मोटे अनाज यानी मिलेट्स और अन्य प्राचीन अनाज एक बार फिर वैश्विक स्तर पर तेजी से चर्चा में हैं। स्वास्थ्य, पोषण, जलवायु अनुकूलता और टिकाऊ कृषि के लिहाज से मिलेट्स की उपयोगिता को देखते हुए दुनिया के कई देशों में इनके अनुसंधान, उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। इस वैश्विक बदलाव में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत मिलेट्स को केवल पारंपरिक खाद्यान्न के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की टिकाऊ और पोषण-केंद्रित खाद्य प्रणाली के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में स्थापित करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है।
इसी क्रम में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने हैदराबाद स्थित ICAR–Indian Institute of Millets Research (IIMR) का दौरा किया। डॉ. जाट MAHARISHI (Millets and Other Ancient Grains International Research Initiative) Steering Committee के अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने संस्थान में MAHARISHI की प्रगति की समीक्षा की और इसकी पांचवीं स्टीयरिंग कमेटी बैठक में भाग लिया।
बैठक का मुख्य उद्देश्य मिलेट्स और अन्य प्राचीन अनाजों के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान सहयोग को मजबूत करना, ज्ञान एवं तकनीक के आदान-प्रदान को गति देना तथा मिलेट्स के व्यापक उपयोग के लिए वैश्विक स्तर पर समन्वित प्रयासों को आगे बढ़ाना रहा।
मिलेट्स के लिए वैश्विक रिसर्च नेटवर्क मजबूत करने पर जोर
MAHARISHI पहल के माध्यम से मिलेट्स और अन्य प्राचीन अनाजों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान सहयोग को बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। बैठक में वैज्ञानिक संस्थानों और शोधकर्ताओं के बीच सहयोग को मजबूत करने तथा उपलब्ध वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीक को विभिन्न देशों तक पहुंचाने पर चर्चा हुई।
मिलेट्स को लेकर वैश्विक स्तर पर बढ़ती रुचि का एक प्रमुख कारण इन फसलों की विविध कृषि परिस्थितियों में उपयोगिता है। बदलती जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच ऐसी फसलों की आवश्यकता बढ़ रही है जो अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों में भी उत्पादन देने की क्षमता रखती हों और साथ ही पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हों।
मिलेट्स इसी कारण भविष्य की खाद्य और कृषि प्रणालियों में महत्वपूर्ण स्थान बना सकते हैं। भारत लंबे समय से मिलेट्स की खेती और उपयोग की परंपरा वाला देश रहा है। अब वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीक के माध्यम से इस पारंपरिक ज्ञान को वैश्विक अवसरों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
ज्ञान और तकनीक के आदान-प्रदान को मिलेगी गति
MAHARISHI की पांचवीं स्टीयरिंग कमेटी बैठक में Knowledge Exchange और Technology Exchange को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। इसका उद्देश्य विभिन्न देशों और अनुसंधान संस्थानों के बीच मिलेट्स से संबंधित वैज्ञानिक जानकारी, तकनीकी ज्ञान और अनुसंधान परिणामों को साझा करने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है।
मिलेट्स के क्षेत्र में नई किस्मों का विकास, उत्पादन तकनीक, फसल सुधार, पोषण, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन जैसे कई क्षेत्र हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय सहयोग से अनुसंधान को गति मिल सकती है।
वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय से उपलब्ध अनुसंधान संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में विकसित तकनीकों और वैज्ञानिक अनुभवों को दूसरे क्षेत्रों में अपनाने के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
MAGIC 2026 की तैयारियों की भी हुई समीक्षा
बैठक के दौरान MAGIC 2026 की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। इस आयोजन को मिलेट्स और प्राचीन अनाजों के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक संवाद और सहयोग को आगे बढ़ाने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
MAGIC 2026 के माध्यम से मिलेट्स से जुड़े वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और अन्य हितधारकों को एक साझा मंच मिलने की संभावना है, जहां अनुसंधान, नवाचार और तकनीकी विकास से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया जा सकेगा।
ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मिलेट्स को वैश्विक खाद्य प्रणाली में बड़े स्तर पर शामिल करने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए अनुसंधान, प्रसंस्करण, पोषण, बाजार, उपभोक्ता जागरूकता और तकनीकी नवाचार जैसे कई पहलुओं को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।
वैज्ञानिक सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत
डॉ. एम. एल. जाट ने मिलेट्स क्षेत्र में Scientific Collaboration को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने उभरती चुनौतियों का समाधान खोजने और नए अवसरों को विकसित करने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण बताया।
मिलेट्स पर अनुसंधान अब पारंपरिक कृषि ज्ञान तक सीमित नहीं रह गया है। आधुनिक जीनोमिक्स, फेनोटाइपिंग, जीन एडिटिंग, टिश्यू कल्चर और अन्य उन्नत तकनीकों के माध्यम से फसल सुधार को तेज करने की संभावनाएं बढ़ रही हैं।
इन तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल मिलेट्स की नई और बेहतर किस्मों के विकास में मदद कर सकता है। ऐसी किस्मों में उत्पादन क्षमता, पोषण गुणवत्ता, रोग एवं कीट प्रतिरोध तथा बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूलन जैसे गुणों को बेहतर बनाने की दिशा में काम किया जा सकता है।
Advanced Phenomics Laboratory का किया निरीक्षण
ICAR–IIMR के दौरे के दौरान डॉ. जाट ने संस्थान की Advanced Phenomics Laboratory का भी निरीक्षण किया। यहां उन्होंने अत्याधुनिक अनुसंधान अवसंरचना की समीक्षा की और वैज्ञानिकों से बातचीत की।
फेनोटाइपिंग आधुनिक फसल सुधार अनुसंधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके माध्यम से पौधों के विभिन्न भौतिक और जैविक गुणों का व्यवस्थित मूल्यांकन किया जाता है। उन्नत फेनोटाइपिंग तकनीकों की मदद से बड़ी संख्या में पौधों और उनके गुणों का अधिक व्यवस्थित तथा तेजी से मूल्यांकन किया जा सकता है।
इससे वैज्ञानिकों को बेहतर पौधों की पहचान करने और फसल सुधार कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिल सकती है। विशेष रूप से जब फसल सुधार के लिए बड़ी संख्या में जर्मप्लाज्म या पौध सामग्री का मूल्यांकन करना हो, तब उन्नत फेनोटाइपिंग तकनीक अनुसंधान की गति बढ़ाने में उपयोगी साबित हो सकती है।
Centralized Millet Tissue Culture और Gene Editing Facility का दौरा
डॉ. जाट ने संस्थान में हाल ही में स्थापित Centralized Millet Tissue Culture and Gene Editing Facility का भी दौरा किया। यह सुविधा मिलेट्स में आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी आधारित अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण अवसंरचना के रूप में देखी जा रही है।
टिश्यू कल्चर तकनीक के माध्यम से पौधों की चयनित सामग्री को नियंत्रित परिस्थितियों में विकसित करने और अनुसंधान के लिए आवश्यक पौध सामग्री तैयार करने में मदद मिल सकती है। वहीं जीन एडिटिंग तकनीक के माध्यम से पौधों के विशिष्ट गुणों में लक्षित बदलाव करने की वैज्ञानिक संभावनाएं विकसित हुई हैं।
मिलेट्स में इन उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल फसल सुधार के प्रयासों को अधिक सटीक और तेज बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि किसी भी नई कृषि तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने से पहले वैज्ञानिक मूल्यांकन, सुरक्षा और नियामकीय आवश्यकताओं का पालन आवश्यक होता है।
मिलेट्स में फसल सुधार को मिलेगी नई गति
भारत के लिए मिलेट्स केवल कृषि उत्पादन का विषय नहीं हैं। ये देश की पारंपरिक खाद्य संस्कृति और पोषण सुरक्षा से भी जुड़े हुए हैं। लेकिन वैश्विक बाजार में मिलेट्स की मांग बढ़ाने के लिए उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार आवश्यक है।
इसके लिए ऐसी किस्मों की जरूरत है जो किसानों के लिए बेहतर उत्पादन और बाजार की मांग के अनुरूप गुणवत्ता प्रदान कर सकें। साथ ही प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की संभावनाओं को भी बढ़ाना होगा।
Advanced Phenomics, Tissue Culture और Gene Editing जैसी आधुनिक तकनीकें इस दिशा में अनुसंधान को नई गति दे सकती हैं। इनके माध्यम से वैज्ञानिक मिलेट्स के विभिन्न गुणों का अधिक तेजी से अध्ययन और मूल्यांकन कर सकते हैं।
किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण है आधुनिक मिलेट रिसर्च
मिलेट्स में आधुनिक अनुसंधान का अंतिम लाभ किसानों तक पहुंचना जरूरी है। नई किस्मों और उत्पादन तकनीकों का वास्तविक महत्व तभी है जब किसान उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपना सकें और उनसे बेहतर उत्पादन एवं आय प्राप्त कर सकें।
