कोरोना महामारी के बाद पूरी दुनिया में इंसानों और जानवरों के बीच फैलने वाली बीमारियों यानी जूनोटिक (Zoonotic) रोगों को लेकर जागरूकता पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, शहरीकरण, औद्योगीकरण और पशुओं के साथ बढ़ते संपर्क के कारण जूनोटिक रोग वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकते हैं। भारत जैसे कृषि एवं पशुपालन प्रधान देश में इन बीमारियों की रोकथाम के लिए मजबूत निगरानी व्यवस्था, वैज्ञानिक अनुसंधान और ‘वन हेल्थ’ (One Health) दृष्टिकोण को अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जूनोटिक रोग वे संक्रमण हैं जो प्राकृतिक रूप से कशेरुकी (Vertebrate) पशुओं से मनुष्यों में या मनुष्यों से पशुओं में फैलते हैं। इन रोगों का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, पशुपालन, खाद्य सुरक्षा, व्यापार और अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक असर डालता है।
क्या हैं जूनोटिक रोग?
‘जूनोसिस’ शब्द का प्रयोग पहली बार वर्ष 1880 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक रूडोल्फ विरचो (Rudolf Virchow) ने किया था। बाद में 1959 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसकी परिभाषा निर्धारित करते हुए कहा कि वे सभी रोग और संक्रमण, जो प्राकृतिक रूप से पशुओं और मनुष्यों के बीच फैलते हैं, जूनोटिक रोग कहलाते हैं।
आज दुनिया में 300 से अधिक जूनोटिक रोगों की पहचान की जा चुकी है। इनमें बैक्टीरिया, वायरस, फंगस, परजीवी और अन्य सूक्ष्मजीवों से होने वाले अनेक संक्रमण शामिल हैं।
क्यों बढ़ रहा है खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार पिछले कुछ दशकों में जूनोटिक रोगों के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं—
- तेजी से बढ़ता शहरीकरण
- जंगलों की कटाई
- जलवायु परिवर्तन
- औद्योगीकरण
- पशुपालन की बदलती पद्धतियां
- एंटीबायोटिक प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance)
- वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच बढ़ता संपर्क
- वैश्विक यात्रा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार
इन सभी कारणों से नए रोगजनकों के इंसानों तक पहुंचने की संभावना बढ़ गई है।
कौन-कौन से प्रमुख जूनोटिक रोग हैं?
भारत सहित दुनिया भर में कई पुराने और नए जूनोटिक रोग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बने हुए हैं।
बैक्टीरिया जनित रोग
- एंथ्रेक्स (Anthrax)
- ब्रुसेलोसिस (Brucellosis)
- प्लेग
- लेप्टोस्पायरोसिस
- साल्मोनेलोसिस
- लाइम रोग
वायरस जनित रोग
- रेबीज (Rabies)
- निपाह वायरस
- SARS-CoV-2 (कोविड-19)
- मंकीपॉक्स
- इबोला
- मारबर्ग वायरस
- क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD)
- क्राइमियन-कांगो हेमरेजिक फीवर (CCHF)
- इन्फ्लुएंजा
परजीवी एवं अन्य रोग
- टॉक्सोप्लाज्मोसिस
- लीशमैनियासिस
- ट्रिपैनोसोमियासिस
- हाइडेटिड रोग
- टीनियासिस
इनमें से कई बीमारियां समय पर पहचान न होने पर जानलेवा भी साबित हो सकती हैं।
जूनोटिक रोग कैसे फैलते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार इन रोगों के फैलने के कई माध्यम हो सकते हैं।
- संक्रमित पशु के सीधे संपर्क से
- संक्रमित मांस, दूध या अन्य पशु उत्पादों के सेवन से
- मच्छर, टिक और अन्य कीटों के माध्यम से
- दूषित पानी और भोजन से
- मिट्टी, पशु अपशिष्ट या संक्रमित वातावरण से
- संक्रमित पालतू पशुओं के संपर्क से
इसी कारण पशुपालकों, पशु चिकित्सकों, डेयरी कर्मियों, कसाईखानों में कार्यरत कर्मचारियों, वन कर्मियों और किसानों में संक्रमण का जोखिम अधिक रहता है।
भारत में बढ़ रही चुनौती
पिछले एक दशक में भारत में कई जूनोटिक रोगों के मामले सामने आए हैं। कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को यह समझा दिया कि पशुओं से फैलने वाली बीमारियां कितनी तेजी से वैश्विक संकट का रूप ले सकती हैं।
इसके अलावा भारत में समय-समय पर—
- निपाह वायरस
- स्क्रब टाइफस
- लेप्टोस्पायरोसिस
- क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज
- मंकीपॉक्स
- रेबीज
- ब्रुसेलोसिस
- एंथ्रेक्स
जैसे रोग भी चिंता का विषय बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यद्यपि प्लेग के बड़े प्रकोप कई वर्षों से नहीं हुए हैं, फिर भी उसकी सतत निगरानी आवश्यक है क्योंकि पर्यावरणीय बदलावों के कारण इसका दोबारा उभरना संभव है।
किसानों और पशुपालकों को क्यों रहना चाहिए सतर्क?
