उत्तर प्रदेश के शामली जिले में किसानों ने प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय ट्रेड डील के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की है। भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के नेतृत्व में किसानों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर इस समझौते पर गंभीर चिंता जताई और इसे कृषि क्षेत्र तथा किसानों के हितों के लिए नुकसानदायक बताया।
किसानों का कहना है कि वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। बढ़ती उत्पादन लागत, फसलों के उचित मूल्य की कमी और कर्ज का बोझ किसानों की स्थिति को पहले ही कमजोर बना चुका है। ऐसे में यदि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों को लागू किया जाता है, तो इससे किसानों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
ज्ञापन में किसानों ने आशंका जताई कि यदि विदेशी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में प्रवेश मिलता है, तो सस्ते आयातित उत्पादों के कारण घरेलू बाजार में कीमतें गिर सकती हैं। इससे स्थानीय किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाएगा।
किसानों ने यह भी कहा कि इस तरह की ट्रेड डील से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव बढ़ सकता है, जिससे कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट नियंत्रण और निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा। उनका मानना है कि इससे छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका पर खतरा पैदा हो सकता है।
ज्ञापन में खाद्य सुरक्षा को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। किसानों का कहना है कि यदि घरेलू कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, तो देश की खाद्य सुरक्षा पर भी संकट आ सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी बढ़ने और किसानों के मजदूरी की ओर मजबूर होने की आशंका भी जताई गई है।
किसानों ने अपनी प्रमुख मांगों में कहा है कि कृषि, डेयरी और पोल्ट्री जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को किसी भी मुक्त व्यापार समझौते से बाहर रखा जाए। इसके साथ ही उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी रूप से लागू करने की मांग भी दोहराई, ताकि किसानों को उनकी उपज का सुनिश्चित मूल्य मिल सके।
किसान संगठनों ने राष्ट्रपति से अपील की है कि वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसे किसी भी समझौते को लागू न किया जाए, जो किसानों के हितों के खिलाफ हो। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि सरकार उनकी चिंताओं को नजरअंदाज करती है, तो किसान व्यापक आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
कुल मिलाकर, यह मुद्दा आने वाले समय में कृषि नीति और व्यापार समझौतों को लेकर एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक विषय बन सकता है। किसानों की यह पहल यह दर्शाती है कि वे अपने अधिकारों और आजीविका की सुरक्षा को लेकर सजग हैं और किसी भी संभावित जोखिम के खिलाफ संगठित होकर आवाज उठा रहे हैं।