इसके लिए अनुसंधान संस्थानों और कृषि विस्तार व्यवस्था के बीच मजबूत संबंध जरूरी है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने, प्रशिक्षण देने और स्थानीय परिस्थितियों में उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन करने की आवश्यकता होगी।
इसके साथ ही मिलेट्स के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देकर किसानों को बाजार से बेहतर तरीके से जोड़ना भी जरूरी होगा। इससे मिलेट्स की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत किया जा सकता है।
स्वास्थ्य और टिकाऊ खाद्य प्रणाली में मिलेट्स की भूमिका
मिलेट्स को वैश्विक स्तर पर बढ़ती लोकप्रियता का एक कारण इनके पोषण और टिकाऊ कृषि से जुड़े संभावित लाभ भी हैं। इन्हें विविध खाद्य उत्पादों में इस्तेमाल किया जा सकता है और पारंपरिक रूप से कई क्षेत्रों में इनका सेवन होता रहा है।
बदलती खाद्य प्राथमिकताओं के बीच उपभोक्ता अब ऐसे खाद्य विकल्पों में रुचि दिखा रहे हैं जो पोषण और विविधता से जुड़े हों। ऐसे में मिलेट आधारित उत्पादों के लिए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसर बढ़ सकते हैं।
हालांकि इन अवसरों को वास्तविक बाजार में बदलने के लिए बेहतर प्रसंस्करण तकनीक, गुणवत्ता मानक, पैकेजिंग, उत्पाद विकास और उपभोक्ता जागरूकता पर भी काम करना होगा।
भारत की ‘श्री अन्न’ से वैश्विक फसल तक की यात्रा
भारत ने मिलेट्स को ‘श्री अन्न’ के रूप में बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। अब चुनौती यह है कि इन फसलों को केवल घरेलू स्तर पर लोकप्रिय बनाने के बजाय वैश्विक खाद्य और कृषि प्रणाली में मजबूत स्थान दिलाया जाए।
ICAR–IIMR इस दिशा में भारत की वैज्ञानिक क्षमता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। संस्थान में उन्नत अनुसंधान सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने से मिलेट्स अनुसंधान को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिल सकती है।
MAHARISHI जैसी पहल इस प्रक्रिया में विभिन्न देशों और अनुसंधान संस्थानों को एक मंच पर लाने में मदद कर सकती है। इससे मिलेट्स और अन्य प्राचीन अनाजों पर साझा अनुसंधान, ज्ञान आदान-प्रदान और तकनीकी सहयोग की संभावनाएं बढ़ेंगी।
वैश्विक सहयोग से खुलेंगे नए अवसर
मिलेट्स को वैश्विक फसल बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होगी। अलग-अलग देशों में मौजूद वैज्ञानिक क्षमताओं, अनुसंधान सुविधाओं और कृषि अनुभवों को साझा करके मिलेट्स से जुड़े नए समाधान विकसित किए जा सकते हैं।
MAHARISHI का उद्देश्य इसी प्रकार के सहयोग को मजबूत करना है। इसके तहत अनुसंधान साझेदारी, तकनीक हस्तांतरण और ज्ञान के आदान-प्रदान को आगे बढ़ाकर मिलेट्स के व्यापक उपयोग के लिए समन्वित प्रयास किए जा सकते हैं।
डॉ. जाट का ICAR–IIMR दौरा और पांचवीं Steering Committee Meeting में भागीदारी इस दिशा में भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
ICAR–IIMR में आयोजित MAHARISHI की पांचवीं Steering Committee Meeting ने वैश्विक मिलेट अनुसंधान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। बैठक में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग, ज्ञान एवं तकनीक के आदान-प्रदान, नवाचार और उन्नत अनुसंधान सुविधाओं के प्रभावी उपयोग पर जोर दिया गया।
Advanced Phenomics Laboratory और Centralized Millet Tissue Culture and Gene Editing Facility का निरीक्षण यह दर्शाता है कि मिलेट्स अनुसंधान अब आधुनिक विज्ञान और उन्नत तकनीक के नए चरण में प्रवेश कर रहा है।
भारत के लिए यह अवसर केवल मिलेट उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। ‘श्री अन्न’ को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने, किसानों के लिए नए बाजार अवसर पैदा करने और स्वस्थ, टिकाऊ एवं जलवायु-अनुकूल खाद्य प्रणाली के निर्माण में मिलेट्स की भूमिका बढ़ाने की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण कदम है।
आने वाले समय में MAHARISHI और MAGIC 2026 जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के माध्यम से यदि वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग और मजबूत होता है, तो भारत मिलेट्स और अन्य प्राचीन अनाजों के वैश्विक अनुसंधान एवं नवाचार का प्रमुख केंद्र बन सकता है। इससे न केवल मिलेट्स की वैज्ञानिक क्षमता का विस्तार होगा, बल्कि भारत की स्वस्थ, लचीली और टिकाऊ खाद्य प्रणाली के निर्माण की दृष्टि को भी मजबूती मिलेगी।
