कृषि अनुसंधान और नीति निर्माण को अधिक प्रभावी एवं वैज्ञानिक बनाने के उद्देश्य से आईसीएआर-राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (ICAR-NAARM), हैदराबाद ने इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI), नई दिल्ली के सहयोग से “कृषि तकनीकों एवं नीतियों के प्रभाव मूल्यांकन (Impact Assessment of Agricultural Technologies and Policies)” विषय पर पांच दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यशाला का सफल आयोजन किया। जिसमें देशभर के कृषि वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि तकनीकों और सरकारी नीतियों के प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने के लिए शोधकर्ताओं की क्षमता को मजबूत बनाना तथा उन्हें आधुनिक विश्लेषणात्मक उपकरणों और प्रभाव मूल्यांकन की उन्नत तकनीकों से परिचित कराना था।
साक्ष्य आधारित नीति निर्माण पर दिया गया जोर
कार्यशाला के उद्घाटन अवसर पर आईसीएआर-नार्म के निदेशक डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि वर्तमान समय में कृषि अनुसंधान और नीति निर्माण को मजबूत बनाने के लिए साक्ष्य आधारित (Evidence-Based) दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी भी नई कृषि तकनीक, योजना या नीति की सफलता का वास्तविक आकलन तभी संभव है जब उसके प्रभाव का वैज्ञानिक और व्यवस्थित मूल्यांकन किया जाए।
उन्होंने बताया कि प्रभाव मूल्यांकन से यह समझने में मदद मिलती है कि किसी तकनीक या सरकारी योजना से किसानों की आय, उत्पादकता, संसाधनों के उपयोग और ग्रामीण विकास पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यही जानकारी भविष्य की नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आधुनिक विश्लेषणात्मक तकनीकों का मिला प्रशिक्षण
पांच दिवसीय कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को इम्पैक्ट इवैल्यूएशन (Impact Evaluation) की उन्नत पद्धतियों पर विशेषज्ञ व्याख्यान दिए गए। साथ ही STATA और R जैसे आधुनिक सांख्यिकीय सॉफ्टवेयर के माध्यम से व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्रदान किया गया।
आईएफपीआरआई और आईसीएआर के वरिष्ठ विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों को डेटा विश्लेषण, प्रभाव मूल्यांकन मॉडल, सांख्यिकीय तकनीकों तथा कृषि अनुसंधान में उनके उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी। प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक केस स्टडी और डेटा सेट के माध्यम से शोधकर्ताओं को व्यावहारिक अनुभव भी कराया गया।
शोधकर्ताओं की क्षमता बढ़ाने पर विशेष फोकस
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य शोधकर्ताओं को केवल सैद्धांतिक जानकारी देना नहीं था, बल्कि उन्हें ऐसे व्यावहारिक कौशल उपलब्ध कराना था जिनका उपयोग वे अपने अनुसंधान कार्यों और कृषि परियोजनाओं में प्रभावी ढंग से कर सकें।
विशेषज्ञों ने बताया कि आधुनिक कृषि अनुसंधान में केवल नई तकनीकों का विकास पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह जानना भी आवश्यक है कि उन तकनीकों का किसानों, कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा है। इसी कारण प्रभाव मूल्यांकन आज कृषि अनुसंधान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
सीखी गई तकनीकों के बेहतर उपयोग का आह्वान
कार्यक्रम के दौरान आईसीएआर-नार्म के संयुक्त निदेशक डॉ. गोपाल लाल ने प्रतिभागियों से कहा कि वे कार्यशाला के दौरान प्राप्त ज्ञान और विश्लेषणात्मक कौशल का उपयोग अपने संस्थानों में अनुसंधान की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए करें।
उन्होंने कहा कि आधुनिक डेटा विश्लेषण तकनीकों का प्रभावी उपयोग कृषि अनुसंधान को अधिक विश्वसनीय, पारदर्शी और परिणामोन्मुख बनाएगा। इससे नीति निर्माताओं को भी बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।
वहीं, आईएफपीआरआई की वरिष्ठ शोध विश्लेषक स्वेता गुप्ता ने इस संयुक्त कार्यक्रम के उद्देश्य और महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आईसीएआर और आईएफपीआरआई के बीच यह सहयोग भारतीय कृषि अनुसंधान प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
समापन सत्र में प्रभाव मूल्यांकन की आवश्यकता पर चर्चा
कार्यशाला के समापन सत्र में विभिन्न विशेषज्ञों ने कृषि अनुसंधान में मजबूत प्रभाव मूल्यांकन प्रणाली की बढ़ती आवश्यकता पर जोर दिया। वक्ताओं ने कहा कि भविष्य में अनुसंधान परियोजनाओं में निवेश, नई तकनीकों के विकास और कृषि नीतियों के निर्माण के लिए विश्वसनीय प्रभाव मूल्यांकन अनिवार्य होगा।
उन्होंने कहा कि यदि अनुसंधान कार्यक्रमों का नियमित मूल्यांकन किया जाए तो संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है और किसानों तक अधिक उपयोगी तकनीकों को तेजी से पहुंचाया जा सकता है।
देशभर के 21 शोधकर्ताओं ने लिया हिस्सा
इस क्षमता संवर्धन कार्यशाला में आईसीएआर के विभिन्न संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा देश की अन्य कृषि एवं अनुसंधान संस्थाओं के कुल 21 शोधकर्ताओं ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने कार्यशाला के दौरान आधुनिक प्रभाव मूल्यांकन तकनीकों, डेटा विश्लेषण और नीति अनुसंधान से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषि अनुसंधान प्रणाली को अधिक मजबूत बनाने के साथ-साथ किसानों के हित में बनाई जाने वाली योजनाओं और तकनीकों की गुणवत्ता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आईसीएआर-नार्म और आईएफपीआरआई की यह संयुक्त पहल देश में साक्ष्य आधारित कृषि अनुसंधान, प्रभावी नीति निर्माण और टिकाऊ कृषि विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

