सुरक्षा के लिए एक ऐसी रणनीति की जरूरत है जिसमें घरेलू उत्पादन, आयात स्रोतों की विविधता, रणनीतिक भंडारण और आधुनिक कृषि तकनीक सभी शामिल हों।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ दूसरे देशों से दीर्घकालीन आपूर्ति समझौते किए जा सकते हैं। कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक साझेदारी बढ़ानी होगी।
इसके साथ किसानों को मिट्टी की जरूरत के अनुसार उर्वरक इस्तेमाल करने के लिए जागरूक करना होगा। माइक्रो-इरिगेशन, फर्टिगेशन, जैव उर्वरक और सटीक कृषि जैसी तकनीकों को बढ़ावा देकर उर्वरक की दक्षता बढ़ाई जा सकती है।
निष्कर्ष
उर्वरक का मुद्दा अब केवल किसान और खाद की दुकान तक सीमित नहीं रह गया है। यह वैश्विक व्यापार, ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव और भारत की खाद्य सुरक्षा से सीधे जुड़ा विषय बन चुका है।
आने वाले वर्षों में मौसम की अनिश्चितता और वैश्विक तनाव बढ़ने की स्थिति में उर्वरक की सुरक्षित और समय पर उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होगी। भारत के लिए सबसे मजबूत रास्ता घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात स्रोतों में विविधता लाने, रणनीतिक भंडारण मजबूत करने, संतुलित उर्वरक इस्तेमाल को बढ़ावा देने और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने का है।
यदि इन सभी क्षेत्रों पर एक साथ काम किया जाता है, तो वैश्विक उर्वरक बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव के बावजूद किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

