अहमदाबाद– भारत में बंजर भूमि को लेकर सोच और नीतियों में बदलाव की जरूरत है। भूमि को “बंजर” कहकर उसकी उपयोगिता और सामाजिक-आर्थिक महत्व को कम आंकना एक बड़ी समस्या बन चुका है। यह बात इंडिया लैंड एंड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस (ILDC) 2025 के एक विशेष सत्र में सामने आई, जहां भूमि विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं ने बंजर भूमि की उपयोगिता, संरक्षण और सामुदायिक प्रबंधन पर विस्तार से चर्चा की।
यह विशेष सत्र “भारत में बंजर भूमि की पुनर्कल्पना: शुष्क साझा संसाधनों के लिए नीतिगत चर्चाएं” विषय पर आयोजित किया गया। यह सत्र गुजरात के अहमदाबाद में आयोजित ILDC की 9वीं कॉन्फ्रेंस का हिस्सा था, जिसमें देश-विदेश के सैकड़ों विशेषज्ञ शामिल हुए। सम्मेलन का आयोजन 18 से 20 नवंबर के बीच अहमदाबाद मैनेजमेंट एसोसिएशन (AMA) में किया गया। इस वर्ष सम्मेलन की थीम थी — “सतत विकास में भूमि की केंद्रीय भूमिका: अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान।”
सम्मेलन में 23 देशों से 492 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें नीति विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता, शोधकर्ता और भूमि प्रबंधन से जुड़े संस्थान शामिल थे। वर्ष 2017 से शुरू हुई इस कॉन्फ्रेंस में अब तक 70 देशों के 3,000 से अधिक प्रतिभागी भाग ले चुके हैं।
“बंजर भूमि” शब्द पर उठे सवाल
सत्र के दौरान कई विशेषज्ञों ने सबसे पहले “बंजर भूमि” शब्द पर ही सवाल उठाए। उनका कहना था कि यह शब्द जमीन की वास्तविक उपयोगिता और पारिस्थितिक महत्व को कम करके दिखाता है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय में संयुक्त सचिव कुणाल सत्यर्थी ने कहा कि किसी भूमि को “बंजर” कहना ही अपने आप में गलत सोच को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जब हम किसी जमीन को बंजर कहना शुरू कर देते हैं, तो धीरे-धीरे वह नीति और विकास की प्राथमिकताओं से बाहर हो जाती है।
उन्होंने कहा,
“मैंने पहाड़ी और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में काम करते हुए देखा है कि जिन जमीनों को हम बंजर कहते हैं, वे वास्तव में स्थानीय समुदायों की आजीविका, पशुपालन और पारिस्थितिकी के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। इन जमीनों पर समुदायों का अधिकार और प्रबंधन होना चाहिए।”
कुणाल सत्यर्थी ने यह भी बताया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय लंबे समय से राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड के माध्यम से इन जमीनों के विकास पर काम कर रहे हैं। लेकिन अब जरूरत यह है कि इन जमीनों को केवल “खाली” या “अनुपयोगी” भूमि के रूप में देखने की मानसिकता बदली जाए।
डेटा है, लेकिन सटीकता अब भी चुनौती
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिक मनीष परमार ने भूमि डेटा और तकनीकी पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज डेटा की कमी नहीं है, बल्कि असली चुनौती उसकी सटीकता और उपयोगिता तय करने की है।
उन्होंने कहा कि आज वैश्विक से लेकर स्थानीय स्तर तक भूमि से जुड़ा विशाल डेटा उपलब्ध है। अलग-अलग प्लेटफॉर्म, वेबसाइट और डेटा वेयरहाउस में बंजर भूमि, खराब भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी जानकारी मौजूद है। इसके बावजूद कई बार यह स्पष्ट नहीं होता कि कौन सा डेटा किस उद्देश्य के लिए उपयोगी है।
मनीष परमार ने कहा,
“प्राकृतिक संसाधनों को अलग-अलग हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता। भूमि, जल, वन और जैव विविधता सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए डेटा को भी एकीकृत दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।”
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भविष्य में भूमि उपयोग और पुनर्वास की योजनाओं के लिए अधिक सटीक और स्थानीय स्तर के डेटा की जरूरत होगी।
सामुदायिक स्वामित्व और प्रबंधन जरूरी
फाउंडेशन ऑफ इकोलॉजिकल सिक्योरिटी के कार्यकारी निदेशक सुब्रता सिंह ने साझा भूमि और चारागाह क्षेत्रों के संरक्षण पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत के कई राज्यों में ऐसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, जिनके तहत बंजर और चारागाह भूमि को समुदायों के प्रबंधन में दिया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि इन जमीनों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि समुदायों को स्पष्ट स्वामित्व और उपयोग अधिकार मिले। यदि स्थानीय लोगों को अधिकार मिलेगा, तभी वे इन जमीनों का संरक्षण और प्रबंधन बेहतर तरीके से कर पाएंगे।
