भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में यूरिया, डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) सहित 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात कर खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार का मुख्य उद्देश्य किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराना, बाजार में आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना तथा खेती के महत्वपूर्ण मौसम में किसी प्रकार की कमी की स्थिति उत्पन्न न होने देना है।
देश में खरीफ फसलों की बुवाई के समय उर्वरकों की मांग सबसे अधिक रहती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, गन्ना और दालों जैसी प्रमुख फसलों के लिए यूरिया और डीएपी की भारी आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि समय पर पर्याप्त आपूर्ति न हो तो इसका सीधा प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ सकता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए सरकार ने समय रहते आयात बढ़ाने की रणनीति अपनाई है।
32 लाख टन से अधिक आयात क्यों है महत्वपूर्ण?
भारत विश्व के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। हालांकि देश में यूरिया का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, लेकिन डीएपी और कई अन्य फॉस्फेटिक एवं पोटाश उर्वरकों के लिए भारत अभी भी आयात पर काफी हद तक निर्भर है। वैश्विक बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का असर सीधे भारतीय कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है।
पहली तिमाही में 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात इस बात का संकेत है कि सरकार ने संभावित मांग का पहले से आकलन कर अग्रिम खरीद की नीति अपनाई है। इससे राज्यों में समय पर स्टॉक उपलब्ध कराने और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने में सहायता मिलेगी।
संसद में सरकार ने क्या बताया?
संसद में दिए गए जवाब में सरकार ने स्पष्ट किया कि खरीफ सीजन के दौरान किसानों को उर्वरकों की कमी का सामना न करना पड़े, इसके लिए आयात, घरेलू उत्पादन और राज्यों को नियमित आवंटन—तीनों स्तरों पर लगातार निगरानी की जा रही है।
सरकार ने यह भी बताया कि केवल तत्काल आयात पर निर्भर रहने के बजाय दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति समझौतों पर भी कार्य किया जा रहा है। इसका उद्देश्य भविष्य में वैश्विक बाजार में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता या आपूर्ति बाधा के प्रभाव को कम करना है।
दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते क्यों जरूरी हैं?
पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में कई बार तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में तनाव, प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतें और समुद्री परिवहन की चुनौतियों ने वैश्विक उर्वरक बाजार को प्रभावित किया है।
ऐसी परिस्थितियों में यदि कोई देश केवल सीमित देशों से आयात पर निर्भर रहता है, तो आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए भारत अब विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते कर रहा है, जिससे:
- उर्वरकों की नियमित उपलब्धता बनी रहे।
- कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव का प्रभाव कम हो।
- आपूर्ति श्रृंखला अधिक सुरक्षित और स्थिर बने।
- किसी एक देश पर निर्भरता कम हो।
यह रणनीति देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
किसानों को क्या मिलेगा लाभ?
सरकार की इस पहल का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिलेगा। समय पर उर्वरक उपलब्ध होने से बुवाई और फसल प्रबंधन प्रभावित नहीं होगा। यदि उर्वरकों की कमी नहीं होगी तो किसानों को लंबी कतारों में लगने या कालाबाजारी जैसी समस्याओं का सामना भी कम करना पड़ेगा।
समय पर उपलब्ध उर्वरकों से किसानों को निम्नलिखित लाभ मिल सकते हैं:
- बुवाई समय पर पूरी होगी।
- फसल की प्रारंभिक वृद्धि बेहतर होगी।
- उत्पादन क्षमता बढ़ने की संभावना रहेगी।
- बाजार में कृत्रिम कमी और अधिक कीमतों पर रोक लगेगी।
- कृषि लागत पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहेगा।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर
आयात के साथ-साथ सरकार घरेलू उर्वरक उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी लगातार काम कर रही है। हाल के वर्षों में कई बंद यूरिया संयंत्रों को दोबारा शुरू किया गया है तथा नई उत्पादन इकाइयों की स्थापना पर निवेश किया जा रहा है।
इसके अलावा प्राकृतिक गैस आधारित आधुनिक यूरिया संयंत्रों के विस्तार, ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया जैसी नई तकनीकों पर भी कार्य किया जा रहा है ताकि भविष्य में आयात निर्भरता को धीरे-धीरे कम किया जा सके।
वितरण प्रणाली पर विशेष निगरानी
केवल आयात करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उर्वरकों को समय पर राज्यों और जिलों तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके लिए केंद्र सरकार राज्यों के साथ समन्वय स्थापित कर मांग के अनुसार उर्वरकों का आवंटन कर रही है।
रेल, सड़क और बंदरगाहों के माध्यम से उर्वरकों की तेज आवाजाही सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम के माध्यम से विभिन्न राज्यों में उपलब्ध स्टॉक की नियमित समीक्षा भी की जा रही है।
संतुलित उर्वरक उपयोग की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल यूरिया या डीएपी की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। किसानों को संतुलित पोषण अपनाना भी आवश्यक है। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (NPK) के साथ-साथ सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सरकार भी लगातार नैनो उर्वरकों, जैव उर्वरकों और संतुलित पोषण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है।
वैश्विक बाजार पर बनी रहेगी नजर
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले महीनों में वैश्विक उर्वरक बाजार कई कारकों से प्रभावित हो सकता है, जिनमें प्राकृतिक गैस की कीमतें, समुद्री परिवहन लागत, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियां और भू-राजनीतिक परिस्थितियां प्रमुख हैं।
ऐसे में भारत की अग्रिम आयात नीति और दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते भविष्य में संभावित जोखिमों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
निष्कर्ष
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात भारत की कृषि सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह केवल आयात का आंकड़ा नहीं, बल्कि किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने, खरीफ उत्पादन को सुरक्षित रखने और देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
सरकार द्वारा घरेलू उत्पादन बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति समझौते करने और वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के प्रयास यह संकेत देते हैं कि भविष्य में उर्वरक आपूर्ति को अधिक स्थिर, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यदि ये प्रयास लगातार जारी रहते हैं, तो भारतीय कृषि क्षेत्र वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद अधिक मजबूत और आत्मनिर्भर बन सकता है।

