भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय सुअर अनुसंधान केंद्र (ICAR–National Research Centre on Pig), रानी, गुवाहाटी ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। केंद्र के 25वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में सुअर पालन, पशुधन अनुसंधान, तकनीक विकास और किसानों की आय बढ़ाने से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। इस अवसर पर केंद्र के पिछले 25 वर्षों के शोध एवं नवाचारों को रेखांकित करते हुए भविष्य में सुअर उत्पादन को अधिक वैज्ञानिक, लाभकारी और उद्यम आधारित बनाने पर जोर दिया गया।
समारोह को संबोधित करते हुए कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव तथा ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने राष्ट्रीय सुअर अनुसंधान केंद्र के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि केंद्र ने पिछले ढाई दशकों के दौरान सुअर अनुसंधान और किसानों की सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने शोध को प्रयोगशाला तक सीमित रखने के बजाय उसे किसानों और उद्यमियों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ. जाट ने सुअर पालन क्षेत्र में इनोवेशन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और एंटरप्रेन्योरशिप को मजबूत करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने ऐसी तकनीकों के विकास और प्रसार पर जोर दिया, जिनसे किसानों को बेहतर उत्पादन, कम लागत और अधिक आय हासिल करने में मदद मिल सके। उन्होंने भारत को सुअर उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी देश बनाने के विजन पर भी बल दिया।
25 वर्षों में शोध और नवाचार की लंबी यात्रा
ICAR–National Research Centre on Pig की 25 वर्षों की यात्रा भारतीय पशुधन क्षेत्र में सुअर अनुसंधान के विकास के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा सकती है। सुअर पालन विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत सहित देश के कई हिस्सों में ग्रामीण परिवारों की आजीविका और अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। ऐसे में वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से सुअर नस्ल, पोषण, स्वास्थ्य, उत्पादन और प्रबंधन से जुड़ी तकनीकों को विकसित करना किसानों की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
केंद्र की स्थापना का व्यापक उद्देश्य सुअर पालन से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना और किसानों के लिए उपयोगी तकनीकों का विकास करना रहा है। पिछले वर्षों में पशुधन क्षेत्र में उत्पादन प्रणाली में बदलाव, बेहतर प्रबंधन, पशु स्वास्थ्य, पोषण और बाजार आधारित उद्यमिता की जरूरत लगातार बढ़ी है।
ऐसे समय में अनुसंधान संस्थानों की भूमिका केवल नई तकनीक विकसित करने तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होता है कि विकसित तकनीक किसानों तक पहुंचे और उसका वास्तविक लाभ ग्रामीण स्तर पर दिखाई दे।
इसी दिशा में समारोह के दौरान शोध एवं तकनीक के फील्ड-लेवल ट्रांसफर पर विशेष जोर दिया गया।
किसानों तक पहुंचनी चाहिए अनुसंधान की तकनीक
समारोह में ICAR के उप महानिदेशक (पशु विज्ञान) डॉ. राघवेंद्र भट्टा ने शोध को किसानों के खेत और पशुपालन इकाइयों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब उससे विकसित तकनीकों को व्यावहारिक रूप से अपनाया जाए।
उन्होंने शोधकर्ता-किसान-उद्यमी (Researcher–Farmer–Entrepreneur) लिंक को मजबूत करने की जरूरत बताई। यह मॉडल सुअर पालन क्षेत्र के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक संस्थान नई तकनीक और ज्ञान विकसित करते हैं, किसान उसका इस्तेमाल उत्पादन में करते हैं और उद्यमी उत्पादन को प्रोसेसिंग, वैल्यू एडिशन और बाजार से जोड़ने का काम कर सकते हैं।
यदि इन तीनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होता है तो सुअर पालन केवल पारंपरिक पशुपालन गतिविधि न रहकर एक संगठित ग्रामीण व्यवसाय के रूप में विकसित हो सकता है।
सुअर पालन में उद्यमिता को बढ़ावा देने पर जोर
