जून 2026 में देशभर में यूरिया और डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की बिक्री में मामूली गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि इस वर्ष मानसून की रफ्तार अपेक्षा से धीमी रही, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरकों की मांग में बड़ी गिरावट नहीं आई। इसका प्रमुख कारण किसानों की समय पर बुवाई की तैयारी, सरकार द्वारा पर्याप्त उर्वरक उपलब्धता सुनिश्चित करना और वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों में आई नरमी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिक्री में आई गिरावट अस्थायी हो सकती है। यदि आने वाले सप्ताहों में वर्षा सामान्य रहती है, तो खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की मांग में दोबारा तेजी देखने को मिल सकती है।
जून में बिक्री क्यों घटी?
खरीफ सीजन में यूरिया और DAP की मांग मुख्य रूप से मानसून की प्रगति पर निर्भर करती है। इस वर्ष जून के शुरुआती सप्ताहों में कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई, जिससे किसानों ने बुवाई में कुछ देरी की। बुवाई टलने का सीधा असर उर्वरकों की तत्काल मांग पर पड़ा और बिक्री में हल्की कमी दर्ज की गई।
हालांकि कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट चिंताजनक नहीं है, क्योंकि कई किसान पहली अच्छी बारिश के बाद एक साथ बुवाई करते हैं, जिससे जुलाई और अगस्त में मांग तेजी से बढ़ सकती है।
वैश्विक कीमतों में नरमी से मिली राहत
उर्वरक उद्योग के लिए सकारात्मक संकेत यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई प्रमुख उर्वरकों की कीमतों में हाल के महीनों में नरमी देखने को मिली है। कच्चे माल और तैयार उर्वरकों की कीमतों में स्थिरता आने से भारत को आयात लागत नियंत्रित रखने में मदद मिली है।
भारत अपनी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा विशेष रूप से DAP और अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए आयात करता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों में कमी से सरकार और उर्वरक कंपनियों दोनों को राहत मिली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यही स्थिति बनी रहती है, तो आगामी महीनों में उर्वरकों की उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था अधिक मजबूत रह सकती है।
सब्सिडी पर सरकार का खर्च अभी भी ऊंचा
वैश्विक कीमतों में नरमी के बावजूद उर्वरक सब्सिडी पर सरकार का व्यय अभी भी काफी अधिक बना हुआ है। इसका मुख्य कारण किसानों को नियंत्रित कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराना है।
भारत में यूरिया की खुदरा कीमत सरकार द्वारा नियंत्रित रहती है, जबकि फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों पर पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) के माध्यम से सहायता दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू बिक्री मूल्य के बीच अंतर का बड़ा हिस्सा सरकार वहन करती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कीमतों में कुछ कमी आने से सब्सिडी का दबाव भविष्य में कम हो सकता है, लेकिन फिलहाल सरकार को किसानों के हित में पर्याप्त वित्तीय सहायता जारी रखनी होगी।
किसानों को समय पर मिल रहा उर्वरक
इस सीजन में सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आवश्यकतानुसार आयात भी किया है, जिससे अधिकांश राज्यों में यूरिया और DAP की उपलब्धता संतोषजनक बनी हुई है। राज्यों को मांग के अनुसार उर्वरकों का आवंटन किया जा रहा है और आपूर्ति की नियमित निगरानी भी की जा रही है।
इसका लाभ किसानों को समय पर उर्वरक मिलने के रूप में दिखाई दे रहा है। कई राज्यों में पिछले वर्षों की तुलना में वितरण व्यवस्था बेहतर होने की भी रिपोर्ट सामने आई है।
मानसून सुधरने पर बढ़ सकती है मांग
कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि जुलाई और अगस्त में मानसून सामान्य रहता है, तो धान, मक्का, कपास, सोयाबीन, दालें और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई तेजी से आगे बढ़ेगी। इसके साथ ही यूरिया की टॉप ड्रेसिंग तथा DAP की अतिरिक्त मांग भी बढ़ सकती है।
यानी जून में दर्ज मामूली गिरावट पूरे खरीफ सीजन की मांग का संकेत नहीं मानी जा सकती। कृषि क्षेत्र में मांग अक्सर वर्षा की स्थिति के अनुसार बदलती रहती है।
संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर
विशेषज्ञ लगातार यह भी सलाह दे रहे हैं कि किसान केवल यूरिया पर निर्भर न रहें। मिट्टी परीक्षण के आधार पर NPK, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग करने से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है।
सरकार भी नैनो यूरिया, जैव उर्वरकों और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है, जिससे भविष्य में पारंपरिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।
आगे की राह
उर्वरक बाजार के लिए आने वाले दो महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि मानसून सामान्य रहता है और वैश्विक कीमतें स्थिर बनी रहती हैं, तो खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की मांग और आपूर्ति दोनों संतुलित रहने की संभावना है।
हालांकि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उर्वरक सब्सिडी का वित्तीय बोझ नियंत्रित रखना और किसानों को बिना किसी कमी के समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना होगी। इसके लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात स्रोतों में विविधता लाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की रणनीति आगे भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
निष्कर्ष
जून 2026 में यूरिया और DAP की बिक्री में दर्ज मामूली गिरावट मुख्य रूप से कमजोर मानसून की शुरुआती स्थिति का परिणाम मानी जा रही है। फिर भी वैश्विक उर्वरक कीमतों में नरमी, पर्याप्त सरकारी स्टॉक और बेहतर आपूर्ति व्यवस्था ने बाजार को स्थिर बनाए रखा है। आने वाले हफ्तों में यदि वर्षा सामान्य रहती है, तो उर्वरकों की मांग में फिर से तेजी आने की पूरी संभावना है। वहीं, सरकार के लिए उर्वरक सब्सिडी का बढ़ता बोझ और किसानों को सस्ती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराना आगे भी प्रमुख प्राथमिकता बना रहेगा।