भारत की बड़ी आबादी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूअर और मुर्गी पालन करते हैं। ऐसे में पशुओं के साथ लगातार संपर्क के कारण संक्रमण का खतरा अपेक्षाकृत अधिक रहता है।
विशेष रूप से—
- दूध दुहने वाले
- डेयरी संचालक
- पशु चिकित्सक
- पोल्ट्री फार्म संचालक
- कसाईखाना कर्मचारी
- चमड़ा उद्योग से जुड़े लोग
- चरवाहे
- किसान
इन सभी को संक्रमण से बचाव के लिए विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
रोकथाम के लिए क्या करें?
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश जूनोटिक रोगों की रोकथाम संभव है यदि कुछ सामान्य सावधानियां अपनाई जाएं।
- पशुओं का नियमित टीकाकरण कराएं।
- बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें।
- पशुओं के संपर्क के बाद हाथ साबुन से अच्छी तरह धोएं।
- कच्चा दूध या अधपका मांस न खाएं।
- पशु अपशिष्ट का सुरक्षित निपटान करें।
- मच्छर एवं टिक नियंत्रण के उपाय अपनाएं।
- पशु बीमार होने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
- किसी भी असामान्य बीमारी की सूचना स्थानीय पशुपालन एवं स्वास्थ्य विभाग को दें।
‘वन हेल्थ’ मॉडल की बढ़ती जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि जूनोटिक रोगों की रोकथाम केवल स्वास्थ्य विभाग के प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण—तीनों क्षेत्रों के बीच समन्वय आवश्यक है। इसी अवधारणा को ‘वन हेल्थ’ (One Health) कहा जाता है।
भारत सरकार भी अब वन हेल्थ मॉडल के तहत स्वास्थ्य विभाग, पशुपालन विभाग, वन विभाग और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय बढ़ा रही है ताकि नए संक्रमणों की समय रहते पहचान कर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।
निगरानी और जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलावों के कारण जूनोटिक रोगों की चुनौती और बढ़ सकती है। इसलिए मजबूत निगरानी प्रणाली, आधुनिक प्रयोगशालाएं, वैज्ञानिक अनुसंधान, पशुओं का नियमित स्वास्थ्य परीक्षण तथा आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना बेहद आवश्यक है।
भारत में इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) और विभिन्न पशु स्वास्थ्य निगरानी कार्यक्रम इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
जूनोटिक रोग केवल चिकित्सा का विषय नहीं हैं, बल्कि यह स्वास्थ्य, पशुपालन, कृषि, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक व्यापक मुद्दा है। कोविड-19 जैसी महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पशुओं से फैलने वाले संक्रमण पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में वैज्ञानिक अनुसंधान, सतत निगरानी, पशु स्वास्थ्य प्रबंधन और ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण अपनाकर ही इन रोगों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि सरकार, वैज्ञानिक संस्थान, पशुपालक और आम नागरिक मिलकर प्रयास करें तो जूनोटिक रोगों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है और मानव एवं पशु स्वास्थ्य दोनों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