भारत में पशुपालन किसानों की आय के विविधीकरण का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। फसल उत्पादन के साथ पशुपालन को जोड़कर किसान अपनी आय के अतिरिक्त स्रोत तैयार कर सकते हैं। सुअर पालन भी कई क्षेत्रों में ग्रामीण परिवारों के लिए इसी तरह का अवसर प्रदान करता है।
25वें स्थापना दिवस समारोह में प्रगतिशील किसानों और उद्यमियों को सम्मानित किया गया। इन किसानों और उद्यमियों ने सुअर पालन, प्रोसेसिंग, वैल्यू-एडेड उत्पाद और उद्यम विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
यह सम्मान इस बात को रेखांकित करता है कि आधुनिक पशुपालन में केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। उत्पादन से लेकर प्रोसेसिंग और बाजार तक पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करना जरूरी है।
सुअर पालन से जुड़े किसानों के लिए यदि बेहतर उत्पादन तकनीक, वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रोसेसिंग और बाजार की जानकारी उपलब्ध होती है, तो वे अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। इससे ग्रामीण स्तर पर रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
वैल्यू एडिशन से बढ़ सकती है किसानों की कमाई
समारोह में सुअर पालन के साथ प्रोसेसिंग और वैल्यू-एडेड उत्पादों के महत्व को भी सामने रखा गया। कृषि और पशुपालन क्षेत्र में वैल्यू एडिशन आज किसानों की आय बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है।
कच्चे उत्पाद को सीधे बाजार में बेचने के बजाय यदि उसके प्रसंस्करण, पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर ध्यान दिया जाए तो उसकी बाजार क्षमता बढ़ सकती है। सुअर पालन के क्षेत्र में भी उत्पादन, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग को एक साथ जोड़ने की जरूरत है।
यही कारण है कि अनुसंधान संस्थानों से अब ऐसी तकनीकों और समाधानों की अपेक्षा की जाती है जो किसानों के लिए केवल वैज्ञानिक रूप से उपयोगी न हों, बल्कि आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य हों।
ICAR–National Research Centre on Pig जैसे संस्थानों के लिए आने वाले समय में यह एक महत्वपूर्ण प्राथमिकता हो सकती है कि शोध परिणामों को व्यावसायिक मॉडल और किसान-केंद्रित तकनीकों से जोड़ा जाए।
पूर्वोत्तर भारत के लिए सुअर पालन का विशेष महत्व
राष्ट्रीय सुअर अनुसंधान केंद्र का रानी, गुवाहाटी में स्थित होना भी महत्वपूर्ण है। पूर्वोत्तर भारत में सुअर पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस क्षेत्र में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक तकनीक और बेहतर प्रबंधन पद्धतियों की जरूरत रहती है।
पूर्वोत्तर क्षेत्र में छोटे और सीमांत पशुपालकों को वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने से उनकी उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल, पशु पोषण, स्वास्थ्य प्रबंधन और वैज्ञानिक प्रजनन जैसी तकनीकों को अपनाकर सुअर पालन को अधिक उत्पादक बनाया जा सकता है।
इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को बढ़ावा मिलने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त मजबूती मिल सकती है।
शोध से बाजार तक मजबूत करनी होगी पूरी वैल्यू चेन
सुअर पालन क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए Research to Market यानी अनुसंधान से बाजार तक की पूरी प्रक्रिया को मजबूत करने की आवश्यकता होगी।
इसमें बेहतर नस्ल और प्रजनन तकनीक से लेकर पोषण, पशु स्वास्थ्य, फार्म मैनेजमेंट, प्रोसेसिंग, कोल्ड चेन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच शामिल है।
यदि इन सभी कड़ियों को एक साथ मजबूत किया जाता है, तो सुअर पालन से जुड़े किसानों और उद्यमियों के लिए अधिक लाभकारी अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
25वें स्थापना दिवस समारोह में शोधकर्ता, किसान और उद्यमियों के बीच मजबूत संबंध बनाने पर दिया गया जोर इसी व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
तकनीक हस्तांतरण को बनाना होगा आसान और प्रभावी
किसानों तक तकनीक पहुंचाने की प्रक्रिया में सरलता और व्यावहारिकता सबसे महत्वपूर्ण है। कई बार वैज्ञानिक संस्थानों में विकसित तकनीक किसानों के लिए उपलब्ध तो होती है, लेकिन उसके बारे में पर्याप्त जानकारी या प्रशिक्षण नहीं होने के कारण उसका व्यापक स्तर पर उपयोग नहीं हो पाता।
