गाजियाबाद के अलीपुर क्षेत्र में किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत आने वाले भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली के वैज्ञानिकों ने सीधे खेतों में पहुंचकर किसानों से संवाद किया। यह पहल “मेरा गांव मेरा गौरव (MGMG)” कार्यक्रम और “संतुलित उर्वरक उपयोग” अभियान के तहत आयोजित की गई, जिसका उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूक करना और मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है।
इस कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने किसानों के साथ बैठकर उनकी समस्याओं को सुना और व्यावहारिक समाधान सुझाए। चर्चा का मुख्य केंद्र मृदा परीक्षण (Soil Testing), संतुलित पोषक तत्वों का उपयोग (Balanced Nutrient Management) और जैव उर्वरकों (Biofertilisers) के महत्व पर रहा। वैज्ञानिकों ने बताया कि बिना मिट्टी की जांच के अंधाधुंध उर्वरकों का प्रयोग न केवल फसल की गुणवत्ता को प्रभावित करता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी धीरे-धीरे कमजोर करता है।
विशेषज्ञों ने किसानों को समझाया कि मृदा परीक्षण के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि खेत की मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्वों की कमी है और उसी के अनुसार उर्वरकों का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे न केवल लागत में कमी आती है, बल्कि उत्पादन में भी स्थिरता और वृद्धि होती है। किसानों को यह भी बताया गया कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय जैव उर्वरकों और कार्बनिक पदार्थों का उपयोग बढ़ाना समय की जरूरत है।
कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने यह भी जोर दिया कि संतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी की संरचना बेहतर होती है, जल धारण क्षमता बढ़ती है और फसलों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इससे खेती अधिक टिकाऊ (Sustainable) बनती है और किसानों की आय में दीर्घकालिक सुधार संभव होता है।
किसानों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रम उन्हें नई तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों को समझने में मदद करते हैं। कई किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने पहले अधिक मात्रा में उर्वरकों का उपयोग किया, लेकिन अपेक्षित उत्पादन नहीं मिला। अब वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन से वे संतुलित उपयोग की ओर बढ़ रहे हैं।
इस अभियान के तहत वैज्ञानिकों ने किसानों को उन्नत खेती के लिए विभिन्न योजनाओं और सरकारी पहल की जानकारी भी दी। साथ ही, खेत स्तर पर प्रदर्शन (Field Demonstration) के माध्यम से नई तकनीकों को दिखाया गया, जिससे किसानों को उन्हें अपनाने में आसानी हो।
ICAR और IARI की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि जब वैज्ञानिक सीधे खेतों तक पहुंचते हैं, तो ज्ञान का सही प्रसार होता है और उसका प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। “लैब टू लैंड” की यह अवधारणा किसानों को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभा रही है।
अंततः, यह कार्यक्रम केवल एक जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि खेती को अधिक वैज्ञानिक, लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। यदि इसी तरह से निरंतर प्रयास किए जाते रहे, तो आने वाले समय में भारतीय कृषि और अधिक सुदृढ़ और टिकाऊ बन सकती है।