सुब्रता सिंह ने ओडिशा का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां कुछ जमीनों को सरकारी रिकॉर्ड में संरक्षित श्रेणी में रखा गया है। इन जमीनों का उपयोग केवल सामुदायिक हितों के लिए किया जा सकता है।
उन्होंने कहा,
“यदि ऐसी जमीनों का किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग करना हो, तो समुदाय को बराबर मात्रा में दूसरी जमीन उपलब्ध करानी चाहिए। यह सामुदायिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए जरूरी है।”
उन्होंने यह भी कहा कि कई राज्यों में चारागाह और ग्राम वन भूमि पर अतिक्रमण हटाने के कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन प्रावधानों को कितनी गंभीरता से लागू किया जा रहा है।
चारागाह और पशुपालन की अनदेखी नहीं हो सकती
भूमि विशेषज्ञ अनिरुद्ध शेख ने कहा कि भारत में अधिकांश तथाकथित “बंजर भूमि” वास्तव में पशुपालन और चारागाह गतिविधियों के लिए उपयोग होती है। इसलिए किसी जमीन को अनुपयोगी मानना सही नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि बंजर भूमि का सही मूल्यांकन तभी संभव है जब यह समझा जाए कि वहां कौन-कौन से संसाधन मौजूद हैं और स्थानीय समुदाय उनका किस प्रकार उपयोग कर रहे हैं।
अनिरुद्ध शेख ने कहा,
“कई बार जिन जमीनों को बंजर कहा जाता है, वे पशुपालन, जैव विविधता और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम होती हैं। इसलिए इनका मूल्यांकन केवल कृषि उत्पादन के आधार पर नहीं होना चाहिए।”
उन्होंने यह भी बताया कि चारागाह और बंजर भूमि का मानचित्र तैयार करने में कई चुनौतियां आती हैं, जैसे मौसमी बदलाव, भूमि उपयोग की प्रकृति और ऐतिहासिक रिकॉर्ड की कमी।
भूमि बहाली और पर्यावरणीय महत्व
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की प्रोग्राम मैनेजर अर्चना चटर्जी ने कहा कि “बंजर भूमि” शब्द में बदलाव की जरूरत है, क्योंकि यह भूमि के पर्यावरणीय और सामाजिक महत्व को कम करके दिखाता है।
उन्होंने कहा कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के तहत वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर खराब और वनों की कटाई वाली भूमि को पुनर्स्थापित करने का लक्ष्य तय किया है। इसमें बड़ी मात्रा में वही जमीन शामिल होगी जिसे आज “बंजर भूमि” कहा जाता है।
अर्चना चटर्जी ने कहा,
“वन परिदृश्य बहाली का दृष्टिकोण केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। इसमें सार्वजनिक और सामुदायिक भूमि को भी शामिल करना होगा, ताकि क्षरणग्रस्त क्षेत्रों को दोबारा उत्पादक और पारिस्थितिक रूप से मजबूत बनाया जा सके।”
उन्होंने एक अध्ययन का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत की सामान्य भूमि हर वर्ष अरबों डॉलर मूल्य की पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करती है। इसलिए इन जमीनों को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी समझने की जरूरत है।
नजरिया बदलने की जरूरत
सेंटर फॉर सोशल इकोलॉजी के निदेशक डॉ. पूर्णेंदु कावोरी ने कहा कि बंजर भूमि को लेकर सबसे बड़ी समस्या हमारा नजरिया है। उन्होंने कहा कि आज बाजार केवल उन जमीनों को महत्व देता है जिनका तत्काल आर्थिक उपयोग दिखता है, जबकि बंजर भूमि के सांस्कृतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्य की अनदेखी की जाती है।
उन्होंने कहा,
“बंजर भूमि केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देखी जानी चाहिए। इन जमीनों में जैव विविधता, सामुदायिक उपयोग, सांस्कृतिक महत्व और पर्यावरणीय संतुलन जैसे कई मूल्य मौजूद होते हैं।”
बंजर नहीं, संभावनाओं की भूमि
कॉन्फ्रेंस के इस सत्र से एक बात स्पष्ट होकर सामने आई कि भारत में तथाकथित “बंजर भूमि” को नए दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन जमीनों को सामुदायिक संसाधन, पारिस्थितिक संपदा और ग्रामीण आजीविका के महत्वपूर्ण आधार के रूप में विकसित किया जा सकता है।
इसके लिए जरूरी है कि:
- भूमि का सही रिकॉर्ड तैयार हो
- सामुदायिक स्वामित्व को बढ़ावा मिले
- वैज्ञानिक डेटा का उपयोग हो
- नीति स्तर पर स्पष्ट प्रावधान बनाए जाएं
- और सबसे महत्वपूर्ण, “बंजर भूमि” को देखने का नजरिया बदला जाए।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन जमीनों की वास्तविक उपयोगिता को समझते हुए योजनाबद्ध तरीके से विकास किया जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