ऐसे में कृषि विज्ञान केंद्रों, पशु चिकित्सा संस्थानों, किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों और डिजिटल माध्यमों के जरिए तकनीकी जानकारी को स्थानीय भाषा में किसानों तक पहुंचाना जरूरी है।
सुअर पालन से जुड़े किसानों को केवल तकनीक उपलब्ध कराने के बजाय उसका व्यावहारिक प्रशिक्षण, प्रबंधन संबंधी सलाह और बाजार की जानकारी भी दी जानी चाहिए। इससे नई तकनीकों को अपनाने की संभावना बढ़ सकती है।
भविष्य में भारत को वैश्विक सुअर उत्पादन में अग्रणी बनाने का लक्ष्य
ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने भारत को सुअर उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी बनाने की दिशा में काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान और किसान-केंद्रित तकनीक के साथ-साथ उद्यमिता को भी बढ़ावा देना होगा।
भारत में पशुधन क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में सुअर पालन को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जोड़कर उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए अनुसंधान संस्थानों, राज्य सरकारों, किसानों, पशुपालकों, निजी क्षेत्र और उद्यमियों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक होगा।
विशेष रूप से युवाओं को आधुनिक पशुपालन और एग्री-एंटरप्रेन्योरशिप से जोड़ना सुअर पालन क्षेत्र में नए अवसर पैदा कर सकता है। यदि युवा वैज्ञानिक तकनीक, डिजिटल मार्केटिंग, प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन को सुअर पालन के साथ जोड़ते हैं तो यह क्षेत्र ग्रामीण उद्यमिता का मजबूत माध्यम बन सकता है।
25 साल की उपलब्धियों के बाद नई दिशा
ICAR–National Research Centre on Pig का 25वां स्थापना दिवस केवल एक संस्थागत उपलब्धि का अवसर नहीं है, बल्कि यह सुअर पालन क्षेत्र में भविष्य की दिशा तय करने का भी अवसर है। पिछले 25 वर्षों में केंद्र ने अनुसंधान और सेवा के क्षेत्र में अपनी भूमिका निभाई है। अब अगले चरण में शोध को तेजी से किसानों, पशुपालकों और उद्यमियों तक पहुंचाने की जरूरत होगी।
समारोह में शोध, तकनीक हस्तांतरण और उद्यमिता पर दिया गया जोर इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में सुअर पालन को अधिक वैज्ञानिक, उत्पादक, बाजारोन्मुख और उद्यम आधारित बनाने की दिशा में काम किया जाएगा।
प्रगतिशील किसानों और उद्यमियों को सम्मानित करना भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण संदेश है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों के बीच साझेदारी मजबूत होने पर शोध का वास्तविक प्रभाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
ICAR–National Research Centre on Pig, रानी, गुवाहाटी द्वारा 25 वर्षों की यात्रा पूरी करना भारतीय पशुधन अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। केंद्र ने सुअर अनुसंधान और पशुपालक समुदाय की सेवा में अपनी भूमिका को आगे बढ़ाया है। स्थापना दिवस समारोह में इनोवेशन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, रिसर्चर–फार्मर–एंटरप्रेन्योर लिंक और वैल्यू एडिशन पर दिया गया जोर आने वाले वर्षों के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय करता है।
यदि वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रभावी तकनीक हस्तांतरण और बाजार आधारित उद्यमिता से जोड़ा जाता है, तो सुअर पालन किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए आय एवं रोजगार का अधिक मजबूत माध्यम बन सकता है। भारत को सुअर उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी बनाने की दिशा में अनुसंधान संस्थानों की भूमिका इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है।
ICAR–National Research Centre on Pig के 25 वर्ष पूरे होने के साथ अब उम्मीद की जा रही है कि केंद्र आने वाले वर्षों में ऐसी नई तकनीकों और नवाचारों को आगे बढ़ाएगा, जो सीधे किसानों और उद्यमियों के लिए उपयोगी हों तथा भारत के पशुधन क्षेत्र को अधिक मजबूत, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाने में योगदान दें।
