देश में खरीफ सीजन की तैयारियों के बीच उर्वरकों की उपलब्धता, बढ़ती लागत और कृषि नीतियों को लेकर किसानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। इसी बीच संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि किसानों को समय पर पर्याप्त उर्वरक नहीं मिला, तो इसका सीधा असर देश के खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा।
500 से अधिक किसान संगठनों के इस संयुक्त मंच ने सरकार से खरीफ फसलों के लिए यूरिया और डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) जैसे जरूरी उर्वरकों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है। साथ ही एसकेएम ने “प्राकृतिक खेती” को लेकर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि बिना वैज्ञानिक तैयारी और व्यापक समर्थन के प्राकृतिक खेती को तेजी से लागू करने पर फसल उत्पादन में 30 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
किसान संगठनों ने उर्वरकों की कथित कमी, डीजल की बढ़ती कीमतों और कालाबाजारी के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करने का भी फैसला लिया है।
खरीफ सीजन से पहले बढ़ी किसानों की चिंता
देश में खरीफ सीजन खेती का सबसे महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी प्रमुख फसलें इसी दौरान बोई जाती हैं। लेकिन इस बार किसानों के सामने कई चुनौतियां एक साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं।
एक ओर मौसम विभाग कमजोर मानसून और अल-नीनो के असर की आशंका जता रहा है, वहीं दूसरी ओर किसानों को उर्वरकों की उपलब्धता और बढ़ती लागत की चिंता सता रही है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सरकार ने पर्याप्त व्यवस्था नहीं की, तो उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ फसल उत्पादन पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
एसकेएम नेताओं का आरोप है कि सरकार को पहले से यह जानकारी है कि खरीफ सीजन में उर्वरकों की मांग बढ़ेगी, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर पर्याप्त तैयारी दिखाई नहीं दे रही है।
उर्वरक संकट और कालाबाजारी का मुद्दा
संयुक्त किसान मोर्चा ने दावा किया है कि कई राज्यों में पहले से ही उर्वरकों की कमी महसूस की जा रही है। किसानों को जरूरत के समय यूरिया और डीएपी नहीं मिल पा रहा है, जबकि निजी स्तर पर ऊंचे दामों पर बिक्री और कालाबाजारी की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
किसान नेताओं का कहना है कि हर साल खरीफ और रबी सीजन के दौरान उर्वरकों की मांग बढ़ते ही संकट की स्थिति बन जाती है। छोटे किसानों को लंबी कतारों में लगना पड़ता है, जबकि कई बार उन्हें जरूरत के मुताबिक खाद नहीं मिल पाती।
उनका आरोप है कि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर कुछ व्यापारी ऊंचे दामों पर खाद बेचते हैं, जिससे किसानों की लागत और बढ़ जाती है।
एसकेएम का कहना है कि यदि सरकार समय पर सप्लाई चेन मजबूत नहीं करती, तो आने वाले महीनों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
डीजल की बढ़ती कीमतों पर सरकार घिरी
किसान संगठनों ने डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों को भी किसानों के लिए बड़ा संकट बताया है। खेती में सिंचाई, ट्रैक्टर, थ्रेसर और अन्य कृषि मशीनों के संचालन में डीजल की बड़ी भूमिका होती है।
डीजल महंगा होने का सीधा असर खेती की लागत पर पड़ता है। किसान नेताओं का कहना है कि पहले ही बीज, खाद और मजदूरी महंगी हो चुकी है, ऐसे में डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी किसानों पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है।
एसकेएम ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार किसानों को राहत देने के बजाय ईंधन की कीमतें बढ़ाकर कृषि क्षेत्र पर दबाव बढ़ा रही है। संगठन का कहना है कि यह स्थिति देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है।
प्राकृतिक खेती पर उठे सवाल
सरकार पिछले कुछ वर्षों से प्राकृतिक खेती और रासायनिक उर्वरकों के कम उपयोग को बढ़ावा दे रही है। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा ने इस मॉडल को लेकर गंभीर चिंता जताई है।
एसकेएम नेताओं का कहना है कि यदि बिना पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन और चरणबद्ध तैयारी के बड़े पैमाने पर प्राकृतिक खेती लागू की गई, तो फसल उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।
उनके अनुसार, मौजूदा समय में देश की बड़ी आबादी खाद्यान्न के लिए कृषि उत्पादन पर निर्भर है। ऐसे में उत्पादन में 30 प्रतिशत तक कमी आने का खतरा खाद्य संकट और महंगाई को बढ़ा सकता है।
हालांकि, प्राकृतिक खेती के समर्थकों का मानना है कि लंबे समय में इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधर सकती है और खेती की लागत कम हो सकती है। लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि जब तक किसानों को पर्याप्त प्रशिक्षण, बाजार और वैकल्पिक व्यवस्था नहीं मिलती, तब तक इसे बड़े स्तर पर लागू करना जोखिम भरा हो सकता है।
आंदोलन की तैयारी में किसान संगठन
एसकेएम ने आने वाले महीनों में बड़े आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। संगठन ने घोषणा की है कि उसकी राष्ट्रीय परिषद की बैठक 17 जून को होगी, जबकि 28 जुलाई को नई दिल्ली में अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया जाएगा।
इस सम्मेलन में वैधानिक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), उर्वरक संकट, डीजल की कीमतें और किसानों की आय जैसे मुद्दों पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
किसान नेताओं ने देशभर के किसान संगठनों और कृषि मजदूर यूनियनों से गांव-गांव में सरकारी MSP आदेश की प्रतियां जलाकर विरोध दर्ज कराने का आह्वान भी किया है।
एसकेएम का कहना है कि किसानों को लागत के अनुरूप लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा है और सरकार की नीतियां किसानों की वास्तविक समस्याओं को हल करने में नाकाम रही हैं।
खाद्य सुरक्षा पर असर की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उर्वरकों की कमी, कमजोर मानसून और बढ़ती लागत जैसी समस्याएं एक साथ बनी रहीं, तो इसका असर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन देश की बड़ी आबादी अब भी खेती पर निर्भर है। यदि किसानों की लागत लगातार बढ़ती रही और उत्पादन घटा, तो इसका असर खाद्यान्न की कीमतों पर भी दिखाई देगा।
धान, गेहूं, दालें और तेलहन जैसी जरूरी फसलों की कीमतें बढ़ने से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका असर अलग से पड़ेगा।
समाधान क्या हो सकता है?
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को उर्वरकों की सप्लाई और वितरण व्यवस्था को मजबूत करना होगा। साथ ही जमाखोरी और कालाबाजारी पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है।
इसके अलावा किसानों को वैकल्पिक खेती तकनीकों, जैविक और प्राकृतिक खेती के लिए चरणबद्ध तरीके से तैयार करना होगा। बिना तैयारी के अचानक बदलाव किसानों के लिए जोखिम बढ़ा सकता है।
डीजल और कृषि इनपुट्स पर राहत, बेहतर MSP व्यवस्था और समय पर सरकारी सहायता भी किसानों की स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
आने वाले खरीफ सीजन में मौसम की अनिश्चितता पहले ही चिंता बढ़ा रही है। ऐसे में यदि उर्वरकों और लागत का संकट गहराता है, तो इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की रसोई तक पहुंचेगा।


