भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में से एक है और यहां खेती की उत्पादकता काफी हद तक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर करती है। इनमें यूरिया सबसे अधिक उपयोग होने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। हर साल देश में करोड़ों किसान धान, गेहूं, गन्ना, मक्का और अन्य फसलों में यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन बढ़ती मांग, आयात पर निर्भरता, प्राकृतिक गैस की ऊंची कीमतें और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने भारत को यूरिया उत्पादन के नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया है। इसी वजह से सरकार ग्रीन यूरिया को भविष्य के समाधान के रूप में देख रही है।
- आयातित यूरिया पर निर्भरता कम करने के लिए
भारत यूरिया का बड़ा उत्पादक होने के बावजूद अपनी पूरी जरूरत घरेलू उत्पादन से पूरी नहीं कर पाता। हर साल लाखों टन यूरिया विदेशों से आयात करना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने या आपूर्ति बाधित होने पर इसका सीधा असर भारत की उर्वरक व्यवस्था पर पड़ता है।
यदि देश में ग्रीन अमोनिया आधारित यूरिया उत्पादन बढ़ता है, तो भविष्य में आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराने में भी मदद मिलेगी।
- प्राकृतिक गैस पर निर्भरता घटाने के लिए
पारंपरिक यूरिया उत्पादन में प्राकृतिक गैस सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल होती है। भारत अपनी गैस आवश्यकता का भी बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब वैश्विक बाजार में गैस महंगी होती है, तब यूरिया उत्पादन की लागत भी बढ़ जाती है।
ग्रीन यूरिया में ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग होता है, जिसे सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार किया जा सकता है। इससे भविष्य में आयातित गैस पर निर्भरता कम होने की संभावना है।
- कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए
पारंपरिक यूरिया उत्पादन के दौरान बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का उत्सर्जन होता है। उर्वरक उद्योग ऊर्जा-गहन क्षेत्रों में से एक माना जाता है।
ग्रीन यूरिया के उत्पादन में ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया का उपयोग होने से कार्बन उत्सर्जन काफी कम किया जा सकता है। इससे भारत को अपने जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलेगी।
- 2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य को पूरा करने के लिए
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बिजली, परिवहन, इस्पात, सीमेंट और उर्वरक जैसे उद्योगों में स्वच्छ तकनीकों को अपनाना जरूरी है।
ग्रीन यूरिया मिशन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि यह उर्वरक उद्योग को कम-कार्बन उत्पादन प्रणाली की ओर ले जाता है।
- उर्वरक क्षेत्र को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए
देश के कई यूरिया संयंत्र 30 वर्ष से अधिक पुराने हैं। इन संयंत्रों की ऊर्जा दक्षता नई तकनीकों की तुलना में कम है। सरकार चाहती है कि आने वाले वर्षों में नए संयंत्र आधुनिक तकनीक, ग्रीन हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा पर आधारित हों।
इससे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और उर्वरक उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेगा।
- किसानों को स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए
वैश्विक संकट, युद्ध या आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण कभी-कभी उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित होती है। यदि भारत अपने यहां अधिक मात्रा में ग्रीन यूरिया का उत्पादन करने लगता है, तो किसानों को समय पर यूरिया उपलब्ध कराने में आसानी होगी और बाहरी परिस्थितियों का असर कम पड़ेगा।
- उर्वरक सब्सिडी पर दबाव कम करने के लिए
भारत सरकार हर साल उर्वरक सब्सिडी पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करती है। इसका एक बड़ा कारण आयातित उर्वरकों और कच्चे माल की ऊंची कीमतें होती हैं।
हालांकि ग्रीन यूरिया की शुरुआती लागत अधिक है, लेकिन यदि भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन सस्ता होता है और घरेलू उत्पादन बढ़ता है, तो लंबे समय में आयात पर खर्च कम हो सकता है और सब्सिडी व्यवस्था अधिक टिकाऊ बन सकती है।
- ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए
ग्रीन यूरिया मिशन केवल उर्वरक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इससे ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण जैसे नए उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे निवेश, रोजगार और तकनीकी विकास के नए अवसर पैदा होंगे।
- ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित ईंधन से पूरा करता है। यदि उर्वरक उद्योग धीरे-धीरे नवीकरणीय ऊर्जा आधारित ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग बढ़ाता है, तो देश की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार के उतार-चढ़ाव का असर कम होगा।
निष्कर्ष
ग्रीन यूरिया की आवश्यकता केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। यह भारत की कृषि सुरक्षा, उर्वरक आत्मनिर्भरता, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है। आयातित यूरिया और प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम करना, कार्बन उत्सर्जन घटाना, किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना और 2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना—ये सभी कारण ग्रीन यूरिया को भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल बनाते हैं। यदि सरकार, उद्योग और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर इस मिशन को सफल बनाते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत स्वच्छ और टिकाऊ उर्वरक उत्पादन के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है।

