भारत में खरीफ सीजन 2026 की तैयारियों के बीच मौसम विभाग द्वारा मॉनसून के अनुमान में कटौती किए जाने के बाद कृषि क्षेत्र की चुनौतियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं। एक ओर जहां कम बारिश की आशंका किसानों की चिंता बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर सरकार ने खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की अनुमानित मांग को भी कम कर दिया है। हालांकि सरकार का कहना है कि देश में उर्वरकों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है और किसी प्रकार की कमी की आशंका नहीं है।
हाल ही में आयोजित एक अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग में सरकार ने कृषि, उर्वरक, खाद्य और ऊर्जा क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति पर जानकारी साझा की। इस दौरान यह स्पष्ट किया गया कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ रहे प्रभावों के बावजूद भारत आवश्यक कृषि इनपुट्स की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
मॉनसून अनुमान में कटौती का असर
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के अनुमान को पहले के 92 प्रतिशत से घटाकर दीर्घकालिक औसत (LPA) का 90 प्रतिशत कर दिया है। भारत की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर है और मॉनसून में कमी का सीधा असर फसल क्षेत्र, बुवाई और उर्वरकों की मांग पर पड़ता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) ने राज्यों के साथ विचार-विमर्श के बाद खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की जरूरत का पुनर्मूल्यांकन किया है। संशोधित अनुमान के अनुसार कुल उर्वरक मांग को 39.05 मिलियन टन से घटाकर 38.39 मिलियन टन कर दिया गया है।
यूरिया और डीएपी की मांग में कमी
पुनरीक्षित आंकड़ों के अनुसार यूरिया की मांग में लगभग 4 लाख टन की कमी दर्ज की गई है। पहले जहां खरीफ सीजन में 19.4 मिलियन टन यूरिया की आवश्यकता का अनुमान था, वहीं अब इसे घटाकर 19 मिलियन टन कर दिया गया है।
इसी प्रकार देश के सबसे महत्वपूर्ण फॉस्फेटिक उर्वरक डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की मांग भी 5.91 मिलियन टन से घटाकर 5.62 मिलियन टन कर दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसूनी बारिश सामान्य से कम रहती है तो कई क्षेत्रों में किसानों द्वारा बोए जाने वाले रकबे में कमी आ सकती है, जिससे उर्वरकों की खपत भी प्रभावित होगी।
उर्वरक विभाग की अतिरिक्त सचिव अपर्णा एस. शर्मा ने कहा कि बदलती कृषि परिस्थितियों और संभावित बुवाई क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए राज्यों के साथ चर्चा के बाद उर्वरक आवश्यकता का नया आकलन किया गया है।
पर्याप्त भंडार से राहत
हालांकि मांग में कमी का अनुमान लगाया गया है, लेकिन सरकार का कहना है कि उर्वरकों की उपलब्धता पूरी तरह संतोषजनक है। वर्तमान में देश में लगभग 19.98 मिलियन टन उर्वरकों का भंडार मौजूद है, जो संशोधित खरीफ आवश्यकता का 52 प्रतिशत से अधिक है।
आमतौर पर इस समय तक सीजन की आवश्यकता के मुकाबले लगभग 33 प्रतिशत स्टॉक उपलब्ध रहता है, जबकि इस वर्ष यह स्तर काफी अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार संभावित चुनौतियों को देखते हुए पहले से तैयारी कर रही है।
आयात बढ़ाने की तैयारी
वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए भारत ने अतिरिक्त 1.7 मिलियन टन यूरिया आयात के लिए एक नया वैश्विक टेंडर भी जारी किया है। इसके अलावा जून और जुलाई के दौरान भारतीय बंदरगाहों पर बड़ी मात्रा में उर्वरकों की खेप पहुंचने की उम्मीद है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अगले दो महीनों में:
- 2.5 मिलियन टन यूरिया
- 1.5 मिलियन टन डीएपी
- 1 मिलियन टन एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश युक्त मिश्रित उर्वरक)
देश में पहुंचने की संभावना है।
यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक उर्वरक बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। कच्चे माल की आपूर्ति और शिपिंग लागत पर भी इसका प्रभाव देखा जा रहा है।
खाद्य कीमतों पर नियंत्रण
उधर उपभोक्ता मामलों के विभाग ने खाद्य वस्तुओं की कीमतों को लेकर राहत भरी जानकारी दी है। विभाग के अनुसार देश में खाद्य मुद्रास्फीति फिलहाल नियंत्रण में है और प्रमुख खाद्य पदार्थों की कीमतों में कोई असामान्य वृद्धि नहीं देखी जा रही है।
अनाज, दाल, दूध और चीनी जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। वहीं सब्जियों में आलू और प्याज के दाम भी नियंत्रित दायरे में हैं।
उपभोक्ता मामलों के विभाग के अतिरिक्त सचिव अनुपम मिश्रा ने बताया कि सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए प्याज का 2 लाख टन का मूल्य स्थिरीकरण बफर तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके तहत खरीद प्रक्रिया 15 मई से शुरू हो चुकी है।
उन्होंने बताया कि किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने और बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए 26 मई से खरीद मूल्य में भी वृद्धि की गई है। इससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
पेट्रोल-डीजल की मांग में कमी नहीं
ऊर्जा क्षेत्र की स्थिति पर जानकारी देते हुए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि सरकार द्वारा ऊर्जा बचत के लिए अपील किए जाने के बावजूद पेट्रोल और डीजल की मांग में कोई कमी नहीं आई है।
उन्होंने बताया कि घरेलू एलपीजी खपत को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न उपाय अपनाए गए हैं, जिनमें सिलेंडर बुकिंग के बीच समय अंतराल जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप एलपीजी की मांग में कुछ कमी देखी गई है।
हालांकि पेट्रोल और डीजल की खपत सामान्य बनी हुई है। मंत्रालय के अनुसार मई महीने में कई जिलों में पेट्रोल और डीजल की बिक्री में 30 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि देशभर के पेट्रोल पंपों पर ईंधन का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है और आपूर्ति को लेकर किसी प्रकार की चिंता की आवश्यकता नहीं है।
एविएशन फ्यूल पर नुकसान
सरकार ने बताया कि जून महीने में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसके बावजूद सरकारी तेल विपणन कंपनियां जेट ईंधन की बिक्री पर लगभग 30 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठा रही हैं।
वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के कारण यह दबाव बना हुआ है। आने वाले महीनों में यदि पश्चिम एशिया की स्थिति और गंभीर होती है तो ऊर्जा क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
MSME क्षेत्र को राहत
वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने भी अर्थव्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। विभाग के संयुक्त सचिव मनोज मुत्तथिल अय्यप्पन ने बताया कि इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) 5.0 के तहत 29 मई तक 2.62 लाख से अधिक ऋण आवेदन प्राप्त हुए हैं।
इन आवेदनों के माध्यम से लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये के ऋण की मांग सामने आई है। अब तक 35,194 करोड़ रुपये के ऋण स्वीकृत किए जा चुके हैं, जबकि 15,720 करोड़ रुपये की गारंटी जारी की गई है।
उन्होंने यह भी कहा कि मार्च 2026 में समाप्त हुई तिमाही के दौरान विशेष रूप से MSME क्षेत्र में ऋण चूक (डिफॉल्ट) या वित्तीय तनाव में कोई उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज नहीं की गई है।
निष्कर्ष
मॉनसून के कमजोर रहने की आशंका ने खरीफ सीजन को लेकर नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसके चलते उर्वरकों की अनुमानित मांग में कमी की गई है, लेकिन सरकार ने पर्याप्त स्टॉक और अतिरिक्त आयात की व्यवस्था कर स्थिति को नियंत्रित रखने की तैयारी कर ली है। दूसरी ओर खाद्य कीमतों की स्थिरता, ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता और MSME क्षेत्र में वित्तीय मजबूती जैसे संकेत अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक माने जा रहे हैं। आने वाले सप्ताहों में मॉनसून की वास्तविक प्रगति और वैश्विक परिस्थितियां यह तय करेंगी कि कृषि और उर्वरक क्षेत्र पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है।

